1984 दंगाः जब हुआ 'न्याय का नाश'

  • 8 नवंबर 2014
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1984 के सिख विरोधी दंगों की भयावहता के बावजूद हम मौजूदा व्यवस्था की नाकामी और उन घटनाओं का महत्व स्वीकार करने से इनकार कर देते हैं.

'जिसके पास ताक़त है वह सही है' यही शायद हमारा एकमात्र राजनीतिक सिद्धांत बन गया है.

हमें नहीं भूलना चाहिए कि 80 के दशक की शुरुआत में जरनैल सिंह भिंडरावाले की नफ़रत भरी बातें राजनीति में महत्वपूर्ण थीं और यह भी कि कांग्रेस के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार की इस सांप्रदायिक माहौल को बनाने में भागीदारी थी.

1984 में सिख नागरिकों का राजनीति प्रेरित क़त्लेआम इसलिए किया गया था क्योंकि प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के क़ातिल भी इसी समुदाय के थे.

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कुछ का मानना था कि इन लोगों के किए अपराध की ज़िम्मेदारी पूरे समुदाय की बनती है.

बहुत से लोगों को इस बात से कोई फ़र्क नहीं पड़ता था कि सड़कों पर हुड़दंगियों का क़ब्ज़ा है.

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उस समय मैं विश्वविद्यालय में लेक्चरर था. एक नवंबर को मैं लाजपत नगर में एक शांति मार्च में शामिल हुआ था.

हमें हाथों में त्रिशूल लिए भीड़ दिखी, डर के मारे रोते टैक्सी ड्राइवर दिखे और जलते हुए गुरुद्वारे दिखे. कई जगह से धुआं उठता दिख रहा था.

मैंने यह भी सुना कि कुछ छात्र दंगों में शामिल थे और कई शिक्षक इसका समर्थन कर रहे थे. यहां मैं यह भी कहना चाहूंगा कि कुछ विद्यार्थियों ने सिखों को अपने हॉस्टलों में भी छुपाया था.

'मेरी मम्मी को मत मारो'

लोगों ने राहत कार्यों के लिए नागरिक एकता मंच बनाए. मुझे एक मध्यमवर्गीय बस्ती में एक युवा विधवा को बचाने के लिए भेजा गया.

वहां एक सिख का घर था, जिसे जला दिया गया था. मैं अपने साथियों और एक पुलिसकर्मी के साथ 'बरसाती' पर चढ़ गया. वहां हमें एक युवती, उसकी मां और दो छोटे बच्चे दिखे.

जब छोटी बच्ची ने पुलिसवाले की लाठी देखी तो वह रोने लगी और रिरियाने लगी 'मेरी मम्मी को मत मारो'.

उसने अपने पिता और दादा को पीटे जाते और फिर जलाए जाते हुए देखा था. मैं कभी उस त्रासद पल को नहीं भूल सकता.

ग़ैरज़िम्मेदराना पत्रकारिता

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24 नवंबर 1984 को कुछ शिक्षकों ने एक विरोध मार्च आयोजित किया. लाल किले से बोट क्लब के रास्ते में करीब 5,000 लोग थे, जिसमें हर वर्ग के लोग शामिल थे.

हमारा एक ही नारा था, इंसाफ़ की मांग का. कई जगह पर सड़क किनारे कई लोगों ने हमें 'देशद्रोही' भी कहा. मैं उनकी आंखों में नफ़रत देखकर अचंभित था.

उनका मानना था कि ये हत्याएं देशभक्ति का काम थीं और इंसाफ़ की मांग देश-विरोधी. मीडिया ने हमारे प्रदर्शन की ख़बर को ग़ायब कर दिया.

दो हफ़्ते बाद 'द स्टेट्समैन' में एक लेख छपा कि हज़ारों सिखों ने दरियागंज में मार्च किया और बदले का आह्वान किया. ग़ैरज़िम्मेदाराना पत्रकारिता ख़तरनाक झूठ फैला सकती है.

राहत शिविरों में काम कर रहे कुछ कार्यकर्ताओं ने नवंबर 1984 में सांप्रदायिकता विरोधी आंदोलन (एसवीए) की नींव डाली थी, जिसने दोषियों पर मुकदमा चलाने की मांग को लेकर कई बार प्रदर्शन किया.

न्यायपालिका का रुख़

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हमें पता चला कि दंगों में शामिल रहे नेता पूर्वी दिल्ली में गुपचुप तरीक़े से 'शक्ति दलों' का गठन कर रहे हैं. हमने एफ़आईआर दर्ज़ न किए जाने, प्रत्यक्षदर्शियों को धमकाने और सरकारी वकील के कपट के बारे में भी सुना.

यह सब रंगनाथ मिश्रा जांच आयोग से संबंधित बातें थीं. हमें लगता था कि यह मामले को दबाने की कोशिश है.

6 फ़रवरी, 1985 को हाईकोर्ट में पीपल्स यूनियन फ़ॉर डेमोक्रेटिक राइट्स (पीयूडीआर) की याचिका की सुनवाई में मैं शामिल हुआ, जिसमें पुलिस को एफ़आईआर दर्ज़ करने का आदेश देने की मांग की गई थी.

जब जज को 'दोषी कौन हैं?' रिपोर्ट की एक कॉपी दी गई तो उन्होंने नागरिक अधिकार संगठन को डांटा. जब पीयूडीआर के अध्यक्ष गोबिंदा मुखौती ने उन्हें याद दिलाया कि बड़े अपराध हुए हैं और पुलिस केस दर्ज करने के लिए पाबंद है, तो जज ने इसे ख़ारिज करते हुए कहा, "इसके पीछे वजहें हैं".

'परिवार का समर्थन'

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उनके शब्द सामूहिक प्रतिशोध की भावना को सही ठहराते लगे. उनकी बातचीत में सांप्रदायिक घृणा साफ़ नज़र आ रही थी. बाद में उन्हें प्रोन्नत कर सुप्रीम कोर्ट में भेज दिया गया.

1986 में एसपीए ने राष्ट्रीय एकता परिषद के नाम एक निवेदन तैयार किया जिसे नेताओं के सामने रखा जाना था.

मैं एक वरिष्ठ भाजपा नेता से मिला. वह बहुत दोस्ताना थे, लेकिन जब मैंने धार्मिक मान्यताओं पर आधारित प्रचार के अतार्किक स्वरूप पर बात करने की कोशिश की तो वह बोले, "भारतीयों को आर्थिक मुद्दों पर संगठित नहीं किया जा सकता."

इसका अर्थ यह निकला कि परिणाम माध्यम को सही साबित कर देता है. बीजेपी को 1984 के लोकसभा चुनाव में दो सीट मिलीं थीं.

प्रायोजित नरसंहार

कई लोगों का कहना था कि 'परिवार' ने अपना समर्थन कांग्रेस को दे दिया था. सनद रहे कि जैन-अग्रवाल समिति ने आरएसएस/बीजेपी कार्यकर्ताओं को आगजनी, हत्या और लूट के मामलों में शामिल बताया था.

सांप्रदायिक हिंसा दशकों से भारतीय राजनीति का हिस्सा रही है, लेकिन कांग्रेस पार्टी का सरकार प्रायोजित नरसंहार पहले कभी नहीं हुआ था.

उसके बाद हम यह बहाना भी नहीं मार सकते थे कि भारत में राजनीतिक फ़ायदों तक ही बदले की राजनीति सीमित है.

1984 ने मुख्यधारा के चरमपंथ के विचार और राजनीति में अपराधी तत्वों को मजबूत किया. हमारा समाज अपनी ही विविधता के साथ जंग में मशगूल है. इसके संकट के मूल में हमारी न्याय व्यवस्था में आई खराबी है.

एक मशहूर जर्मन दार्शनिक ने कहा था कि जब न्याय का नाश होता है तो इंसानी ज़िंदगी के मायने ख़त्म हो जाते हैं.

1984 के तीस साल बाद हम भारतीयों को यह फ़ैसला करना होगा कि इंसाफ़ और मानवीय गरिमा के बिना राष्ट्रीय सम्मान के लिए विकास का सपना क्या उचित कीमत है.

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