'सफ़ाई अभियान साफ़ कर देगा कबाड़ीवालों को'

  • 16 नवंबर 2014
सड़कों पर फेरी लगाते हुए लकी इमेज कॉपीरइट BBC World Service

दिल्ली के विकसित इलाक़े में साइकिल पर रोज़ फेरी लगाते हुए लाखन सिंह चिल्लाते हैं, "कबाड़, कबाड़ दे दो कबाड़".

लेकिन घनी झाड़ियों और ऊंची दीवारों के पीछे से कोई जवाब नहीं देता.

औपनिवेशिक काल के ये हरे-भरे बंगले कभी कबाड़ लेने के सबसे अच्छे ठिकाने हुआ करते थे. लेकिन अब यहां कबाड़ इकट्ठा करने और उठाने वालों के थैले खाली पड़े हैं.

दिल्ली के अनधिकृत कूड़ा या कचरा बीनने वालों में से एक हैं लकी. जो सड़कों पर दिख ही जाते हैं और शहर की कूड़े से जंग के लिए अनिवार्य भी हैं, क्योंकि शहर में कूड़ा इकट्ठा करने के इंतज़ाम पर्याप्त नहीं हैं.

लेकिन अब बड़ी मात्रा वह बाहर हो रहे हैं- क्योंकि सफ़ाई और हरियाली चलन में आ गई और फ़ायदेमंद भी है.

'असली स्वच्छ भारत अभियान'

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भारतीयों को साफ़-सुथरा बनाने का बहु प्रचारित स्वच्छता अभियान इन कचरा बीनने वालों और कबाड़ीवालों का अंत बन रहा है.

सीधे-सीधे कहा जाए तो उनकी समस्या है प्रतियोगिता, ख़ासतौर पर पर्यावरण के लिए काम करने वाले 'ग्रीन ग्रुपों' और सबसे ज़्यादा- इंटरनेट से है.

पुराने टीवी, फ़र्नीचर और तो और कम कीमत के घर के कबाड़ को कबाड़ीवाले को देने के बजाय लोग ओएलएक्स, ईबे जैसी पुराने सामान की ख़रीद-फ़रोख़्त की सुविधा देने वाली वेबसाइटों पर बेच रहे हैं.

लेकिन ग्रीन ग्रुपों में अक्सर उसी मध्यवर्गीय के लोग स्वयंसेवक के रूप में काम करते हैं, जहां से कबाड़ीवालों को सबसे ज़्य़ादा माल मिलता है. यह लोग भी घरों में फेरी लगाते हैं और रिसाइक्लिंग के लिए सामान लेते हैं- जिसके लिए वह अक्सर बेहतर भुगतान भी करते हैं.

जब लकी ने पहली बार मोदी के स्वच्छता अभियान के बारे में सुना तो वह उत्सुक थे, उन्हें उम्मीद थी कि इससे उन्हें फ़ायदा मिलेगा.

वह कहते हैं, "दरअसल हम असली स्वच्छ भारत अभियान हैं."

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लेकिन इस प्रचार अभियान से उनकी मुश्किलें ही बढ़ रही हैं, क्योंकि लोगों को समझ आ रहा है कि वह कबाड़ से पैसा बना सकते हैं.

कंधे झाड़ते हुए लकी कहते हैं, "ज़्यादातर हमें सिर्फ़ अख़बार, कार्डबोर्ड और बोतलें मिलती हैं."

'सामाजिक प्रतिष्ठा'

लकी पिछले दस साल से उसी इलाके में काम कर रहे हैं और राजस्थान में अपने परिवार के पालन-पोषण के साथ ही बड़ी बेटी को स्कूल भेजने लायक कमा लेते हैं.

लेकिन महंगाई बढ़ने से उनकी 7,000 रुपये की औसत मासिक आय दिन-ब-दिन कम पड़ती जा रही है.

यह बदलाव तरक्की का सुबूत भी हैं. कम ही लोग लकी वाला काम करना चाहेंगे. लेकिन अगर उन्हें बाहर कर दिया जाएगा तो दिल्ली के कूड़ा बीनने वालों के पास कोई और काम भी नहीं रहेगा.

करीब-करीब सभी सामाजिक सोपान में सबसे निचले स्तर वाली अति दलित जातियों से हैं (जिन्हें पहले 'अछूत' कहा जाता था) या मुसलमान हैं. अब इन्हें लगता है कि इन्हें फिर से इसलिए बाहर किया जा रहा है क्योंकि कूड़ा बीनना सामाजिक प्रतिष्ठा का सबब बन गया है.

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लेकिन दिल्ली के ख़ान मार्केट इलाके में उनकी किस्मत साथ दे जाती है और एक ऑटो-पार्ट्स स्टोर का मालिक उन्हें एक ज़ंग लगा कार एक्ज़ास्ट दे देता है.

पास ही संकरी गलियों और छोटे मकानों वाले इलाके में- जहां पड़ोस के इलाके में काम करने वाले रहते हैं- एक महिला उन्हें एक थैला बीयर देती हैं. और फिर उन्हें बिजली की भारी तारों का एक बंडल मिलता है.

लेकिन कई घंटे के श्रम के लिहाज से यह काफ़ी कम है.

'अच्छे दिन कहां हैं'

लकी कहते हैं, "हम चाहते हैं कि मोदी के प्रचार का असर हो. यकीनन हम चाहते हैं कि भारत साफ़ हो".

लेकिन बोतलों के एक बड़े ढेर में छंटाई करता एक आदमी बीजेपी के प्रमुख चुनावी वायदे पर तंज़ कसता हुआ कहता है, "लेकिन अच्छे दिन कहां हैं?"

बंद पड़े गैराज से जब तेज़ आवाज़ें आती हैं तो सिर उसी दिशा में मुड़ जाते हैं. व्यापारी बशीर ख़ान ने तौलने के बाद कुछ पाइपों को ख़रीद लिया है लेकिन बेचने वाला ख़ुश नहीं है.

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वह कहते हैं कि, धंधा बड़ा मुश्किल हो गया है लेकिन इस बारे में कुछ नहीं बताते कि वह कितना कमाते हैं.

"दो बार वह मुझे गाली देते हैं, दो बार मैं उन्हें गाली देता हूं."

लकी और उसके साथी कबाड़ी वाले या कचरा बीनने वाले वापस कबाड़ की छंटाई में लग जाते हैं.

वह कहते हैं, "यह हमारे काम का अंत हो सकता है".

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