बिछड़ने के 25 साल बाद माँ को ढूँढ़ निकाला

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एक भारतीय लड़का 25 साल पहले अपनी मां से बिछड़ गया था.

लेकिन उपग्रह से ली गई तस्वीरों के ज़रिए उन्होंने अपनी मां को खोज लिया.

ऑस्ट्रेलिया के तस्मानिया राज्य में रह रहे सारू की उम्र तब केवल पांच साल थी, जब वो भारत में खो गए थे.

ट्रेन में सफ़ाई कर्मचारी के तौर पर काम करने वाले बड़े भाई के साथ सफर करने के दौरान ये हादसा हुआ था.

सारू बताते हैं, "वो रात का वक़्त था. हम ट्रेन से उतरे ही थे और मैं बहुत थका हुआ था. मैं स्टेशन पर एक जगह बैठ गया और मुझे नींद आ गई."

दुर्भाग्य की उस झपकी ने सारू की आगे की ज़िंदगी का रुख तय कर दिया.

वो कहते हैं, "जब मैं सोकर उठा तो मेरा भाई कहीं नहीं दिखा. मेरे सामने एक ट्रेन खड़ी थी और मैंने सोचा कि वह इसी ट्रेन में होगा. मैं उसकी खोज में ट्रेन में चढ़ गया."

मिलने की ख़्वाहिश

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लेकिन इस सफ़र ने सारू को एक अनाथालय पहुँचा दिया जहां से उन्हें तस्मानिया के एक दंपति ने गोद ले लिया.

नए घर में सारू सहज हो गए लेकिन जैसे जैसे वक्त गुजरता चला गया, अपने जन्म के परिवार से मिलने की उनकी ख़्वाहिश ज़ोर पकड़ने लगी.

लेकिन दिक्कत ये थी कि पांच साल की उम्र में निरक्षर रहे सारू को अपने शहर का नाम तक याद नहीं था.

फिर भी उन्होंने गूगल अर्थ पर घर की तलाश शुरू कर दी.

शहर का रास्ता

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गूगल अर्थ के बारे में सारू कहते हैं, "मुझे सुपरमैन की तरह लग रहा था. मैं जहां चाहे वहां जा सकता था. हर तस्वीर के बारे में खुद से पूछता कि क्या ये वही है और जैसे ही ये जवाब मिलता कि नहीं, तलाश आगे बढ़ जाती."

गूगल अर्थ में घर खोजने के लिए सारू ने एक प्रभावशाली तरकीब खोजी, "मैंने अंदाजा लगाया कि मेरा सफ़र कोई 14 घंटे का रहा होगा और इस दरमियान मैंने 1200 किलोमीटर का सफर तय किया होगा."

उन्होंने कोलकाता शहर को सेंटर में रखते हुए एक सर्किल खींचा और जल्द ही उन्हें एहसास हुआ कि वह खंडवा शहर की तलाश कर रहे हैं.

वह बताते हैं, "जब मुझे ये मिल गया तो मैंने उस झरने के आस पास की तमाम जगहों को खंगाला, जहां मैं खेला करता था."

घरवाले

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सारू जल्द ही खंडवा पहुँचे, वो शहर जिसे उन्होंने ऑनलाइन खोजा था.

बचपन की गलियों से उन्हें इस शहर का रास्ता मिला था. और आखिरकार उन्हें अपना घर मिल गया लेकिन वहां ताला लटका हुआ था.

उनके पास अपने बचपन की एक तस्वीर थी और घरवालों के नाम याद थे.

पूछने पर पड़ोसियों ने बताया कि वे लोग कहीं ओर चले गए हैं. तभी एक आदमी ने मां से उनकी बात कराई.

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Image caption सारू की कहानी में प्रकाशकों और फिल्मकारों की दिलचस्पी बढ़ी है.

वह कहते हैं, "मुझे यकीन नहीं हो रहा था." लेकिन मिलने पर उनकी मां उन्हें ठीक से पहचान नहीं पाई.

सारु कहते हैं, "आखिरी बार जब मैंने उन्हें देखा था तो वे 34 साल की एक महिला थीं. लेकिन चेहरे की बनावट वैसी ही थी. मैंने उन्हें पहचान लिया और कहां, हां, तुम मेरी मां हो."

सारू का वो भाई जो रेल के सफ़र में उनके साथ था, उसकी लाश रेल की पटरियों पर पाई गई थी. सारू को इसका मलाल है.

लेकिन मां से मिलने के बाद उन्हें अब अच्छी नींद आती है. कई प्रकाशक और फ़िल्म प्रोड्यूसर उनकी कहानी में दिलचस्पी ले रहे हैं.

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