क़ानून बनाने से भूख नहीं मिटती

झारखंड का ग़रीबी रेखा से नीचे का परिवार इमेज कॉपीरइट Niraj Sinha

झारखंड में खाद्य सुरक्षा अधिनियम समेत तमाम सरकारी योजनाओं को लेकर आम जनता को ढेरों शिकायतें हैं.

कई ग़रीब परिवारों के पास ग़रीबी रेखा से नीचे (बीपीएल) होने का कार्ड तक नहीं है.

बीपीएल कार्ड के अभाव में राज्य के हज़ारों ग़रीबों को सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं मिल पा रहा है.

इसके अलावा खाद्य सुरक्षा अधिनियम जैसी योजनाओं में पारदर्शिता का भी अभाव है.

जनता का मानना है कि नेता केवल चुनाव के समय उन्हें पूछते हैं, उसके बाद वो जनता की सुध नहीं लेते.

पढ़ें नीरज सिन्हा की रिपोर्ट विस्तार से

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Image caption मंगरा भोगता ग़रीब तो हैं लेकिन उनका पास ग़रीबी प्रमाणित करने वाला बीपीएल कार्ड नहीं है.

जब कई दिनों तक पेट में खाना न जाए तो अंतड़ियां सूखने लगती हैं, ये कोई डॉक्टरी ज्ञान नहीं, बल्कि झारखंड के सैकड़ों परिवारों का रोज़मर्रा का अनुभव है.

48 साल के मंगरा भोगता झारखंड की राजधानी रांची से क़रीब 45 किलोमीटर दूर जंगल-पहाड़ से घिरे बीसा गांव में रहते हैं.

मंगरा कहते हैं कि वोट लेते वक़्त उनकी ख़ूब ख़ातिरदारी होती है, लेकिन चुनाव बीतते ही वो एक वक़्त की रोटी के लिए भी तरस जाते हैं.

सरकारी राशन केंद्रों पर लाल और पीले कार्डों की उलझन में वो सिर्फ़ लाइन में ही खड़े रह जाते हैं और ख़ाली हाथ घर लौटते हैं.

डबडबाती आंखों के साथ मंगरा बताते हैं कि उनके पास बीपीएल का कार्ड भी नहीं, जिससे ग़रीबों के हितों वाली सरकारी योजनाओं का लाभ मिल सके.

वे रूंधे स्वर में कहते है, "कैसा क़ानून और किसके लिए." हमने उनसे पूछा था कि क्या खाद्य सुरक्षा क़ानून का कोई लाभ मिल रहा है.

यह बेबसी, अकेले मंगरा की नहीं है. उनकी आंखों में झारखंड के दूरदराज़ इलाक़ों के लाखों ग़रीब परिवारों का दर्द झलकता है.

खाद्य सुरक्षा कानून

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खाद्य सुरक्षा अधिनियम के बारे में जानकारी और लाभ के सवाल को लेकर पीछे हम झारखंड के दूरदराज़ के कई गांवों में गए और लोगों से बात की.

कई गांवों में ज़्यादातर लोगों को इस क़ानून के बारे में पता ही नहीं है. ऐसे में उनसे उनके हक़ के लिए संघर्ष करने की उम्मीद करना भी बेमानी है.

जिन सरकारी योजनाओं के बारे में वे जानते हैं, उनकी भी पारदर्शिता पर वहां के लोगों को शक है.

झारखंड में उन्हीं ग़रीबों को सरकारी योजनाओं का लाभ मिलता है जिनके पास लाल कार्ड हैं.

राज्य में पहले से 23.94 लाख बीपीएल परिवार हैं.

सरकार के ग्रामीण विकास विभाग ने 2010 में सर्वेक्षण कर अतिरिक्त 11,44,860 परिवारों को चिह्नित किया था.

इन अतिरिक्त बीपीएल परिवारों को सिर्फ़ नंबर मिला है, किसी प्रकार का कार्ड नहीं. लिहाज़ा उन्हें इंदिरा आवास, इलाज के लिए सरकारी सहायता समेत अन्य सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं मिलता.

सैकड़ों के नाम नहीं

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वहीं बहुत से ग्रामीण परिवार अपनी ग़रीबी, फटेहाली का दावा करते हैं लेकिन बीपीएल की किसी श्रेणी में उनके नाम शामिल नहीं हैं.

बीसा गांव की पानो देवी और बरसो देवी की शिकायत थी कि सरकारी बाबुओं ने बीपीएल की सूची में नाम चढ़ाने के मामले में हक़ीक़त जाने बिना काग़ज़ तैयार कर दिए. इससे बहुतों के नाम बीपीएल की सूची से गायब हो गए.

अतिरिक्त बीपीएल परिवारों को सरकार एक रुपए किलो की दर से 35 किलो अनाज मुहैया कराती है.

सरकारी दस्तावेज़ बताते हैं कि अभी 11,15,833 परिवारों को सरकार अनाज मुहैया करा रही है. लेकिन इसमें भी तमाम अड़चनें हैं.

एक ग्रामीण चरकू बताते हैं कि कई दफ़ा दो-तीन महीने तक अनाज नहीं मिलते. कई मौक़े पर 35 किलो से घटाकर 21 किलो अनाज दिए गए.

सरकारी योजनाएं मतलब भ्रष्टाचार?

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75 की उम्र पार कर रही चमनी देवी और उनके पति को मलाल है कि अनाज तो दूर वृद्धा पेंशन पाने के लिए भी उन्हें दर-दर भटकना पड़ता है.

कोरचा भोक्ता कहते हैं, “अक्सर सरकारी राशन दुकान वाले झिड़क कर भगा देते हैं. पूछा जाता है कि लाल कार्ड है, पीला कार्ड है. केरोसिन तेल भी सरकार नहीं देती, ताकि ढिबरी जला सकें.”

बीबीसी का कैमरा देखते ही कोरचा कह उठे, “पूरे गांव की फ़ोटू खींच लीजिए ताकि सरकारी बाबुओं को पता चले हम किस हाल में रहते हैं.”

हाथियों के हमले में आश्रय खो चुकी शांति देवी ग़ुस्से में कहती हैं, “कई दफ़ा सर्वे करने वाले आए. नाम पता लिख- पढ़ कर ले गए पर पता नहीं वो सरकार की किस गठरी में बंद हो जाती है.”

पानो देवी कान छूकर कहती है, "झूठ नहीं बोलूंगी, कभी सरकार से अनाज नसीब नहीं हुआ."

क़ानून के 14 महीने बाद?

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पिछले साल केंद्र में यूपीए की सरकार ने खाद्य सुरक्षा अधिनयिम 2013 बनाने के बाद इसे लागू करने के लिए जुलाई में सभी राज्यों को आवश्यक दिशा-निर्देश भेजे थे.

लेकिन 14 महीने गुज़र गए, झारखंड में अब तक खाद्य सुरक्षा अधिनियम का लाभ लोगों को नहीं मिला. जबकि बग़ल के बिहार और छत्तीसगढ़ राज्यों में इस साल की शुरुआत में ये क़ानून लागू हो गया है.

क़ानून बनने के कई महीनों बाद अब झारखंड की राज्य मंत्री परिषद ने इसे मंज़ूरी दे दी है, लेकिन इसे लागू किए जाने में अभी कई प्रक्रियाएं बाक़ी हैं.

राज्य में खाद्य सार्वजनिक वितरण विभाग के मंत्री लोबिन हेंब्रम कहते हैं, “हमनें तो हाल ही में मंत्री पद की ज़िम्मेदारी संभाली है. दरअसल अधिनियिम लागू करने की कई शर्तें, प्रावधान हैं. हमारी कोशिश है कि जल्दी ही लोगों को इसका लाभ दिला सकें.”

लोबिन हेंब्रम के अनुसार झारखंड में 50 लाख से ज़्यादा परिवारों को इस अधिनियम का लाभ मिलेगा.

प्रावधान

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इस अधिनयम के तहत राज्य की 86.48 प्रतिशत ग्रामीण जनसंख्या और 60.20 प्रतिशत शहरी जनसंख्या को कवर किया जाना है.

घर के हर सदस्य को अनुदानित दर पर पांच किलो अनाज उपलब्ध कराया जाना है. खाद्यान आपूर्ति नहीं होने की स्थिति में खाद्य सुरक्षा भत्ता दिया जाना है.

इनके साथ ही आंगनबाड़ी केंद्रों से गर्भवती, स्तनपान कराने वाली महिलाएं और छह साल तक के बच्चों को भी भोजन दिए जाने का प्रावधान है.

खाद्य सुरक्षा मामले पर पर सर्वोच्च न्यायालय के राज्य सलाहकार बलराम का आरोप है कि भोजन के अधिकार के प्रति राज्य सरकार क़त्तई गंभीर नहीं है.

उनका दावा है कि 26 जून को सरकार ने ग़रीबों को सस्ती दर पर दो किलो चीनी देने और 25 अगस्त को सरकारी स्कूलों के बच्चों के हफ़्ते में तीन दिन अंडे देने के फ़ैसले भी कैबिनेट की बैठक में लिए गए थे, जो अब तक नहीं बंटी. ऐसी कई अन्य भी योजनाएं लटकी हुई हैं.

जानकारों का कहना है कि खाद्य सुरक्षा अधिनयिम को लागू करने के लिए पारदर्शिता और जवाबदेही भी तय की जानी है, जो सरकार अब तक नहीं कर सकी है.

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