कंपनियों की समाज सेवा या दान का कारोबार!

  • 1 नवंबर 2014
corporate social responsibility, कंपनियों की सामाजिक जिम्मेदारी

मानो वो रंगों की लड़ाई थी. पीले रंग के गेंदे के फूल और गुलाबी गुलाब धूप में बिखरे पड़े थे.

लेकिन त्योहारों के इस मौसम में इन्हें बिखेर रहे लोग खुद इन्हें देख नहीं सकते थे. वे सभी नेत्रहीन थे.

उन्होंने दिल्ली के होटलों और मंदिरों से टनों की मात्रा में फेंक दिए गए फूलों से क़ुदरती रंग बनाने के लिए चुना था.

ये रंग हमारी त्वचा को नुक़सान नहीं पहुँचाते हैं और इनका इस्तेमाल हिंदुओं के पर्व त्योहारों में होता है.

ये कार्यक्रम चलाने वाली ग़ैर सरकारी संस्था 'सोसायटी फ़ॉर चाइल्ड डेवलपमेंट' का कहना है कि इस तरह से उन्होंने न केवल शहर के कचरे का बोझ कम किया बल्कि अपने लिए और दूसरों के लिए जीविका भी कमाई.

कारोबारी हल

लेकिन उनका कहना है कि भलाई का काम मसले का हल नहीं है. वे अपना सामान बेचने के लिए एक बाज़ार तलाश रहे हैं.

इस ग़ैर सरकारी संगठन की निदेशक मधुमिता पुरी का कहना है कि हम गरीबी के ख़िलाफ़ लड़ रहे हैं लेकिन ये वो मौजूदा पीढ़ी के सामने मौजूद सबसे बड़ा अनसुलझा मसला है.

वे कहती हैं, "मुझे लगता है कि इसका कोई कारोबारी हल होना चाहिए."

नेत्रहीन और दिमाग़ से कमज़ोर लोगों को ज़िंदगी में कुछ कर सकने की क़ाबिलियत सिखाने के लिए वे कॉरपोरेट्स और बड़े कारोबारियों से मदद मांगते हैं.

सामाजिक ज़िम्मेदारी

कचरे को उपभोक्ता वस्तु में बदलने की चैरिटी का कारोबार पिछले साल डेढ़ सौ फ़ीसदी की दर से बढ़ा है.

यहां तक कि वॉलमार्ट जैसी अमरीकी कंपनियां उनसे जुड़ी हैं. इस साल उन्होंने बेकार छोड़ दिए गए फूलों से 18 टन रंग बनाए थे और अब वे फेंके गए कपड़ों से लैम्प बना रहे हैं.

वॉलमार्ट का कहना है कि वे कोई चंदा नहीं दे रहे हैं बस उनका कारोबार खड़ा करने में अपनी विशेषज्ञता की मदद दे रहे हैं.

और ये सब कुछ वॉलमार्ट की सामाजिक ज़िम्मेदारी पूरा करने का हिस्सा नहीं है. वे बस अपना सामान्य कारोबार कर रहे हैं. और इसका फ़ायदा भी उन्हें मिलता हुआ दिख रहा है.

दान का कारोबार

अगले साल वे होली के लिए अपने ऑर्डर बढ़ाकर दोगुणी कर देना चाहते हैं.

केवल बड़े कारोबारी ही नहीं बल्कि बल्कि व्यक्तिगत स्तर भी ऐसी कोशिशें करने वाले लोग हैं. दान देने का चलन हमेशा से भारतीय समाज में रहा है.

मंदिरों और मस्जिदों के बाहर ग़रीबों को दान लेते हुए देखा जा सकता है. इसके पीछे धार्मिक वजहें होती हैं.

लेकिन जैसे जैसे भारत की अर्थव्यवस्था बढ़ रही है, लोगों का नज़रिया तेज़ी से बदल रहा है. और दान देने का कारोबार महज़ पैसे देने से आगे निकल गया है.

2012 में चैरीटीज़ एड फ़ाउंडेशन की ओर से कराए गए सर्वे में कहा गया कि भारत दुनिया की कॉरपोरेट समाज सेवा का बड़ा केंद्र बनने की क्षमता रखता है.

समाज सेवा की अहमियत

इस रिपोर्ट के मुताबिक़ भारत के 80 फ़ीसदी लोग साल में कम से कम एक बार चंदा ज़रूर देते हैं.

भारतीय लोग विकलांग, बेघर, बूढ़ों और पढ़ाई लिखाई के नाम पर पैसा देने से गुरेज़ नहीं करते हैं.

ग़ैरसरकारी संगठन गूंज के अंशुल गुप्ता कहते हैं कि भारत में समस्याएँ इतनी बड़ी हैं कि केवल आर्थिक विकास से चीज़ें सुलझने वाली नहीं हैं. समाज सेवा की अपनी अहमियत है.

समाज सेवा के कारोबार में उनके संगठन ने खूब तरक़्क़ी की है. जम्मू कश्मीर के बाढ़ पीड़ितों के लिए गूंज ने हाल ही में चंदा जमा करने की बड़ी मुहिम चलाई थी.

सरकार की नज़र

समाज सेवा के काम को नई दिशा देते हुए सरकार ने भी भारतीय कंपनियों को अपने मुनाफ़े का दो फ़ीसदी समाज की भलाई के लिए ख़र्च करने के लिए कहा है.

नए नियमों के तहत 500 करोड़ रुपये से बड़ी पूंजी वाली कंपनियों को अपने मुनाफ़े का दो फ़ीसदी सामाजिक कार्यों के लिए ख़र्च करना होगा.

माना जा रहा है कि तक़रीबन 12 हज़ार कंपनियां इस दायरे में आ जाएंगी.

केंद्रीय वाणिज्य मंत्री निर्मला सीतारमण ने चेतावनी भी दी है कि सरकार कंपनियों पर नज़र रखेगी कि वे अपना पैसा सार्थक परियोजनाओं में ख़र्च करते हैं या नहीं.

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