वंशवाद की राजनीति या राजनीति का वंशवाद

हरियाणा, लोक सभा चुनाव, मतदाता
Image caption लोक सभा चुनाव के दौरान हरियाणा के एक पोलिंग बूथ पर मतदान करते वोटर.

देवी लाल, बंसी लाल और भजन लाल का कभी हरियाणा की राजनीति पर दबदबा हुआ करता था.

ये तीनों नेता अब नहीं रहे लेकिन प्रदेश की राजनीति पर उनके परिवारों का असर बना हुआ है.

इन तीनों का ज़िक्र हरियाणा की राजनीति में परिवारवाद का पर्याय बन गया है.

और इस दायरे में मुख्यमंत्री भूपिंदर सिंह हुड्डा और ओम प्रकाश चौटाला से लेकर इंदरजीत राव और सुषमा स्वराज तक सभी आ जाते हैं.

पंजाब यूनिवर्सिटी के राजनीति शास्त्री मोहम्मद ख़ालिद कहते हैं, "हरियाणा की राजनीति कुछ परिवारों के इर्द-गिर्द घूमती है. यह परिवार अपने साथ जाति आधारित वफ़ादारियां पाले हुए हैं. इनकी पकड़ को कमजोर करना इतना आसान नहीं है."

परिवार

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Image caption भजन लाल के बेटे कुलदीप बिशनोई ने भाजपा से गठबंधन ख़त्म कर लिया है.

अब इन परिवारों का रुझान राजनीतिक दलों के बड़े नेताओं से आगे बढ़ गया है.

कांग्रेस ने राज्य सरकार में वित्त मंत्री हरमोहिंदर सिंह चट्ठा के बेटे मंदीप सिंह, राव धर्मपाल के बेटे विरेंदर सिंह, बलबीर पाल शाह के भाई विरेंदर पाल शाह, फूल चंद मौलाना के बेटे वरुण चौधरी के साथ-साथ नवीन जिंदल की माँ सवित्री जिंदल को उम्मीदवार बनाया है.

भूपिंदर हुड्डा के बेटे दीपेंदर हुड्डा पहले ही सासंद हैं. भाजपा ने सुषमा स्वराज की बहन वंदना शर्मा को उम्मीदवार बनाया है.

इंडियन नेशनल लोकदल (इनेलोद) ने उम्मीदवारों में ओम प्रकाश चौटाला के बेटे और पोते शामिल हैं.

इस सियासी चलन पर राजनीति शास्त्री कंवलप्रीत कौर कहती हैं, "यह पता नहीं चलता कि पंजाब हरियाणा से सीख रहा है. ऐसा भी लगता है कि सभी कांग्रेस से सीख रहे हैं. अब यह रुझान पार्टियों और परिवारों से बड़ा हो गया है. परिवार के नाम पर आप को दूसरी पार्टियां भी उम्मीदवार बनातीं हैं."

'कुलीनतंत्र'

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Image caption राजनीति से हरियाणा के हुड्डा परिवार का रिश्ता तीन पीढ़ियों से है.

कांग्रेस ने ओम प्रकाश चौटाला के भाई चौधरी रंजीत सिंह को अपने उम्मीदवार बनाया है.

इसी तरह हरियाणा जनहित कांग्रेस (हजका) पूरी तरह भजन लाल परिवार के इर्द-गिर्द घूमता है.

भजन लाल के बेटे कुलदीप विश्नोई और चंदर मोहन इस दल के बड़े उम्मीदवार हैं.

गोपाल कांडा की हरियाणा 'लोकहित पार्टी' और विनोद शर्मा की 'जन चेतना पार्टी' का वजूद भी उनके परिवारों के साथ जुड़ा हुआ है.

मोहम्मद खालिद पूछते हैं, "यह लोकतंत्र के नाम पर कुलीनतंत्र नहीं तो और क्या है."

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