अनिवार्य मतदान या ‘लट्ठमार लोकतंत्र’!

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चुनाव, मतदान और जनमत एक दूसरे से जुड़े हुए शब्द हैं. मतदाता, वोट और चुनी हुई सरकार का संबंध भी कुछ वैसा ही होता है.

लेकिन उनका क्या जो किन्हीं वजहों से वोट नहीं दे पाते हैं. चुप रहना भी अपनी बात कहने की आज़ादी का हिस्सा माना जाता है.

सरकार उनकी भी होती है जिन्होंने उसे वोट नहीं दिया. लेकिन गुजरात इन सब के इतर फिर से नए मॉडल गढ़ता हुआ दिख रहा है.

गांधी का गुजरात अब नरेंद्र मोदी के गुजरात की तरह व्यवहार करता हुआ सा लगता है. वरिष्ठ पत्रकार मधुकर उपाध्याय इसी पहलू पर रोशनी डालने की कोशिश की है.

मधुकर का विश्लेषण

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महात्मा गांधी के आश्रम ख़ास तरह से जीवन व्यतीत करने की प्रयोगशालाएं थे. लेकिन 'वैज्ञानिक' गांधी अपने प्रयोगों और जीवन की सीमा तय करने को तैयार नहीं थे.

उनके प्रयोग कई बार आश्रम को 'परिवार अदालतों' में बदल देते थे. गांधी को उसमें कोई आपत्ति नहीं होती थी. तरह-तरह के मामले उनके सामने आते थे.

अंतरजातीय, अंतरक्षेत्रीय, अंतरधार्मिक विवाहों से लेकर ज़मीन और दहेज़ के क़िस्से. लोग उनके फ़ैसले मान लेते थे, कई बार अस्वीकार्य क़िस्म की कठिन शर्तों के बावजूद.

एक दिन साबरमती आश्रम में ऐसी ही एक परिवार अदालत के बाद किसी ने गांधी से पूछा कि वह शांति, भाईचारे और प्रेम की बात करते हैं तो लाठी क्यों रखते हैं.

गांधी ने ज़ोर का ठहाक़ा लगाया. वही उनका उत्तर था.

गांधी का मुहावरा

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घटना के सत्रह साल बाद यह क़िस्सा सरदार वल्लभ भाई पटेल ने किसी बैठक में वॉयसराय माउंटबेटन को सुनाया.

कुछ दिन बाद, नौ जुलाई, 1947 को, देसी रजवाड़ों के भारत में विलय के सवाल पर माउंटबेटन ने गांधी से लंबी चर्चा की.

बैठक में उन्होंने प्रेम और परिवार वाला गांधी का मुहावरा उन्हीं पर आज़माया और कहा कि धौंस दिखाकर प्रेम कैसे हो सकता है?

माउंटबेटन ने गांधी की जगह बैठक-कक्ष के एक कोने में रखी उनकी लाठी की ओर देखते हुए कहा, "आप सबका दिल जीतने की बात करते हैं पर रियासतों को धमकी देते हैं. आप जिस लड़की से शादी करना चाहते हैं, क्या लाठी लेकर उसे धमकाएंगे?"

गांधी ने जवाब में अपना चिर-परिचित ठहाक़ा लगाया. शायद उन्हें पुराना संदर्भ याद आ गया.

अनिवार्य मतदान

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माउंटबेटन की टिप्पणी और गांधी का उत्तर गुजरात में मतदान अनिवार्य करने से संबंधित क़ानून पर जस-का-तस लागू होता है.

अनिवार्य मतदान स्वतंत्र रूप से निर्णय लेने की अवधारणा के ख़िलाफ़ है. ऐसा क़दम वैचारिक स्वतंत्रता को अपराध बनाने जैसा होगा.

अगर पिछले आम चुनाव को देखें तो ऐसे कानून के तहत देश की लगभग आधी वयस्क आबादी क़ानूनन 'अपराधी' होगी, जिसे सज़ा देना असंभव होगा.

गुजरात सरकार पिछले पांच साल से यह क़ानून लाने का प्रयास कर रही थी, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी राज्य के मुख्यमंत्री थे.

इस बार न केवल विधानसभा ने 'गुजरात स्थानीय निकाय संशोधन विधेयक' पारित कर दिया बल्कि राज्यपाल ओपी कोहली ने उसे मंज़ूरी भी दे दी.

बेनीवाल का फैसला

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पूर्व राज्यपाल कमला बेनीवाल 2009 और 2011 में इसे नामंज़ूर कर चुकी थीं.

उनका तर्क था कि यह क़ानून संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन करता है, जिसके तहत हर नागरिक को वैयक्तिक और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार हासिल है.

बेनीवाल ने दोनों बार विधेयक बिना-दस्तख़त लौटाते हुए लिखा, "मतदाता को वोट डालने के लिए विवश करना उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता के विरुद्ध है."

नया क़ानून गुजरात के नगर निगमों, ज़िला और तालुका नगरपालिकाओं तथा अन्य स्थानीय निकायों पर लागू होगा.

इस क़ानून पर अमल के नियम-क़ायदे अभी नहीं बने हैं. सरकार के पास इसके लिए एक साल का समय है क्योंकि 321 स्थानीय निकायों के चुनाव अगले साल अक्तूबर में होने हैं.

'असंवैधानिक' क़दम

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कुछ पश्चिमी देशों में अनिवार्य मतदान क़ानून है लेकिन उनका तर्क भारत में लागू नहीं किया जा सकता. उन देशों में चुनाव में लोगों की भागीदारी लगातार कम हो रही थी.

चुनाव आयोग के आंकड़े बताते हैं कि 1990 के दशक के बाद से तकरीबन हर चुनाव में जन भागीदारी बढ़ी है. इसका राष्ट्रीय औसत 50 से 60 प्रतिशत के बीच है और इसमें हर वर्ग के लोग शामिल हुए हैं.

समाज विज्ञानियों का मानना है कि लोकतंत्र की मज़बूती का पैमाना सिर्फ़ बढ़ा मतदान प्रतिशत नहीं होता बल्कि यह विचार होता है कि लोग अपनी इच्छा से सरकारों को सत्ता से बेदख़ल या स्थापित कर सकते हैं.

सत्ता परिवर्तन के सारे प्रमाण इसके पक्ष में हैं इसलिए किसी सरकार को 'असंवैधानिक' क़दम उठाने की ज़रुरत नहीं है.

गुजरात मॉडल

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चुनाव आयोग ख़ुद इसे ग़लत मानता है. चुनाव आयुक्त एचएस ब्रह्मा कहते हैं कि अगर ऐसा क़ानून देश में लागू हो तो क्या हम पिछले आम चुनाव में वोट न डालने वाले 28 करोड़ से ज़्यादा लोगों को जेल में डाल देंगे?

क़ानूनी मामलों के जानकार चाहते हैं कि गुजरात का यह मॉडल देश के लिए नज़ीर न बने.

पूर्व सॉलिसिटर जनरल मोहन पाराशरन आश्वस्त हैं कि उच्च अदालतें इसे अमल में आने से रोक देंगी.

वे मानते हैं कि देश में 'प्रभावी लोकतंत्र' है, उसे 'लट्ठमार लोकतंत्र' की ज़रुरत नहीं है.

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