15वें वर्ष में दाख़िल झारखंड, लेकिन..

  • 15 नवंबर 2014
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तारीख 14 -15 नवंबर. साल 2000. झारखंड में किसी ख़ास या आम से इस दिन के बारे में पूछें, तो पल भर में वो कहेगा कि राजधानी रांची से सुदूर गांवों तक जश्न का माहौल था.

जश्न था बिहार से बंटवारे के बाद अलग झारखंड राज्य का.

15 नवंबर को झारखंड राज्य 15वें साल में प्रवेश कर गया है.

किसी से भी पूछें कि इन सालों में झारखंड ने क्या पाया, तो जवाब दो टूक मिलेगा कि भौगोलिक हिस्से, शासन-प्रशासन का अधिकार तो मिला, लेकिन संतुलित तरक्क़ी के बजाय मुश्किलें बढ़ती गई.

हालाँकि सरकार में शामिल रहे लोग यह दावा करते हैं कि विकास को प्राथमिकताएं दी गई, लेकिन जानकार इससे इत्तेफाक नहीं रखते.

इन्हीं चुनौतियों पर पड़ताल करती नीरज सिन्हा की रिपोर्ट

झारखंड सरकार दावा करती रही है कि आर्थिक हालत में सुधार होने लगा है. राज्य साढ़े सात से आठ प्रतिशत की विकास दर को बनाए हुए है.

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लेकिन आंकड़े बताते हैं कि किसी भी साल विकास के लिए बजट की राशि भी पूरे तौर पर ख़र्च नहीं की जा सकी.

इस साल राज्य का बजट आकार 18,270 करोड़ रुपए का है, लेकिन वित्तीय वर्ष के सात महीने बीतने के बाद भी सिर्फ़ 19.36 प्रतिशत राशि ही खर्च की जा सकी है.

प्रसिद्ध अर्थशास्त्री हरीश्वर दयाल कहते हैं कि यहां वित्तीय प्रबंधन में लगातार चूक होती रही हैं. कर्ज़ भी बढ़ता जा रहा है.

अब तक राज्य के बजट और केंद्र सरकार की सहायता का समयबद्ध सदुपयोग नहीं होना वाकई चिंता की बात है.

नक्सली हिंसा

राज्य में नक्सली गतिविधियां तेज़ होती रही हैं. वर्तमान में 24 में से 21 ज़िले नक्सल प्रभावित हैं.

शाम ढलने से पहले कम से कम दर्जन भर सड़कों पर आवागमन ठप हो जाता है. महीने में औसतन दस दिन पुलिस और माओवादियों के बीच मुठभेड़ होती हैं.

राज्य गठन के बाद नक्सली हिंसा में अब तक 336 पुलिसकर्मी और 1000 से अधिक आमजन मारे गए हैं.

वरिष्ठ पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता फ़ैसल अनुराग कहते हैं कि नक्सली गतिविधियां झारखंड की चुनौती बन चुकी हैं.

उनका दावा है कि सरकारों के सही दिशा में काम नहीं करने की वजह से समस्या बढ़ी है.

महिला विकास और सुरक्षा

महिला कार्यकर्ता वासवी किड़ों कहती हैं कि महिला विकास और सुरक्षा बड़ा सवाल है. 14 साल बाद सरकार ने महिला नीति को मंज़ूरी प्रदान की है, लेकिन उनमें कई खामियां हैं.

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पिछले साल राज्य में डायन के नाम पर 48 हत्याएं और दुष्कर्म के 1240 मामले दर्ज़ किए गए थे. इस साल के जनवरी से अगस्त तक दुष्कर्म के 784 मामले दर्ज हो चुके हैं.

राज्य की आदिवासी महिलाओं में साक्षरता दर 39.35 फ़ीसदी है.

राजनीतिक अस्थिरता

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Image caption झारखंड में 14 साल में 9 मुख्यमंत्री बने हैं

वरिष्ठ पत्रकार चंदन मिश्र का कहना है कि राजनीतिक अस्थिरता ने झारखंड के विकास को बाधित किया है.

इसी अस्थिरता की वजह राज्य में अब तक 16 मुख्य सचिव और दस पुलिस महानिदेशक बने.

यहां 14 साल में नौ मुख्यमंत्री बने, तीन बार राष्ट्रपति शासन लगा. एक निर्दलीय विधायक मधु कोड़ा भी मुख्यमंत्री बनने में कामयाब रहे .

ग़रीबी

सरकारी रिपोर्ट के अनुसार रोजगार और ग़रीबी झारखंड की बड़ी समस्याएं हैं. यहां 1.24 करोड़ की आबादी ग़रीबी रेखा से नीचे जीवन-यापन कर रही है.

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भोजन के अधिकार कार्यक्रम से जुड़े विशेषज्ञ बलराम कहते हैं कि रोजगार के अभाव में ये हालात पैदा हुए हैं.

राज्य गठन के समय यहां 23.94 लाख परिवार ग़रीबी रेखा से नीचे परिवार थे. अभी ये संख्या 35 लाख परिवारों का आंकड़ा पार गई है.

जवाबदेही

प्रसिद्ध अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज का मानना है कि योजनाओं को लागू करने में पारदर्शिता का अभाव और जवाबदेही तय नहीं होना बड़ी चुनौती है.

कैबिनेट से मंज़ूरी मिलने के बाद भी कई योजनाएं महीनों तक शुरू नहीं होती या इनका लाभ लोगों को नहीं मिलता.

आधारभूत ढांचा

जेवियर इंस्टीच्यूट ऑफ सोशल सर्विसेज़ के प्रोफ़ेसर संजीव बजाज कहते हैं कि आधारभूत ढांचे के सुदृढ़ नहीं होने, रोजगार के मौके नहीं बनने और सरकारी विभागों में बड़े पैमाने पर पद रिक्त रहने के कारण कई मोर्चों पर झारखंड को नुक़सान हुआ है.

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खनिज संपदाओं से परिपूर्ण इस राज्य में बिजली, सड़क की कमी के कारण औद्योगिक विकास नहीं हो सका.

सरकारी विभागों में अधिकारियों और कर्मचारियों के 77000 से अधिक पद खाली हैं. एक मई को राज्य में पुलिस के 16 हजार 670 पद रिक्त थे.

शिक्षा व जनजातीय विकास

शिक्षा का अधिकार के राज्य संयोजक एके सिंह का कहना है कि हालात का अंदाज़ा इससे लगाया जा सकता है कि प्राथमिक स्कूलों में शैक्षणिक सत्र के आठ महीने बाद भी बच्चों को किताबें नहीं मिली हैं.

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शिक्षकों के 50 हज़ार पद खाली हैं. स्कूलों में सुविधाओं की ज़बर्दस्त कमी है.

रांची विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र के विभागाध्यक्ष प्रोफ़ेसर रमेश शरण कहते हैं कि अब तक के सभी नौ मुख्यमंत्री आदिवासी समुदाय के हुए हैं, इसके बावजूद जनजातीय विकास की गति धीमी रही है.

चुनौतियां और भी

झारखंड में चुनौतियों की फ़ेहरिस्त लंबी है. महज 25 फ़ीसदी खेतों में ही सिंचाई की सुविधा है, दर्ज़न भर बड़े प्रोजेक्ट्स अटके हैं, सरकारी विभागों मे लगातार घोटाले उजागर हो रहे हैं, लचर स्वास्थ्य सुविधाएं और नई राजधानी या कोर कैपिटल का नहीं बनना शामिल है.

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