अनिवार्य मतदान की ओर पीएम मोदी का गुजरात

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गुजरात में स्थानीय निकाय के लिए मतदान करना अब क़ानूनी तौर पर जरूरी हो जाएगा.

साथ ही जो बिना किसी वाजिब कारण के मतदान से दूर रहेंगे, उन पर क़ानूनी कार्रवाई की जाएगी.

राज्यपाल ओपी कोहली ने इस पर की जा रही आपत्तियों के बावजूद गुजरात स्थानीय प्राधिकरण (संशोधन) विधेयक को अपनी मंजूरी दे दी है.

गुजरात विधानसभा ने इस कानून को पहली बार 19 दिसंबर 2009 को पारित किया था.

उस वक्त कई लोगों को हैरत हुई थी कि गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी तब विधानसभा में मौजूद नहीं थे.

और उन्होंने सदन में इसे पारित किए जाने की कार्यवाही राज्य विधानसभा में मुख्यमंत्री के चैम्बर से देखी थी.

विधेयक की जरूरत

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यह बात भी कम दिलचस्प नहीं है कि इस कानून का मसौदा राज्य निर्वाचन आयोग से मशविरे के बाद खुद नरेंद्र मोदी की सलाह पर तैयार किया गया था.

राज्य निर्वाचन आयोग ही वह संस्था है जो राज्य में स्थानीय निकायों के चुनाव के लिए जिम्मेदार होती है.

इस कानून का मसौदा तैयार करने में प्रमुख भूमिका निभाने वाले लोगों में वरिष्ठ नौकरशाह रजनीकांत एम पटेल भी थे.

पटेल ने बीजेपी के टिकट पर चुनाव लड़ने के लिए सरकारी सेवा से इस्तीफा दे दिया था.

विधेयक की जरूरत पर जोर देते हुए नरेंद्र मोदी ने उस समय कहा था, "यह कानून काले धन और तेजी से बढ़ रहे चुनावी खर्चों पर लगाम लगाएगा."

पटेल फिलहाल अहमदाबाद के एक निर्वाचन क्षेत्र से बीजेपी के विधायक हैं.

नागरिकों के अधिकार

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हालांकि वोट न देने की सूरत में किस तरह की कानूनी कार्रवाई की जाएगी, इसको लेकर राज्य सरकार नियम बनाएगी और उसे राज्य विधानसभा में मंजूरी के लिए पेश किया जाएगा.

इस कानून का मसौदा तैयार करने वाले अधिकारियों का कहना है कि वोट नहीं देने वाले लोगों को सरकारी योजनाओं का फायदा उठाने से रोका जाना चाहिए.

रजनीकांत पटेल के साथ इस कानून का मसौदा तैयार करने में प्रमुख निभाने वाले एक वरिष्ठ नौकरशाह ने बताया, "अगर नागरिकों के अधिकार हैं तो लोकतंत्र के प्रति उनकी कुछ जिम्मेदारियां भी होनी चाहिए."

इस विधेयक के अनुसार, मतदान के दिन गैरहाजिर रहने वाले व्यक्ति को डिफॉल्टर घोषित कर दिया जाएगा.

उन्होंने कहा, "ऐसे डिफॉल्टर्स को बीपीएल कार्ड, सरकारी सहूलियतों या सब्सिडी वाले लोन से वंचित किया जा सकता है."

बेनीवाल का फैसला

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गुजरात में अगले साल अक्तूबर में स्थानीय निकाय के चुनाव होने हैं और इस कानून को पहली बार तभी अमल में लाया जा सकेगा.

डिफॉल्टर मतदाता को राज्य निर्वाचन आयोग के सामने इसकी सफाई देनी पड़ सकती है.

चुनाव के दिन बीमार होने, या फिर राज्य या देश से बाहर होने पर कोई कार्रवाई नहीं की जाएगी लेकिन अगर गैरहाजिर रहने वाले वोटर की सफाई निर्वाचन पदाधिकारी को संतुष्ट न कर सकी तो वह मुश्किल में पड़ सकता है.

पूर्व राज्यपाल कमला बेनीवाल ने इस विधेयक को बिना दस्तखत किए दो बार राज्य विधानसभा को वापस लौटा दिया था.

उन्होंने अपने फैसले की तीन वजहें बताई थी. पहली वजह यह थी कि अपरिहार्य मतदान का प्रावधान अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन है.

महिलाओं के लिए आरक्षण

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दूसरी इसके लिए सजा देना भी संविधान सम्मत नहीं है और तीसरी ये कि दुनिया में जहां कहीं भी ऐसी कोशिश की गई है, नाकाम रही है.

इसमें एक और खास बात ये भी है कि गुजरात सरकार ने बड़े दिलचस्प तरीके से महिलाओं के लिए स्थानीय निकायों में 50 फीसदी आरक्षण का प्रावधान भी इसी विधेयक में जोड़ दिया था.

तत्कालीन राज्यपाल कमला बेनीवाल ने राज्य सरकार से कहा भी कि इसके लिए अलग से एक कानून लाया जाए लेकिन राज्य सरकार ने इनकार कर दिया.

राज्य में विपक्षी कांग्रेस के नेता इस विधेयक का विरोध करते हुए कहते हैं कि महिलाओं के आरक्षण के लिए अलग से कानून लाया जाएगा तो वे इसका समर्थन करेंगे.

उस समय के विपक्ष के नेता शशिकांत गोहिल ने कहा था कि जिन देशों में अनिवार्य मतदान की व्यवस्था लागू की गई, वहां इस पर पुनर्विचार किया गया क्योंकि वे इसे लागू ही नहीं कर सके.

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