और भारी न पड़ जाए वाड्रा की ये चुप्पी

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पचास साल पहले ब्रिटेन के तत्कालीन प्रधानमंत्री हैरल्ड विल्सन ने चुटकी लेते हुए कहा था कि राजनीति में एक सप्ताह लम्बा वक़्त होता है. लाइव टीवी समाचार और इंटरनेट के दौर में एक घंटा भी लम्बा वक़्त हो चुका है.

पिछले सप्ताह कांग्रेस पार्टी की अध्यक्ष सोनिया गांधी के दामाद रॉबर्ट वाड्रा के लिए एक सेकेंड भी लम्बा वक़्त साबित हो गया.

जैसा कि दुनिया जान चुकी है, जब एक टीवी रिपोर्टर ने वाड्रा से ज़मीन की ख़रीद-फ़रोख़्त में उन पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों के बारे में उनसे पूछा तो उसे परे धकेलते वह हुए बोले, "आर यू सीरियस?"

यह दृश्य हर टीवी न्यूज़ चैनल पर देखा गया. रातों-रात ट्विटर पर हैशटैग चल पड़ा, "यसवीआरसीरियस".

वाड्रा की उस पल की बदहवासी इंटरनेट के अनंतकाल में चिरायु हो चुकी है.

'कांग्रेस की हार'

जिस दौर में हैरल्ड विल्सन ने राजनैतिक सप्ताह की दीर्घायु पर अपना अमर कथन दिया था, उसी दौर में दुनिया में पहली बार राजनीति पर टीवी का तिलस्मी प्रभाव देखने को मिल रहा था.

अमरीकी राष्ट्रपति पद के लिए 1960 के चुनाव में जब पहली बार उम्मीदवारों में लाइव टीवी डिबेट कराई गई तो उस वक़्त के अमरीकी उपराष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन और उनके विरोधी जैक कैनेडी की बहस को सात करोड़ अमरीकियों ने देखा.

आज भी मीडिया पंडित कहते हैं उस रोज़ निक्सन के दाढ़ी न बनाने की वजह से कैनेडी को जीत हासिल हुई थी.

ठीक इसी तर्ज़ पर क़िस्सा-ए-रॉबर्ट वाड्रा है.

कांग्रेसी नेता दबे स्वर में कहते हैं कि दिसम्बर 2013 से अब तक हुए तमाम चुनावों में कांग्रेस पार्टी की बुरी हार के पीछे वाड्रा पर लगे आरोप एक अहम वजह रहे हैं.

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इस दौरान कांग्रेस पार्टी राजस्थान, मध्यप्रदेश, दिल्ली, छत्तीसगढ़, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, उड़ीसा, महाराष्ट्र और हरियाणा में चुनाव हार चुकी है.

मई के आम चुनाव में कांग्रेस पार्टी को ऐसी शर्मानाक हार मिली कि वह लोकसभा में मुख्य विपक्षी दल का औपचारिक दर्ज़ा भी नहीं पा सकी. जल्द ही जम्मू-कश्मीर, झारखंड और दिल्ली में होने वाले चुनावों में भी कांग्रेस की हार तय मानी जा रही है.

'भ्रष्टाचार से क्या फ़र्क'

ज़ाहिर है इतनी व्यापक हार का ज़िम्मा अकेले वाड्रा नहीं ले सकते.

लेकिन वाड्रा कोई सामान्य व्यापारी नहीं हैं. वाड्रा की पत्नी, प्रियंका, कांग्रेस पार्टी की भावी नेता के रूप में देखी जाती हैं. आम चुनाव में हार के बाद से ही कुछ कांग्रेसियों ने "राहुल हटाओ, प्रियंका लाओ" का राग अलापना शुरू कर दिया था.

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पिछले महीने महाराष्ट्र और हरियाणा की हार के बाद यह जाप तेज़ हो गया.

ऐसा नहीं है कि भ्रष्टाचार के आरोप और आपराधिक छवि चुनाव जीत में आड़े आते हैं. आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल ने वरिष्ठ भाजपा नेता, केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी, पर खुलकर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए हैं.

जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे तो उनके दो मंत्री भ्रष्ट पाए गए थे. एक को तीन साल की सज़ा हुई थी.

तमिलनाडु की पूर्व मुख्यमंत्री जयललिता हों या आंध्रप्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबु नायडू, बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालूप्रसाद यादव हों या कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री येदुरप्पा हों, भ्रष्टाचार के आरोपों के बावजूद सब ही चुनाव जीतते रहे हैं.

'चुप्पी का नुक़सान'

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कांग्रेस की चिंता का सबब ये है कि अब तक वाड्रा ने न ही कोई खंडन जारी किया है और न ही किसी विरोधी नेता या मीडिया संगठन को नोटिस भेजा है.

पार्टी के छुटभैये नेता टीवी चैनलों पर वाड्रा की बेक़सूरी दर्शाने वाले काग़ज़ात लहराते फिर रहे हैं. अगर ऐसा है तो वाड्रा खुल कर सफ़ाई क्यों नहीं देते? क्यों नहीं वह आरोप लगाने वालों पर मानहानि का मुक़दमा करते?

गडकरी भ्रष्ट हों न हों, लेकिन उन्होंने केजरीवाल पर मानहानि का मुक़दमा चला कर कम से कम मीडिया में कवरेज को एकतरफ़ा होने से रोक दिया है.

इसी मुक़दमे में छह रातें कारावास में बिताने के बाद केजरीवाल भी ख़ामोश हो गए हैं.

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वाड्रा के क़रीबी कहते हैं सुप्रीम कोर्ट और दो हाई कोर्ट ने उनके खिलाफ जांच की मांग करने वाली याचिकाएं खारिज कर दी हैं. वे ये भी पूछते हैं कि मोदी सरकार ने छह महीने में वाड्रा की जांच क्यों नहीं शुरू की है?

लेकिन वाड्रा, प्रियंका, राहुल और सोनिया यह भूल रहे हैं कि राजनीति, तथ्य गिनाने से नहीं आम जनता में छवि से चलती है.

उस रात टीवी डिबेट में निक्सन ने क्या कहा किसी को याद नहीं. बस इतना ही याद है कि उन्होंने दाढ़ी नहीं बनाई थी और चुनाव हार गए थे.

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