क्या टल जाएगी कोली की फांसी?

  • 26 अक्तूबर 2014
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निठारी हत्याकांड में दोषी ठहराए गए सुरेंदर कोली की पुनर्विचार याचिका पर सुप्रीम कोर्ट 28 अक्तूबर को सुनवाई करने वाला है.

इससे पहले फांसी की सज़ा के ख़िलाफ़ कोली की पुनर्विचार याचिका को अदालत ने ख़ारिज कर उन्हें फांसी देने का आदेश दिया था.

वकीलों के एक ग्रुप ने उन्हें सितंबर में फांसी दिए जाने के एक दिन पहले ही रात में सुप्रीम कोर्ट में एक और याचिका दायर की थी.

न्यायिक गलियारों में कोली की फांसी की सज़ा पर बहस छिड़ी हुई है. इस बहस से जुड़े अलग-अलग पहलुओं पर ख़ास पड़ताल.

कोली को फांसी देने के मुद्दे पर ख़ास पड़ताल

निठारी हत्याकांड के सिलसिले में कोली के ख़िलाफ़ कुल 16 अलग-अलग मामले दायर किए गए हैं.

मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और क़ानूनविदों की एक बड़ी जमात का मानना है कि यदि कोली को फांसी दी जाती है तो बाक़ी के 15 न्यायिक मामले प्रभावित होंगे.

जल्दी पर सवाल

मानवाधिकार कार्यकर्ता मनीषा सेठी कहती हैं कि जब इस कांड से संबंधित कई मामले निचली अदालतों में चल रहे हैं तो फिर कोली को फांसी देने की जल्दी क्या है?

वो कहती हैं, "वैसे तो कुल 16 मामले हैं. रिम्पा हलधर का मामला पहला मामला है जो सुप्रीम कोर्ट तक गया है. बाक़ी केस अभी भी निचली अदालतों में चल रहे हैं. सारे मामले सुप्रीम कोर्ट से तय नहीं हुए हैं. पहले ही मामले में फांसी से बाक़ी के मामले लटक जाएंगे."

हालांकि निठारी कांड में मोनिंदर सिंह पंधेर को भी अभियुक्त बनाया गया, लेकिन पहले मामले में उन्हें अदालत ने बरी कर दिया है. कोली पंधेर की नौकरी करते थे.

पंधेर के ख़िलाफ़ बाक़ी केस निचली अदालतों में चल रहे हैं.

मेरठ जेल में अपने बेटे से मिलने आई कोली की मां ने अपील करते हुए कहा कि अगर उसे फांसी दी जाती है, तो इस मामले का एक हिस्सा पूरी तरह से ख़त्म हो जाएगा और बाक़ी के दोषियों को सज़ा नहीं मिल पाएगी.

बचाव पक्ष के आरोप

वकीलों के समूह 'डेथ पेनल्टी लिटिगेशन ग्रुप' का मानना है कि अदालत ने कोली के मजिस्ट्रेट के सामने दिए गए इक़बालिया बयान को ही सज़ा का आधार बनाया है.

उनका यह भी आरोप है कि कोली ने ख़ुद अपने बयान में कहा कि जांचकर्ता पुलिस अधिकारियों ने कई बातें उनसे जबरन कहलवाई थीं.

इसी ग्रुप ने कोली की फांसी के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा आधी रात को खटखटाया था.

वकील युग मोहित चौधरी ने बीबीसी से कहा, "दो महीने की पुलिस हिरासत के बाद फ़ौरन कोली को मजिस्ट्रेट के सामने खड़ा कर दिया गया. ज़ाहिर है उन्हें जो सिखाया गया है, वही कहेंगे. कोली ने पुलिस हिरासत में यातनाएं दिए जाने का भी आरोप लगाया है."

जांच के पहलू

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Image caption कोली की माँ का कहना है कि फांसी से बाक़ी दोषियों को सजा नहीं मिल पाएगी.

मनीषा सेठी को लगता है कि निठारी हत्याकांड में पुलिस जांच ठीक तरह से नहीं हो पाई है, क्योंकि अभी भी जांच के कई ऐसे पहलू हैं जो अनछुए हैं.

मिसाल के तौर पर उनका कहना है कि पड़ोस के एक घर के नौकर को मामले का गवाह बनाया गया है जिसने अदालत को बताया कि उसका मालिक मानव अंगों की तस्करी में संलिप्त रहा है और जेल भी जा चुका है.

मनीषा का कहना है कि जांच अधिकारियों ने इस पहलू की जांच तक नहीं की.

युग मोहित चौधरी कहते हैं कि निठारी कांड में कोली के इक़बालिया बयान के अलावा सज़ा सुनाने के लिए किसी भी सबूत को संज्ञान में नहीं लिया गया.

उनकी मानें तो अपराध प्रक्रिया संहिता यानी सीआरपीसी की धारा 164 के तहत दिया गया बयान बिना किसी दबाव के होना चाहिए न कि पुलिस द्वारा रटवाने या यातनाएं देने के बाद.

चौधरी कहते हैं कि जब कोली ने ख़ुद कहा है कि उसने कई बातें पुलिस के रटवाने के बाद कही हैं तो इस बयान के आधार पर फांसी की सज़ा सुनाना न्याय हित में नहीं है.

मामलों पर असर नहीं

मगर उत्तर प्रदेश सरकार के अभियोजन अधिकारी राकेश कुमार मिश्र का कहना है कि अदालत ने कोली को पूरे हत्याकांड का मुख्य दोषी मानते हुए फांसी की सज़ा सुनाई है.

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वो कहते हैं कि ऐसा नहीं है कि कोली की फांसी से बाक़ी मामले प्रभावित होंगे.

मिश्र कहते हैं, "बाक़ी अभियुक्तों के ख़िलाफ़ मामले जारी रहेंगे. सिर्फ कोली के ख़िलाफ़ दर्ज मामले 'अबेट' कर दिए जाएंगे. दूसरे अभियुक्तों के ख़िलाफ़ अभियोजन पक्ष अदालत में सबूत पेश करेगा."

वहीं उत्तर प्रदेश के महाधिवक्ता विजय बहादुर सिंह का भी कहना है कि जब एक मामले में सर्वोच्च सज़ा हो गई है तो अन्य मामलों का कोई अर्थ नहीं रह जाता.

अब सबकी निगाहें सुप्रीम कोर्ट पर टिकी हैं, जो 28 अक्टूबर को सुरेंद्र कोली की फांसी की सज़ा के ख़िलाफ़ दायर पुनर्विचार याचिका की सुनवाई करेगा.

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