भारत में नसबंदी का दारोमदार महिलाओं पर

छत्तीसगढ़ में नसबंदी के बाद तबियत ख़राब होने पर अस्पताल में भर्ती कराई गईं महिलाएं. इमेज कॉपीरइट Alok Putul

छत्तीसगढ़ में महिला नसबंदी शिविर में हुई महिलाओं की मौत ने सवाल खड़े किए हैं कि ऐसे शिविरों में महिलाओं को ही क्यों बढ़-चढ़कर भाग लेने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है. जबकि पुरुषों पर उस तरह का दबाव नहीं बनाया जाता?

स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के आंकड़े बताते हैं कि भारत में साल 2010-11 के बीच कुल 50 लाख नसबंदियां की गईं. इसमें से 95.6 फीसद महिलाएं थीं.

महिलाओं की नसबंदी को मेडिकल शब्दावली में ट्यूबेक्टमी कहा जाता है जबकि पुरुषों की नसबंदी को वसैक्टमी कहा जाता है.

नसबंदी में पुरुष पीछे

भारत में वसैक्टमी और ट्यूबेक्टमी के आंकड़ों में बहुत बड़ा अंतर है.

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Image caption छत्तीसगढ़ में 2010-11 में 1,42,691 महिलाओं और 7,340 पुरुषों की नसबंदी हुई

अगर छत्तीसगढ़ की ही बात की जाए, जहां हाल ही में ट्यूबेक्टमी के बाद 13 महिलाओं की मौत हुई है. वहां साल 2010-11 में 1,46,691 महिलाओं और 7,340 पुरुषों की नसबंदी हुई. यानी 95 फीसदी नसबंदियां महिलाओं की हुईं.

आंकड़ें बताते हैं कि भारत में ज़्यादा आबादी वाले राज्यों में करीब 100 फ़ीसदी मामले ट्यूबेक्टमी के हैं.

मसलन साल 2010-2011 में बिहार में 98.1 फीसदी नसबंदी की सर्जरी ट्यूबेक्टमी थी यानी महिलाओं पर की गईं थी. वहीं उत्तर प्रदेश में 97.8 नसबंदियों की सर्जरी ट्यूबेक्टमी थी.

तमिलनाडु राज्य में 99.3 फीसदी नसबंदियां महिलाओं पर की गईं, जबकि अरुणाचल प्रदेश में 99.8 प्रतिशत मामले ट्यूबेक्टमी के थे.

जहां तक राजधानी दिल्ली की बात है, तो 2010-11 में 17,165 महिलाओं की नसबंदी की गई जबकि 2,709 पुरुषों की नसबंदी सर्जरी हुई, यानी 86.4 मामले ट्यूबेक्टमी के रहे.

ग़लत धारणा

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पॉपुलेशन फ़ाउंडेशन ऑफ़ इंडिया के सूचना विभाग की सह निदेशक सोना शर्मा ने बीबीसी से कहा ''पुरुषों में नसबंदी को लेकर कई ग़लत धारणाएं हैं. इनमें से एक यह कि नसबंदी के बाद उनकी ताकत में कमी आ जाएगी. दूसरी यह कि भारत जैसे पुरुष प्रधान देश में नसबंदी को मर्दानगी से जोड़कर देखा जाता है. ऐसे में समाज की ओर से तो महिलाओं पर नसबंदी का दबाव बन ही जाता है. साथ ही साथ स्वास्थ्य प्रणाली भी महिलाओं पर ये ज़िम्मेदारी डालने की कोशिश करती है. फिर स्वास्थ्य कर्मचारियों के लिए महिलाओं को बहलाना भी पुरुषों के मुकाबले ज़्यादा आसान होता है. नतीजा नसबंदी शिविरों में ज़्यादातर महिलाओं को ही देखा जाता है.''

दिलचस्प बात ये है कि नसबंदी के लिए सरकार की ओर से पुरुषों को महिलाओं के मुकाबले ज़्यादा पैसा दिया जाता है. फिर भी पुरुष नसबंदी शिविरों में बढ़-चढ़कर भाग नहीं लेते.

सोना शर्मा कहती हैं, ''भारत में मर्दों के लिए उनकी मर्दानगी बेशकीमती है. चाहे उन्हें कितना भी पैसा मिले, वे अपनी मर्दानगी पर कोई सवाल नहीं उठने देना चाहते. साथ ही पुरुषों को इस बात का भी डर रहता है कि अगर अपनी नसबंदी करवाने के बाद भी उनकी पत्नी गर्भवती हो गई, तो वे समाज को क्या मुंह दिखाएंगे.''

सोना के विचार में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय को पुरुषों की नसबंदी से जुड़े मिथकों को दूर करने के लिए अभियान चलाना चाहिए.

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