पेंटागन की रिपोर्ट में उलझा पाक मीडिया

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अमरीकी रक्षा मंत्रालय पेंटागन की हालिया रिपोर्ट पर पाकिस्तानी मीडिया में ख़ूब टीका टिप्पणियां हुईं.

नवाए वक़्त ने इस रिपोर्ट पर सवाल उठाए हैं जिसके मुताबिक़ पाकिस्तान अफ़ग़ानिस्तान और भारत के ख़िलाफ़ चरमपंथी गुटों का इस्तेमाल कर रहा है.

अख़बार कहता है कि क्या अमरीका के रिश्तों की समीक्षा करने का वक़्त नहीं आ गया है, जबकि भारत और अफ़ग़ानिस्तान के बारे में लिखा है कि पाकिस्तान से दुश्मनी के मामले में ये दोनों देश एकजुट हैं.

वहीं वक़्त ने इस रिपोर्ट के सिलसिले में लिखा है कि पेंटागन पाकिस्तान पर आरोप लगाते वक़्त ये कैसे भूल गया कि अफ़ग़ानिस्तान में भारत के दर्जनों वाणिज्य दूतावास पाकिस्तान के ख़िलाफ़ खुल्लम खुला साज़िश रच रहे हैं, जबकि अमरीका दशहतगर्दी के ख़िलाफ़ जंग में अनगिनत क़ुर्बानी देने वाले पाकिस्तान को आलोचना का निशाना बना रहा है.

भारत पाक वार्ता

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वहीं जंग ने पाकिस्तानी सेना प्रमुख राहील शरीफ़ के काबुल दौरे पर लिखा है कि पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान की साझा दुश्मन दहशतगर्दी है.

अख़बार लिखता है कि दोनों देश अगर एक दूसरे के हाथ और बाज़ू बन जाएं तो वो स्थिरता और ख़ुशहाली के लिहाज से बड़ी ताक़त बन सकते हैं लेकिन विरोधी ताक़तें हमेशा उनके बीच दूरियां पैदा करती रही हैं.

एक्सप्रेस ने पाकिस्तान सरकार के इस रुख़ को सही ठहराया है कि वो भारत से बातचीत बहाली के लिए कोई शर्त नहीं मानेगा.

भारत के रक्षा मंत्री अरुण जेटली ने कहा था कि पाकिस्तान को भारत सरकार और कश्मीरी अलगाववादियों में से किसी एक को चुनना होगा.

अख़बार के मुताबिक़ पाकिस्तान ने ठीक ही कहा है कि वो अलगाववादी नहीं, बल्कि अपने अधिकारों के लिए लड़ने वाले लोग हैं.

ग़ैर मुसलमान

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वहीं उम्मत ने ईशनिंदा के आरोप में पिछले दिनों एक ईसाई जोड़े की हत्या को वहशियाना घटना बताया है, और कहा है कि इसे धर्म से न जोड़ा.

अख़बार लिखता है कि अगर किसी ग़ैर मुसलमान पर ज़ुल्म होता है तो भारत समेत दुनिया के कई देश इसे आधार बना कर पाकिस्तान और मुसलमानों को बदनाम करने का मौका नहीं चूकते.

अख़बार कहता है कि क्या पाकिस्तान में रोज़ाना दर्जनों मुसलमान ख़ून ख़राबे, दहशतगर्दी और बर्बर कार्रवाइयों का शिकार नहीं बनते हैं.

ओबामा की मुश्किल

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रुख़ भारत का करें तो भाजपा के ख़िलाफ़ बन रहे जनता दल परिवार की छह पार्टियों के बीच नए मोर्चे की सुगबुगाहट पर हिंदोस्तान एक्सप्रेस लिखता है कि एक साथ रह कर ये पार्टियां सियासत में अपनी मौजूदगी दर्ज करा सकती हैं.

अख़बार के मुताबिक़ इस मोर्चे की पहली परीक्षा शीतकालीन सत्र में होगी जहां राज्यसभा में भाजपा के पास बहुमत नहीं है.

राष्ट्रीय सहारा ने अमरीकी मध्यावधि चुनावों के नतीजों पर संपादकीय लिखा है, 'ओबामा का उत्थान और पतन.'

अख़बार लिखता है कि अमरीकी संसद में सत्ताधारी पार्टी के सदस्यों से ज़्यादा संख्या विपक्षी सदस्यों की हो, ऐसा पहली बार तो नहीं हुआ लेकिन जब भी हुआ है राष्ट्रपति को मुश्किलें पेश आई हैं.

अख़बार लिखता है कि चुनाव नतीजे बतौर राष्ट्रपति ओबामा के लिए तो कोई ख़तरा नहीं है, लेकिन उनकी डेमोक्रेटिक पार्टी का भविष्य अंधकारमय नज़र आता है.

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