शशि थरूर ने लक्ष्मण रेखा लांघ ली है?

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संयुक्त राष्ट्र के पूर्व नौकरशाह से कांग्रेस नेता बने शशि थरूर पार्टी हाईकमान के ‘पर्सेप्शन टेस्ट’ में नाकाम होते दिख रहे हैं.

कांग्रेस में किसी नेता के बारे में पार्टी हाईकमान की राय इस लिहाज से अहम मानी जाती है. लेकिन थरूर को पार्टी की साख पर बट्टा लगाने वाले शख्स के तौर पर देखा जाने लगा है.

थरूर का बाँकपन, उनकी वाकपटुता और उनकी हाजिरजवाबी उन्हें कांग्रेस पार्टी में एक ‘बाहरी आदमी’ की छवि देते हैं.

वे खुद भी इस तमगे को टेलीविज़न स्टूडियोज और अपने ट्विटर एकाउंट पर शान के साथ पेश करते रहे हैं.

वो चाहे आईपीएल में कोच्चि टीम का मामला हो या फिर ‘कैटल क्लास’ वाली उनकी टिप्पणी, यहां तक कि रहस्यमयी परिस्थितियों में हुई उनकी पत्नी सुनंदा पुष्कर की मौत के मामले में भी थरूर को उबारने में कांग्रेस हाईकमान की मदद मिली थी.

‘बुनियादी बात’

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लेकिन पार्टी नेतृत्व इस बार उनके साथ खड़े होने के मूड में नहीं दिखता क्योंकि ये कांग्रेस के लिए विचारधारा का मसला है.

संयुक्त राष्ट्र में नरेंद्र मोदी के भाषण, उनके अमरीकी दौरे और स्वच्छता अभियान को समर्थन देना. ये कुछ ऐसी बातें हैं जो कांग्रेस की नज़र में पार्टी की अनुशासन की लक्ष्मण रेखा लांघने जैसा है.

कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेता इस बात पर हैरत जताते हैं कि आखिर क्यों एक विद्वान और दुनिया देख चुके नेता मोदी और दस जनपथ के फासले की ‘बुनियादी बात’ को नहीं समझ पाते हैं.

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के विपरीत मोदी कांग्रेस को प्रमुख विपक्षी पार्टी का दर्जा देने का कोई दिखावा नहीं करते हैं.

हाईकमान

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‘कांग्रेस मुक्त भारत’ का जुमला बार-बार दोहराकर मोदी ने साफ तौर पर लोकसभा में कांग्रेस को विपक्ष का नेता पद देने से साफ इनकार कर दिया है.

हालांकि सोनिया गांधी और राहुल गांधी अभी भी थरूर के लिए मन में जगह रखते हैं लेकिन 2014 के चुनाव में मिली हार के बाद हाईकमान इस स्थिति में नहीं है कि वह पार्टी की केरल इकाई के दबाव को दरकिनार कर दे.

इस राज्य में पार्टी संगठन में अभी भी बहुत जान है. वैसे थरूर के निष्कासन को लेकर जर्नादन द्विवेदी या अन्य किसी नेता की मांग में कोई बहुत ज्यादा वजन नहीं है.

राजनैतिक नैतिकता के परेशान करने वाले पहलुओं को छोड़ भी दें तो संसदीय परंपराओं और कानूनी तौर पर थरूर कमजोर विकेट पर खड़े हैं.

‘तेल के बदले अनाज’

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दल बदल विरोधी कानून पार्टियों को अपने चुने हुए सांसदों और विधायकों पर पूरा नियंत्रण देता है और अतीत में ऐसे मामले हुए हैं जब निर्वाचित नेताओं को अपनी सदस्यता से हाथ धोना पड़ा है.

बीते सालों में कांग्रेस में कई और नेता भी हुए थे जो पार्टी नेतृत्व की नज़र से उतर गए.

नटवर सिंह एक बढ़िया उदाहरण हैं. मनमोहन कैबिनेट में विदेश मंत्री रहे नटवर सिंह और उनके बेटे जगत सिंह का नाम ‘तेल के बदले अनाज’ स्कैम में आया था.

नटवर की स्थिति तब तक मजबूत बनी रही जब तक कि दस जनपथ को ये पता न चला कि इस मामले में पार्टी के नाम का दुरूपयोग किया गया है.

फिर एक ऐसा वक्त भी आया जब नटवर सिंह के लिए दस जनपथ के दरवाजे बंद हो गए. इस वाकये के बाद से ही नटवर सिंह अपने लिए सियासी ज़मीन नहीं तलाश पाए.

अतीत से सबक

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26 नवंबर को मुंबई पर हुए चरमपंथी हमले के बाद महाराष्ट्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ था.

राम गोपाल वर्मा को ताज होटल ले जाने के बाद वे तब तक मीडिया में बयान देते रहे जब तक कि पार्टी पर्यवक्षकों ने आकर राज्य विधानमंडल दल का नया नेता नहीं चुन लिया था.

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1988 में चुरहुट लॉटरी कांड के बाद जब अर्जुन सिंह ने इस्तीफा देने में हिचकिचाहट दिखाई थी तो उस वक्त के गृहमंत्री बूटा सिंह को दबाव बनाने के लिए भेजा गया था.

हालांकि ऐसा नहीं है कि शशि थरूर के लिए बाज़ी हाथ से निकल चुकी है.

वे अहमद पटेल, मुकुल वासनिक, राजीव शुक्ला और उन दर्जनों कांग्रेस नेताओं से सबक ले सकते हैं जिनके कदम लड़खड़ाए तो जरूर, लेकिन वे पार्टी में बने रहे.

(बीबीसी हिंदी सेवा से बातचीत पर आधारित)

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