भोपाल गैस त्रासदी: इंसाफ़ मिलेगा क्या?

  • 15 नवंबर 2014
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भोपाल गैस त्रासदी के पीड़ित दिल्ली के जंतर-मंतर पर निर्जल उपवास कर रहे हैं. धरने में पांच संगठन शामिल हैं. कई सामाजिक कार्यकर्ता धरना स्थल पर पहुंच कर पीड़ितों की मांगों का समर्थन कर रहे हैं.

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प्रदर्शनकारी तत्काल अतिरिक्त मुआवजा दिलवाने के लिए प्रधानमंत्री से हस्तक्षेप की मांग पर अड़े हुए हैं. धरने में वो पांच लोग भी शामिल हैं, जो दुर्घटना में बच गए थे- विष्णु पंथी (50), शहज़ाद बी (59), प्रेमलता चौधरी (66), कस्तूरी बाई (65) और कमला बाई (70).

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आयोजक संगठनों का कहना है कि केंद्र सरकार को इस बारे अब तक 15 पत्र लिखे गए हैं, लेकिन अभी तक एक भी पत्र का जवाब नहीं दिया गया. इनमें चार पत्र तो वर्तमान सरकार को लिखे गए हैं.

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संगठन के नेताओं ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से आग्रह किया है कि भारतीय अदालतों की अवमानना करने वाली अमरीकी कंपनी डाउ केमिकल्स को बख्शा न जाए. समन के बावजूद कंपनी भोपाल की ज़िला अदालत के सामने नहीं उपस्थित हुई. समन के तहत कंपनी को बुधवार को अदालत में हाज़िर होना था.

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संगठनों ने एक संयुक्त बयान में कहा है कि सरकार को तत्काल घोषणा करनी चाहिए कि जब तक कंपनी समन का पालन नहीं करती, तब तक उसे भारत में किसी तरह के निवेश की इजाज़त नहीं दी जाएगी.

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भोपाल गैस त्रासदी पूरी दुनिया के औद्योगिक इतिहास की सबसे बड़ी दुर्घटना मानी जाती है. तीन दिसंबर, 1984 को मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में यूनियन कार्बाइड की फैक्ट्री से निकली ज़हरीली गैस 'मिक' ने हज़ारों लोगों की जान ले ली थी.

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यूनियन कार्बाइड ऑफ़ इंडिया लिमिटेड को भारत के सुप्रीम कोर्ट ने फ़रवरी 1989 में आदेश दिया था कि वह गैस पीड़ितों को 47 करोड़ डॉलर का मुआवज़ा दे. कंपनी ने आदेश मानते हुए राशि भारत सरकार को दे दी थी, जिसे भारतीय रिज़र्व बैंक में जमा करा दिया गया था.

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साल 2009 की एक रिपोर्ट में कहा गया था कि तकरीबन 50 हज़ार लोग उस वक्त भी लकवा, अंधेपन या शरीर की कमज़ोर प्रतिरोधक क्षमता जैसी गंभीर बीमारियों से ग्रस्त थे. यूनियन कार्बाइड ने शुरुआत में इस घटना की नैतिक ज़िम्मेदारी स्वीकार की, लेकिन बाद में इसे कुछ असंतुष्ट कर्मचारियों की कारस्तानी करार देते हुए पल्ला झाड़ लिया.

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