'ग़दरी बाबाओं' का सालाना जलसा

  • 8 नवंबर 2014
गदर पार्टी के सौ साल, कोमागाटा मारू की याद इमेज कॉपीरइट Vancouver Public Library

जब पूरी दुनिया में प्रथम विश्व युद्ध की शताब्दी मनाई जा रही है तो पंजाब में ग़दर पार्टी की स्थापना की शताब्दी मनाई गई.

इसके साथ ही इतिहास की एक और अहम घटना की याद ताज़ा हुई और वह थी कोमागाटा मारू जहाज़ हादसा.

जालंधर के 'देशभगत यादगारी हॉल' में ग़दर पार्टी की स्थापना और कोमागाटा मारू जहाज़ हादसे की शताब्दी मनाई गई.

1914 में कोलकाता (तब कलकत्ता) के बजबज बंदरगाह पर अंग्रेज सरकार ने जापानी जहाज़ कोमागाटा मारू के यात्रियों पर गोलियां चलाईं थीं, जिसमें 18 लोगों की मौत हो गई थी.

गदर पार्टी

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ग़दर पार्टी साम्राज्यवाद के ख़िलाफ़ हथियारबंद संघर्ष का ऐलान और भारत की पूरी आज़ादी की मांग करने वाली राजनैतिक पार्टी थी, जो कनाडा और अमरीका में प्रवासी भारतीयों ने 1913 में बनाई थी.

1914 में 376 भारतीय रोज़गार और बेहतर ज़िंदगी की तलाश में कोमागाटा मारू जहाज़ से कनाडा जा रहे थे.

जहाज़ को ग़दर पार्टी से संबंधित गुरदीत सिंह ने किराए पर लिया था. तभी कनाडा में अप्रवासी के लिए क़ानून सख्त किया जा रहा था.

ऐसे में कनाडा से वापस पहुंच रहे मुसाफ़िरों की बेचैनी ग़दर पार्टी को समर्थन में तब्दील हो रही थी.

कोमागाटा मारू में सवार 376 भारतीय मुसाफिरों में से सिर्फ़ 24 को कनाडा सरकार ने वैंकूवर में उतरने दिया था.

ग़दर पार्टी के दवाब के बावजूद जहाज़ को वापस भारत भेज दिया गया. लगभग छह महीने समुद्र में घूमने के बाद यह जहाज़ कोलकाता में बजबज बंदरगाह पहुंचा.

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29 सितंबर 1914 को बाबा गुरदीत सिंह और अन्य नेताओं को गिरफ्तार करने के लिए जहाज़ पर पुलिस भेजी गई. गिरफ्तारी का यात्रियों ने विरोध किया.

प्रथम विश्व युद्ध में उलझी और ग़दर पार्टी की योजनाओं से परेशान अंग्रेज़ सरकार ने यात्रियों पर गोली चलाई जिसमें 18 यात्री मारे गए.

हालांकि, बाबा गुरदीत सिंह कई अन्य लोगों के साथ भाग निकले. बाकी यात्रियों को वापस पंजाब भेज दिया गया.

'अहमियत पहचानी'

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इस साल एक मई को कनाडा सरकार ने कोमागाटा मारू घटना की शताब्दी पर डाक टिकट जारी किया है.

'ग़दरी बाबाओं का वार्षिक मेला' इसी को समर्पित किया गया. यह मेला 1992 से ग़दर पार्टी की याद में बनाए गए देशभगत यादगारी हॉल में हर साल 28 अक्टूबर से ग़दर पार्टी के स्थापना दिवस एक नवंबर तक चलता है.

गुरु नानक देव यूनिवर्सिटी में साहित्य के प्रोफ़ेसर परमिंदर सिंह बताते हैं, "यह मेला उस वक़्त के सवालों को आज के दौर के सवालों के साथ जोड़ कर पेश करता है. कोमागाटा मारू घटना, ग़ैर-बराबरी और नाइंसाफी के ख़िलाफ़ खूबसूरत समाज बनाने के संघर्ष का प्रतीक थी और यह मेला उन्हीं सवालों को मौजूदा प्रसंग में पेश करता है."

कश्मीर सिंह वदेशा इस मेले में शामिल होने के लिए हर साल वैंकूवर से पंजाब आते हैं. वह कहते हैं, "उस वक़्त का इतिहास और मौजूदा दौर के सवाल मुझे इस मेले तक खींच लाते हैं."

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वह कहते हैं, "सौ साल बाद कनाडा सरकार ने कोमागाटा मारू की अहमियत को पहचाना है. लेकिन अब भी अप्रवासियों से जुड़े सवाल ज्यों के त्यों हैं. उस दौर के इतिहास को इन सवालों के साथ जोड़कर समझने के लिए यह मेला अहम मंच है."

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