पाक मीडिया: मोदी वाजपेयी जैसे नहीं हैं!

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सीमा पर तनाव से पैदा हालात लगातार पाकिस्तानी मीडिया में छाए हैं, लेकिन कुछ नए बयानों और नए तर्कों के साथ.

नवाए वक़्त लिखता है कि जब तक कश्मीर समस्या का हल संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव के मुताबिक़ नहीं होगा, तब तक सरहद पर स्थायी शांति मुमकिन नहीं है.

अख़बार लिखता है कि कश्मीर मुद्दा ही दोनों देशों के बीच दुश्मनी की बुनियाद है.

पाकिस्तान इसे संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों के मुताबिक़ सुलझाना चाहता है लेकिन भारत इन प्रस्तावों को मानने के बावजूद इन पर अमल करने को तैयार नहीं है.

दख़ल की अपील

वहीं दैनिक एक्सप्रेस ने कश्मीर मुद्दे पर अंतरराष्ट्रीय दख़ल देने के लिए पाकिस्तान की दलील को उचित ठहराया है.

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अख़बार कहता है कि मोदी सरकार कश्मीर मुद्दे पर बातचीत को तैयार ही नहीं दिखती है, इसीलिए पाकिस्तान इस मुद्दे पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय से मदद लेने को मजबूर हुआ है.

जंग लिखता है कि भारतीय जनता के पार्टी की पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी की मिल जुल कर चलने की नीति के विपरीत मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नीति आक्रामक है.

अख़बार के अनुसार पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ तो भारतीय प्रधानमंत्री के शपथ ग्रहण समारोह में हिस्सा लेने दिल्ली तक भी गए लेकिन मोदी ने तो न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा के दौरान शरीफ़ से मिलने का मौका भी गंवा दिया.

'ग़रीबी नहीं, ग़रीब निशाने पर'

रोज़नामा दुनिया ने प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ से इस बयान पर संपादकीय लिखा है कि उन्हें डेढ़ करोड़ लोगों ने वोट देकर प्रधानमंत्री बनाया है जबकि उनका इस्तीफ़ा मांगने वालों की संख्या सिर्फ पांच दस हज़ार लोग है.

देश के सियासी गतिरोध के बीच अख़बार की टिप्पणी है कि प्रधानमंत्री इस्तीफ़ा न दें लेकिन देश के हालात तो संभाल लें.

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अख़बार ने कहा है कि बढ़ती महंगाई, बिजली संकट, रिश्वत, भ्रष्टाचार जैसे समस्याओं पर तुरंत ध्यान नहीं दिया तो डेढ़ करोड़ क्या पूरे देश के 18 करोड़ इस्तीफा मांगने लग जाएंगे.

औसाफ़ का कार्टून भी कुछ ऐसा ही है जिसमें लगभग कंकाल दिखने वाले एक आम आदमी की छाती पर गोली से निशाना साधा हुआ दिखाया गया है और ऊपर लिखा है – पाकिस्तान समेत दुनिया में विश्व ग़रीबी दिवस मनाया गया.

'मुशर्रफ़ की ख़्वाहिश'

रुख़ भारत का करें तो बैंगलोर में तीन मणिपुरी छात्रों पर हुए हमले पर हिंदोस्तान एक्सप्रेस लिखता है कि ये अमानवीय और असामाजिक है.

अख़बार के मुताबिक़ ऐसी मारपीट से क्षेत्रवाद को हवा मिलती है, जिसे रोकने और बैंगलोर में रहने वाले अन्य लोगों को सुरक्षा देने की ज़िम्मेदारी सरकार की है.

हमारा समाज ने अपने संपादकीय में कश्मीर पर पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ़ के हालिया विवादस्पद बयान का ज़िक्र किया है.

अख़बार कहता है कि जिस तरह से मुशर्रफ़ ने भारत के ख़िलाफ़ ज़हर उगला है उससे लगता है कि या तो वो भारत और पाकिस्तान के बीच जंग के ख़्वाहिशमंद है या वो नहीं चाहते हैं कि भारत-पाक सीमा पर हो रहा है वो न रुके.

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