आरएसएस की सोशल इंजीनियरिंग

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आम चुनाव के दौरान जितनी चमत्कारिक भारतीय जनता पार्टी की जीत रही, उससे कहीं ज़्य़ादा हैरान मज़बूत दलित वोट बैंक वाली पार्टी बहुजन समाज पार्टी के सफ़ाए ने किया.

क्या सोशल इंजीनियरिंग के ज़रिए सत्ता की सीढ़ियाँ चढ़ने वाली ये पार्टी ख़ुद नई सोशल इंजीनियरिंग का शिकार हो गई?

ये सवाल आम चुनाव के बाद से लगातार उठ रहा है और सवाल ये भी है कि इस नई सोशल इंजीनियरिंग में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की कितनी भूमिका है.

संघ से सरोकार रखने वालों का कहना है कि आरएसएस वोट बैंक की राजनीति से दूर रहता है, वहीं कई जानकारों की राय है कि दलितों को लुभाने के लिए संघ बराबर सक्रिय है.

पढ़िए अशोक कुमार की विशेष रिपोर्ट.

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"युगों युगों से दलितों का दमन होता आया है और अब समाज को उन्हें आरक्षण देने के लिए तैयार रहना होगा. आरक्षण के हक़दार लोगों को ये मिलना चाहिए जब तक कि समाज में बराबरी न आ जाए."

संघ प्रमुख मोहन भागवत का ये बयान बताता है कि वह दलितों को साथ लेकर चलने के बारे में कितने गंभीर है.

ये बयान उन्होंने पिछले महीने दिल्ली में तब दिया जब उन्होंने दलितों पर लिखी तीन किताबों का विमोचन किया. ये किताबें भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता बिजय सोनकर शास्त्री ने लिखी है.

मोहन भागवत ने कहा कि दलितों को अब अवसरों और विकास के लाभों से वंचित नहीं किया जा सकता है. उन्होंने ये भी कहा कि सवर्ण दलितों को मुख्यधारा में लाने के लिए उनकी तरफ हाथ बढ़ाएं, और दलित भी उस हाथ को पकड़ें.

नई रणनीति

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संघ के विचारक प्रोफेसर राकेश सिन्हा इसे संघ की नई रणनीति के तौर पर देखते हैं.

वह कहते हैं, "मुझे लगता है कि संघ ने इस वर्ष से दलितों के बीच जाने की, उनके लोकतांत्रिक अधिकारों की बात करने की, उनकी समस्याओं को समझने और कथित सवर्णों से उनकी दूरी को ख़त्म करने की नई रणनीति बनाई है."

हालांकि वह कहते हैं कि संघ ये सब वोट बैंक की राजनीति को सामने रखकर नहीं कर रहा है, लेकिन इससे भी उन्हें इनकार नहीं कि आरएसएस की अपनी राजनीतिक सोच है.

वह कहते हैं, "संघ कोई झाल मंजीरा बजाने वाला संगठन नहीं है. वो सक्रिय रूप से समाज के बीच काम करता है और राजनीति भी उसका एक हिस्सा है."

आम चुनाव में वोटों का जो धुव्रीकरण हुआ, उसकी एक बड़ी वजह देश में दस साल तक राज करने वाली यूपीए सरकार से जनता की हताशा को भी माना जाता है.

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आरएसएस के मुखपत्र पाञ्चजन्य के पूर्व संपादक बलदेव शर्मा कहते हैं, "आम चुनाव में संघ के कार्यकर्ताओं की भूमिका इस दृष्टि से रही कि देश के हालात बदलने हैं. और देश के हालात बदलने हैं तो इसके प्रति जनता को जागरूक करना पड़ेगा. और यही किया गया."

‘सब हिंदू हैं’

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना 1925 में डॉक्टर केशव बलिराम हेडगेवार ने नागपुर में की थी. आरएसएस ख़ुद को राष्ट्र के प्रति समर्पित संगठन बताता है जिसका उद्देश्य समाज को एकजुट करना है.

बलदेव शर्मा कहते हैं, "जो विविध समुदाय और जातियां, विविध वर्ग हमारे समाज में हैं, विशेषकर हिंदू समाज में, उन सबको संघ सिर्फ़ हिंदू मानता है."

वह कहते हैं, “संघ ने समाज का चिंतन कभी टुकड़े-टुकड़े या जाति भेद के आधार पर नहीं किया. हमारे लिए सब हिंदू हैं और हम उनको एक सामाजिक समरसता के सूत्र में पूरे सम्मान और भाईचारे के साथ बांध कर चलते हैं.”

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लेकिन दलित विचारक और दिल्ली की जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर विवेक कुमार कहते हैं कि ये सब सिर्फ़ सांकेतिक बातें हैं.

वह सामाजिक समरसता के लिए सामाजिक संरचना और धार्मिक धारणाओं में आमूल-चूल बदलाव की जरूरत पर जोर देते हैं. वह बताते हैं, “डॉक्टर अंबेडकर ने अपनी पुस्तक जाति का उन्मूलन में लिखा है कि हिंदू और ब्राह्मण की जो बुनियादी बातें हैं हमें उन पर सवाल उठाना होगा.”

विवेक कुमार के मुताबिक आरएसएस हो, जनसंघ हो या फिर भाजपा, ये सभी यही चाहते हैं कि वेदों पर आधारित जो असमान संरचना है, वो बनी रहे और उसी के तहत सांकेतिक प्रतिनिधित्व देकर भाईचारा कायम कर लिया जाए.

कलंक

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लेकिन बलदेव शर्मा इस बात से सहमत नहीं हैं. उनके अनुसार संघ के तीसरे सरसंघचालक बाला साहेब देवरस ने सार्वजनिक जीवन में घोषणा की थी कि अगर छुआछूत कलंक नहीं है तो कुछ भी कलंक नहीं है.

शर्मा बताते हैं कि संघ के प्रातः स्मरण में भारत के अन्य महापुरूषों के साथ अंबेडकर का नाम भी शामिल है और इसे आज नहीं बल्कि संघ के शुरुआती दिनों में लिखा गया था.

दलितों को उद्योग के क्षेत्र में आगे बढ़ाने के लिए सक्रिय संगठन डिक्की से जुड़े दलित विचारक डॉक्टर चंद्र भान प्रसाद मानते हैं, “समाज में उथल-पुथल का दौर चल रहा है जिसमें दलितों का भी मध्यवर्ग तैयार हो रहा है, वे मुख्यधारा का हिस्सा बन रहे हैं और अवसरों को पाने और आगे बढ़ने के लिए ये जरूरी है.”

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Image caption मायावती का यूपी में बड़ा वोट बैंक माना जाता है

चंद्रभान प्रसाद के अनुसार बदलते हालात में दलितों की राजनीति भी बदल रही है. वह कहते हैं, “सामाजिक पहचान के आधार पर जो भी पार्टियां बनी थीं, उनके लिए मौजूदा समय खतरे की घंटी है. उन्हें बदले हालात के मुताबिक बदलना होगा.”

बलदेव शर्मा कहते हैं, “उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी ने दलितों की राजनीति कर सत्ता तक पहुंचना चाहा, लेकिन जब उसे समझ आया कि ऐसा मुमकिन नहीं है तो उसने सर्वजन का नारा अपना लिया.”

उनके अनुसार हालिया आम चुनाव ने साफ कर दिया है कि समाज के विभिन्न तबकों को अलग अलग तरह के डर दिखा कर भारतीय जनता पार्टी से दूर रखने की अन्य पार्टियों की कोशिशें नाकाम रही हैं.

इम्तिहान

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ख़ास कर दलितों वोट बैंक वाली पार्टी समझी जाने वाली बहुजन समाज पार्टी को भले ही आम चुनावों में एक भी सीट नसीब न हुई हो लेकिन आबादी के लिहाज से सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में उसे लगभग 20 प्रतिशत वोट मिले.

ऐसे में प्रोफेसर विवेक कुमार हालिया आम चुनाव के नतीजों राजनीति में किसी बड़े बदलाव की तरह नहीं, बल्कि उन्हें देश में मौजूद तात्कालिक स्थिति और कुछ समीकरणों से जोड़कर देखते हैं.

अगर आरएसएस की ऐसी कोई नई सोशल इंजीनयरिंग है तो उसका एक इम्तिहान कुछ दिनों में होने वाला है, जब हरियाणा और महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के नतीजे सामने आएंगे.

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