'दंगे फिर लव जिहाद, डर गहरा होता जाता है'

भागलपुर दंगा पीड़ित का अनुभव

अक्सर कहा जाता है कि दंगों का सबसे ज़्यादा शिकार महिलाएं और मासूम बच्चे होते हैं.

बिहार के भागलपुर में 1989 में हुए दंगे के पीड़ितों की कहानियों से भी कुछ ऐसा ही मंज़र उभरता है.

दंगों के वक़्त भागलपुर में नाथनगर प्रखंड के तमौनी गांव के मोहम्मद महमूद की उम्र तक़रीबन पांच साल थी.

दंगों के कारण महमूद का बचपन छिन गया. भागलपुर दंगों पर बीबीसी हिंदी की विशेष प्रस्तुति की अगली कड़ी.

महमूद की कहानी उन्हीं की ज़ुबानी

24 अक्तूबर 1989 को भागलपुर शहर में दंगों की शुरुआत हुई. मुझे बहुत कुछ साफ साफ याद नहीं. पांच साल के बच्चे को ऐसी हिंसा क्या समझ में आएगी. मुझे भी नहीं आ रही थी.

बस इतना याद है कि कैसे मेरी मां, बहनें -पूरा परिवार डरा हुआ था. दहशत की ऐसी छाया पहले कभी नहीं देखी थी मैंने.

बाकी बरस बीतते हुए अपने परिवार के बड़े-बूढ़ों से सुना कि दंगे से पहले हमारी दुनिया कैसी थी और उसके बाद जो कुछ हो रहा था - मैं उसे जी रहा था और दंगे की कुछ धुंधली तस्वीर ज़हन में साफ होती चली गई.

25 अक्तूबर को मेरे गांव के आसपास दंगे का असर दिखना शुरू हुआ. बगल के गांव गोटीपोखर में क़रीब दो हज़ार लोग ‘बजरंग बली की जय’ और दूसरे नारे लगा रहे थे.

हालांकि मेरे गांव में केवल मुस्लिम ही रहते थे पर 25 अक्तूबर को भी कई हिंदू रोज़ की तरह हमारे गांव काम करने आए थे.

उस दिन स्थानीय पुलिस भी गांव आई थी लेकिन सुरक्षा का भरोसा देने के बाद भी वह दोबारा नहीं आई.

एफ़आईआर दर्ज नहीं

अगली रात लगभग 10 बजे दंगाई दक्षिणी हिस्से से गांव में घुसे.

तब तक मैं अपनी मां और बहन के साथ धान के खेतों की आड़ लेता हुआ पड़ोस के दूसरे मुस्लिम गांव सिमरिया पहुंच गया था.

26 अक्तूबर को 11 लोग दंगाइयों के हमले में मारे गए जिनमें बूढ़ी महिलाएं भी थीं. दर्जनों घायल हुए जिनमें मेरे बड़े भाई भी शामिल थे.

मगर किसी भी घायल की शिकायत थाने ने स्वीकार नहीं की.

सुरक्षा बलों के भरोसे

हमारे घर को भी लूटकर उसमें आग लगा दी गई. हमारे पास दस जोड़े मवेशी थे. दंगाई उन्हें ले गए.

Image caption भागलपुर शहर में दंगों की शुरुआत हुई तब महमूद की उम्र पांच साल थी.

हिंदू आबादी में पड़ने वाली अपनी ज़मीन हमें क़रीब आधी क़ीमत पर बेचनी पड़ी.

दंगे के एक सप्ताह बाद हमारा पूरा परिवार एक साथ मिल पाया. लगभग एक महीने बाद सुरक्षा बलों के यक़ीन दिलाने पर हम गांव लौटे.

दंगे ने मेरा बचपन छीन लिया, मेरी पढ़ाई पर असर पड़ा. दो साल बाद मैंने पास के हिंदू गांव में स्कूल जाना शुरू किया.

वहां से कभी लौटने में देर हो जाती, तो घर वाले ढूंढने आ जाते. उनको डरा देखकर मैं भी सहम जाता था.

ईमानदारी

गांव में क़ब्रिस्तान को लेकर तनाव साल 2010 तक बना रहा. हाल के दिनों में जब भागलपुर में लव-जिहाद जैसे मुद्दे पर तनाव फैलाने की कोशिश हुई तो उसकी तपिश मेरे गांव तक भी पहुंची.

मेरा डर आज और गहरा हो जाता है.

भविष्य में दंगे रोकने के लिये प्रशासन को अफ़वाहों पर मुस्तैदी से रोक लगाना होगा. साथ ही यह भी सुनिश्चित करना होगा कि पुलिस ईमानदारी से काम करे.

दंगे ने मुझे आगे बढ़ने के मौक़ों से वंचित कर दिया गया और इस कारण आज मैं दूसरे युवाओं के मुक़ाबले ख़ुद को पिछड़ा हुआ पाता हूं. अगर मेरा बचपन खौफ़ से पटा न होता शायद हम भी कामयाबी के नए किस्से गढ़ते. ज़्यादा उम्र तो आस पास भरे मवाद से निपटने में ही निकल गई.

दंगों के कारण इलाक़े में हिंदू और मुसलमानों के रिश्तों में जो दरार पैदा हुई वह अब तक नहीं भरी है.

(मनीष शांडिल्य से बातचीत पर आधारित)

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