बाबरी मस्जिद पर 'फिर बातचीत शुरू'

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बाबरी मस्जिद-रामजन्मभूमि विवाद को सुलझाने की कोशिश के तहत दोनों पक्षों के धार्मिक नेताओं के बीच बातचीत की पहल हुई है.

माना जा रहा है कि ताज़ा पहल को केंद्र सरकार में शीर्ष पर बैठे लोगों का परोक्ष समर्थन हासिल है.

वैसे प्रधानमंत्री मोदी ने अब तक इस मसले पर कुछ नहीं बोला है लेकिन देर-सबेर उन्हें इस विवाद का हल खोजना ही होगा.

लेकिन क्या इस विवाद का वाकई हल हो सकता है?

कोशिशें

विवादित भूमि पर हिंदू संगठन अपना दावा मज़बूती से जता रहे हैं.

प्रधानमंत्री के क़रीबी समझे जाने वाले गुजरात के उद्यमी ज़फ़र सरेशवाला की बातों से ताज़ा पहल से जुड़ी सोच का अंदाज़ा मिलता है.

वे कहते हैं, "बाबरी-मस्जिद राम जन्मभूमि विवाद अगर बातचीत से हल किया जाए तो इसमें कोई बुराई नहीं है और जब बातचीत होगी तो फिर अपनी पोजीशन से हटना भी पड़ता है, कुछ समझौते भी करने पड़ते हैं."

विश्व हिंदू परिषद विवादित भूमि पर राम मंदिर बनाना चाहती है और उसे पता है कि क़ानूनी और राजनीतिक दृष्टि से यह तभी संभव होगा जब मुसलमान उस भूमि पर अपना दावा छोड़ दें.

वीएचपी के प्रवक्ता डॉक्टर सुरेंद्र जैन कहते हैं, "यह मुसलमानों को तय करना है कि वह अपनी पहचान बाबर और ग़ज़नवी जैसे विदेशी हमलावरों से करना चाहते हैं या उन्हें भारत राष्ट्र से जुड़ना है."

जयेंद्र सरस्वती की पहल

पिछले दिनों शंकराचार्य स्वामी जयेंद्र सरस्वती ने इस विवाद को बातचीत के ज़रिए हल करने के लिए लखनऊ में मुसलमानों के एक धार्मिक नेता मौलाना ख़ालिद रशीद फ़िरंगीमहली से मुलाकात की थी.

समझा जाता है कि यह पहल उन्होंने प्रधानमंत्री की सहमति से की है.

अयोध्या के हाशिम अंसारी विवादित भूमि के मालिक़ाना हक़ का मुकदमा लड़ते-लड़ते 92 साल के हो चुके हैं. वे कहते हैं कि विवादित भूमि पूरी की पूरी किसी एक पक्ष को देनी चाहिए.

हाशिम अंसारी का मुक़दमा अब सुप्रीम कोर्ट में है.

वीएचपी ने केंद्र सरकार से मांग की है कि वह तुरंत एक अध्यादेश जारी करके अयोध्या की विवादित भूमि को रामजन्मभूमि मंदिर ट्रस्ट के हवाले कर दे.

इस पर मुसलमानों की प्रतिक्रिया क्या होगी, यह सबसे बड़ा सवाल है.

(क्या कहते हैं विवाद पर मुसलमान? शकील अख़्तर की विशेष रिपोर्ट के भाग 2 में....कुछ ही घंटे में)

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