क्या आरएसएस फ़ासिस्ट संगठन है?

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भारतीय जनता पार्टी के मातृ संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के गठन के 90 साल पूरे हो रहे हैं. दुनिया के दूसरे हिस्सों में ऐसा कोई संगठन देखने को नहीं मिलता जो बुनियादी ढांचे और कार्यशैली में आरएसएस यानी संघ जैसा हो.

सांस्कृतिक संगठन के बतौर शुरू हुए संघ का दर्शन हिंदू राष्ट्रवाद है. संघ के मुताबिक़ हिंदू कोई जातिसूचक शब्द नहीं बल्कि भारत में रहने वालों को हिंदू कहा जाना चाहिए. संघ के दूसरे प्रमुख गोलवलकर का मानना था कि भारत को मज़बूत राष्ट्र में बदलने के लिए हिंदू एकीकरण और पुनरुत्थान की ज़रूरत है ताकि वो दुनिया के कल्याण में अपना योगदान दे सकें. ग़ैर हिंदुओं को गोलवलकर समान नागरिक अधिकार देने के ख़िलाफ़ थे.

हालांकि बाद में संघ के राजनीतिक धड़े भारतीय जनता पार्टी के कई नेताओं ने इससे दूरी बना ली थी. संघ का यक़ीन राजनीति या सत्ता हासिल करने में भी नहीं था. बाद में सत्ता को लेकर विचार भी बदल गए.

मगर धर्म संघ के मन में विराजता रहा और वही उनके राष्ट्रवाद का आधार रहा है. धार्मिक आधार पर उग्र राष्ट्रवादी कई संगठन दुनिया के दूसरे हिस्सों में हैं. कुछ राजनीतिक सत्ता के ज़रिए अपना मक़सद पाना चाहते हैं तो कई चरमपंथ के रास्ते से.

इस्लाम को आधार बताने वाली कई राजनीतिक पार्टियां इस्लामी राष्ट्र की वकालत करती हैं, तो यूरोप में हिटलर की नस्लीय शुद्धतावादी विचारधारा से प्रेरित कई पार्टियां नव नाज़ीवाद समर्थक हैं.

कई प्रवासियों को देश में घुसने देने, ग़ैर नस्ली या ग़ैर धर्म के लिए सख़्त रवैया अपनाने की हिमायत करती हैं. यहां तक कि अमरीका में भी कुछ पार्टियां ईसाइयत की स्थापना की कोशिश करती रही हैं.

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सवाल यह है कि क्या आरएसएस को इनके समानांतर रखा जा सकता है.

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दिल्ली यूनिवर्सिटी में राजनीतिक विज्ञान के प्रोफ़ेसर शम्सुल इस्लाम के मुताबिक़ ''संघ और फ़ासीवाद-नाज़ीवाद के बीच पुराने रिश्ते रहे हैं.'' वह इतालवी शोधकर्ता मार्ज़िया कासोलारी का हवाला देते हैं, जिन्होंने संघ नेताओं की मुसोलिनी से मुलाक़ात का ज़िक्र किया था.

हालांकि हैदराबाद यूनिवर्सिटी में राजनीति विज्ञान के प्रोफ़ेसर ज्योतिर्मय शर्मा आरएसएस पर किसी तरह की लेबलिंग या उसे किसी श्रेणी में रखने को 'बौद्धिक आलस्य' की संज्ञा देते हैं.

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उनके मुताबिक़ ''हमारे सेक्युलरिस्ट या बुद्धिजीवियों ने आरएसएस को गाली के तौर पर फ़ासिस्ट कहा है न कि गंभीर वैचारिक या बौद्धिक मापदंड पर. यह तो महज़ वैचारिक आलस्य है. दुनियाभर में ऐसे कई संगठन हैं, जो धर्म और राजनीति का मिश्रण करके उग्रराष्ट्रवाद की परिकल्पना करते हैं. पूर्वी यूरोप के कुछ देशों में मिसाल के लिए हंगरी में ऐसी ही एक मुहिम चल रही है. वो एंटी सेमेटिज़्म में यक़ीन रखते हैं. इस तुलना को अंग्रेज़ी में मॉर्फ़ोलॉजी कहते हैं.''

ज्योतिर्मय शर्मा के मुताबिक़ संघ के दर्शन की ख़ासियत उग्र राष्ट्रवाद ही है. वह इसकी तुलना मैज़िनी की सोच से करते हैं.

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''धर्म और राजनीति के मेल की यह सोच मैज़िनी में भी थी. जब इटली का एकीकरण हुआ तो उन्होंने कहा कि बिना धर्म के राष्ट्रवाद और राजनीति विफल हो जाएगी. आरएसएस में कोई एक भी ऐसा विचार नहीं है, जो हमारी ज़मीन से उपजा हो. वो हर संदर्भ और मायने में पाश्चात्य है.''

अगर संघ का कलेवर भारतीय नहीं है तो क्या है? क्या उसे कुछ धर्मनिरपेक्षवादियों की भाषा में दक्षिणपंथी कहना सही होगा?

'द ब्रदरहुड इन सैफ़्रन' के लेखक और संघ पर लंबे समय से शोध कर रहे वॉल्टर एंडरसन ने पिछले दिनों बीबीसी से बातचीत में कहा था, ''दुनिया में संघ की तुलना किसी और संगठन से करना मुश्किल है. हालांकि जापान का बौद्ध संगठन "साका गाकाई" काफ़ी हद तक आरएसएस और भारतीय जनता पार्टी का मिला-जुला स्वरूप है.''

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एंडरसन 2003 तक अमरीकी विदेश विभाग से जुड़े रहे हैं. फ़िलहाल वह वाशिंगटन की जॉन हॉपकिंस यूनिवर्सिटी में दक्षिण एशिया प्रोग्राम के निदेशक हैं.

एंडरसन के मुताबिक़ ''दुनिया में शायद ही कोई संस्था हो, जिसका संगठन इतना सशक्त हो. ये शिक्षा से जुड़े हैं, आदिवासियों के उत्थान के लिए काम कर रहे हैं, महिलाओं के बीच काम कर रहे हैं और भारत का सबसे बड़ा मज़दूर संगठन और छात्र संगठन भी इन्हीं का है.''

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मगर ज्योतिर्मय शर्मा कहते हैं समानताएं ढूंढना आसान है और वो मिल भी जाती हैं. उनके मुताबिक़ आरएसएस के लिए ''हमें नई श्रेणी या लेबल ढूंढने के लिए थोड़ी मेहनत करनी पड़ेगी.''

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''राजनीतिक दृष्टि से आरएसएस लेफ़्ट ऑफ़ सेंटर हैं. भारत में विदेशी निवेश न होने देने और स्वदेशी जैसे मुद्दे देखें तो वह सीपीएम के साथ हैं. इसलिए जो लेबल हैं, मसलन लेफ़्ट ऑफ़ सेंटर, राइट ऑफ़ सेंटर, फ़ार राइट, रिलीजियस राइट, वह काम नहीं करेंगे..वो पॉलिटिकल राइट तो हैं, लेकिन इकोनॉमिकली राइट नहीं हैं. प्रकाश करात और मोहन भागवत आर्थिक नीति पर एक दूसरे से सौ फ़ीसदी सहमत होंगे. मैं उग्र राष्ट्रवाद के आगे नहीं जाऊंगा.''

ज़्यादातर लोगों की राय में संघ को किसी अंतरराष्ट्रीय या राष्ट्रीय संगठन के बराबर रखकर नहीं देख सकते.

मिसाल के लिए राजनीतिक विश्लेषक गिरिजा शंकर के मुताबिक़, ''उनमें उग्रता और आक्रामकता देखने को मिलेगी. मैं आरएसएस को उनसे अलग मानता हूं.. संघ हिंदू राष्ट्रवाद की राजनीतिक विचारधारा को लेकर चल रहा है. उनका सोचना है कि लोकतांत्रिक तरीक़े से सत्ता में आएं और यह एजेंडा आगे बढ़ाएं. मुझे नहीं लगता कि दुनिया के दूसरे संगठन चुनाव लड़कर सत्ता में आने के बाद ऐसा करते हों.''

तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का राष्ट्रवाद भारतीय राष्ट्रवाद से कितना अलग है?

प्रो. ज्योतिर्मय के मुताबिक़ ''आरएसएस के हिंदुत्व की छाया हमारे सेक्युलर राष्ट्रवाद में भी मिलती है. 1947 के बाद का जो सरकारी राष्ट्रवाद है, जिसे मैं दूरदर्शन का राष्ट्रवाद कहता हूं, उसमें न तो दलित की बात है, न महिलाओं की और न आदिवासियों की.. मुश्किल यह है कि 1947 के राष्ट्रवाद को हमने धर्म की तरह मान लिया और जब हम संघ को या किसी और राष्ट्रवाद को देखते हैं, तो उसकी तुलना में देखते हैं.. असल चुनौती सरकारी राष्ट्रवाद की पड़ताल करने की है, तभी संघ को समझा जा सकता है और इस हमाम में सब नंगे हैं.''

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