'...तो मैं मोदी का माथा चूम लूँगा'

  • 22 अक्तूबर 2014
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कश्मीर जाकर बाढ़ पीड़ितों के साथ दीपावली मनाने के फैसले पर बाढ़ प्रभावितों ने मिली-जुली प्रतिक्रियाएं दी हैं.

करीब 300 राहत शिविरों में रह रहे बाढ़ पीड़ितों में से कोई मोदी की इस क़दम के लिए उनकी प्रशंसा कर रहा है तो किसी को ये उम्मीद है कि वे ज़मीनी स्तर पर उनके लिए कुछ करेंगे.

बाढ़ प्रभावितों के लिए आई राहत सामग्री कश्मीर हवाई अड्डे पर पड़ी है. राहत के काम में लगे लोगों में भी मोदी के आगमन ने आशा जगा दी है.

पढ़ें रियाज़ मसरूर की रिपोर्ट विस्तार से

भारत प्रशासित कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के आवास के नज़दीक सड़क किनारे राहत शिविरों में करीब दो सौ लोग रह रहे हैं. अब्दुल राशिद उनमें से एक हैं.

अब्दुल राशिद कहते हैं, "हमने ईद नहीं मनाई तो दीपावली के बारे में कैसे सोचें? मैं और मेरे दो भाइयों का मकान बाढ़ में बह गया. हमारे परिवार में दस लड़कियां हैं और इस वक्त वे सभी इस तिरपाल के घर में रहने को मजबूर हैं. मैंने भी प्रधानमंत्री के आने के बारे में सुना है. उम्मीद है वे हमारे शिविरों में भी आएंगे और हमारे हालात देखेंगे."

यहां ऐसे राहत शिविरों की संख्या करीब 300 है जिसमें लोग तंबुओं में लोग ज़रूरी सामानों की भारी किल्लत के बीच रह रहे हैं.

तकलीफ बांटने

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के राजनीतिक विरोधियों ने तो फिलहाल चुप्पी साध रखी है लेकिन फेसबुक और ट्विटर जैसी सोशल नेटवर्किग साइटों पर मोदी के दीपावाली पर कश्मीर जाने को लेकर आलोचनाओं की झड़ी लग गई है.

दूसरी ओर, कश्मीर में सितंबर में आए विनाशकारी बाढ़ में बेघर हुए लोगों की भावनाएं इससे कुछ हटकर दिखीं. बिलाल अहमद एक स्थानीय ऑटो चालक हैं. बाढ़ ने उनका घर छीन लिया.

बिलाल मोदी के कश्मीर में दीपावली मनाने के फैसले पर कहते हैं, "मोदी यहां पार्टी करने नहीं आ रहे. उन्होंने हमारी तकलीफ बांटने के लिए अपनी त्यौहार की छुट्टी भी कुर्बान कर दी. लेकिन इतना काफी नहीं. यदि वे हमारा भला चाहते हैं तो उन्हें बेघरों के शीघ्र पुर्नवास की व्यवस्था करनी होगी."

पुलिस की धमकी

मोदी से मिलने की आस लगाए इन बाढ़ पीड़ितों की विडंबना ये है कि पुलिस ने सड़क किनारे बने उनके अस्थाई आशियानों को हटाना शुरू कर दिया है.

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रज़ा बेगम ने बताया, "हमने टीवी पर सुना कि मोदी हमारा दुख-दर्द बाँटने आ रहे हैं. लेकिन पुलिसवाले हमें धमका रहे हैं. वे कह रहे हैं कि हमने वीआईपी रोड पर तंबू गाड़ रखे हैं. उन्होंने हमें प्रधानमंत्री के आने से पहले यहां से चले जाने को कहा है." ये सब बताते हुए रजा बेगम के चेहरे पर दर्द उभर आता है.

बेगम उदासी भरे स्वर में कहती हैं, "मुझे ज्यादा खुशी तब होगी जब वे हमसे मिलने यहां आएंगे. मोमबत्ती जला देना काफी नहीं है."

एक अन्य बाढ़ पीड़ित मोहम्मद अब्दुल्ला कोसा और उनका परिवार खामोश है. उनसे जब मोदी के दीपावली पर कश्मीर आने के बारे में पूछा गया तो कोसा रो पड़े.

Image caption कश्मीर बाढ़ पीड़िता दिलशाद.

उन्होंने कहा, "दीपावली रोशनी का त्यौहार है, लेकिन मोदी को ये पता होना चाहिए कि पिछले सात हफ्तों से हम अंधेरे में खाना खा रहे हैं. अगर वे सचमुच हमारे लिए कुछ करना चाहते हैं तो उन्हें हम जैसे बेघर लोगों के लिए स्थाई आशियाने का बंदोबस्त करना चाहिए."

राहत सामग्री

शादाब खान युवा स्वंयसेवक हैं जो बेघरों की मदद में जुटे हैं. वे कहते हैं, "हवाई अड्डे पर पांच हजार टन राहत सामग्री पड़ी हुई है. यदि हमें उसे बाढ़ पीड़ितों के बीच बांटने की इजाजत मिल जाए तो मैं मोदी का माथा चूम लूंगा. स्थानीय शासन हमारी मदद नहीं कर रहा."

इस बीच प्रधानमंत्री के घाटी आगमन कार्यक्रम को लेकर सुरक्षा व्यवस्था चाक-चौबंद की जा रही है.

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अबदुल राशिद का कहना है, "मोदी की चिंता असली है या राजनीतिक, ये तो नहीं मालूम. मगर ऐसा पहली बार हो रहा है कि देश का प्रधानमंत्री कश्मीर मामलों में इतनी दिलचस्पी ले रहा है. अगर वे स्थानीय शासन को अधिक सक्रिय बना पाते हैं तो हमारे लिए यही दीपावली का उपहार होगा.

आधिकारिक आंकड़े बताते हैं कि कश्मीर में सितंबर के शुरू में आए विनाशकारी बाढ़ में लाखों लोग प्रभावित हुए.

इस बाढ़ में करीब 300 लोगों की मौत हो गई.

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