हाकीः करारी हार के बाद भारत की मुश्किल

  • 5 नवंबर 2014
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पिछले दिनों इंचियोन एशियाई खेलों में 16 साल बाद स्वर्ण पदक जीतने वाली भारतीय हॉकी टीम ऑस्ट्रेलिया में है, जहां वह चार टेस्ट मैचों की सिरीज़ खेल रही है.

मंगलवार को दोंनो टीमें पहले मुक़ाबले में पर्थ में आमने-सामने थीं लेकिन जब खेल समाप्त हुआ तब स्कोर 4-0 से ऑस्ट्रेलिया के पक्ष में था.

दोनो टीमों ने तेज़-तर्रार खेल की शुरुआत की लेकिन पूरे समय ऑस्ट्रेलिया छाया रहा. खेल का पहला गोल 15वें मिनट में जेरेमी हॉवर्ड ने पेनाल्टी कॉर्नर पर किया.

दूसरा गोल 30वें मिनट में फारवर्ड जैकब वैटोन ने भारतीय रक्षा पंक्ति को छकाते हुए किया. तीसरा गोल 34वें मिनट में जेरेमी एडवर्ड और चौथा गोल 39वें मिनट में मिडफिल्डर ग्लेन सिंपसन ने किया.

अब इस परिणाम से यह भी साबित हो गया कि भले ही भारतीय हॉकी टीम ने एशिया में अपना खोया गौरव एक बार फिर हासिल कर लिया हो, लेकिन अंतराष्ट्रीय स्तर पर जब भी बडी टीमों से उसका सामना होता हैं उसकी कमियां सामने आ जाती हैं.

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भारत के पूर्व ओलंपियन और कप्तान रहे गुरबक्श सिंह मानते हैं कि एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक जीतने के बावजूद आज भी भारत विश्व हॉकी में नौवें-दसवें स्थान पर है.

गोल बचाना ज़रूरी

अंतरराष्ट्रीय हॉकी 70 की जगह 60 मिनट की हो गई है और चार क्वार्टर में खेली जाती है. जब ऑस्ट्रेलिया जैसी टॉप टीमें 70 मिनट में शानदार खेल दिखा सकती थीं तो 60 मिनट में तो वह और भी अधिक अच्छा खेलेंगी.

ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ी पहले मिनट से ही लय पकड़ लेते हैं, जबकि भारतीय खिलाड़ियों को जमने में ही दस-पंद्रह मिनट का समय लगता है.

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गुरबक्श सिंह का मानना है कि खेल में गोल करने के साथ ही गोल बचाना भी ज़रूरी है. आज टीम में परगट सिंह और दिलीप टिर्की जैसे खिलाड़ी नहीं हैं जो बेहतर बचाव करते थे.

अगर टीम चार गोल से पिछड़ जाएगी तो उसे जीतने के लिए पांच गोल करने पड़ेंगे, यह कैसे होगा. एकाध गोल से पिछड़कर बराबरी पाकर जीतना फिर भी मुमकिन है.

भारतीय टीम चैंपियंस ट्रॉफ़ी से पहले अनुभव के तौर पर ऑस्ट्रेलिया का दौरा कर रही है देखना है बाक़ी बचे मैचों में कैसा प्रदर्शन करती है.

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