पुंछः एलओसी पर डर के साये में चुनाव

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Image caption नियंत्रण रेखा पर भारतीय सैनिक.

भारत प्रशासित जम्मू और कश्मीर में पांच चरणों में होने जा रहे विधानसभा चुनावों की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है.

चुनाव अभियान भी धीरे-धीरे गति पकड़ रहा है. लेकिन पाकिस्तान के साथ नियंत्रण रेखा के नज़दीक के इलाक़ों में चुनाव प्रचार अभी न के बराबर है.

हाल ही में नियंत्रण रेखा पर भारत और पाकिस्तान के बीच ज़बर्दस्त गोलीबारी के कारण आस-पास के इलाक़ों में रह रहे लोगों के बीच भय का माहौल है.

वहीं राजनीतिक दल भी इन क्षेत्रों में प्रचार के लिए जाने से दूरी बनाए हुए हैं.

बीनू जोशी की रिपोर्ट

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पुंछ ज़िला पहाड़ी और दुर्गम है और यहां तीन में से दो विधान सभा सीटों से नियंत्रण रेखा गुज़रती है.

भीतरी इलाक़ों में चुनाव प्रचार शुरू हो गया है लेकिन नियंत्रण रेखा से लगे इलाक़ों में जाने से राजनीतिक दल अभी हिचकिचा रहे हैं.

हाल ही में भारत और पाकिस्तान के बीच हुई भीषण गोलीबारी में पुंछ ज़िले के पुंछ और मेंढर के क्षेत्र भी शामिल थे.

इस वजह से यहां डर का माहौल महसूस किया जा सकता है और यही कारण है कि चुनाव प्रचार अपनी पूरी रफ़्तार नहीं पकड़ सका है.

नियंत्रण रेखा के क़रीब अजोट गांव के परविंदर सिंह का कहना है कि गोलीबारी के दौरान सबको अपनी जान की ही परवाह होती है.

नियंत्रण रेखा के पास

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Image caption पुंछ से नेशनल कांफ्रेंस के उम्मीदवार एजाज अहमद जान.

वह कहते हैं, "हम घर से बाहर नहीं निकलते हैं. भगवान से दुआ ही करते हैं. उस वक़्त की याद भी बहुत ख़ौफ़नाक होती है."

ऐसा ही कहना है दिग्वार गांव के नज़ीर हुसैन का, "हम तो डरे हुए होते ही हैं लेकिन हमें अपने बच्चों को देख कर और भी डर लगता है. उस समय चारों तरफ़ जैसे मौत खड़ी दिखती है."

नेशनल कांफ्रेंस के पुंछ से उम्मीदवार एजाज़ अहमद जान मानते हैं कि नियंत्रण रेखा के पास के इलाक़ों में फ़ायरिंग होने से मतदाता और उम्मीदवारों दोनों के ही मन में डर है.

उनका कहना है, "यह फ़ायरिंग 1947 से चल रही है लेकिन पिछले दिनों में यह काफ़ी बढ़ गई थी. इससे लोगों में डर ज़रूर है लेकिन हमारी सेना और अन्य सुरक्षा बल हमारी बहुत मदद कर रहे हैं."

प्रचार की चुनौती

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पीडीपी उम्मीदवार शाह मोहम्मद तांत्रय इससे सहमत दिखते हैं.

उनका कहना है, "गोलीबारी का ख़ौफ़ तो तलवार की तरह हम सभी पर लटकता रहता है. इसमें कोई शक नहीं है कि अगर गोलीबारी कुछ दिन और चलती तो लोग अपने गांवों से पलायन कर चुके होते."

ऐसे माहौल में राजनीतिक दलों का नियंत्रण रेखा से लगे इलाक़ों में चुनाव प्रचार करना एक चुनौती है. प्रशासन ने सेना के साथ मिलकर यहां प्रचार के साधन बनाए हैं.

उम्मीदवारों को जब नियंत्रण रेखा के नज़दीक प्रचार के लिए जाना होता है तो वो उपायुक्त को इसकी लिखित गुज़ारिश करते हैं और फिर सेना के अधिकारियों को आगे उनके साथ भेजा जाता है.

सुरक्षा का प्रबंध

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Image caption कांग्रेस पार्टी के प्रत्याशी चौधरी बशीर अहमद.

कांग्रेस पार्टी के उम्मीदवार चौधरी बशीर अहमद का कहना है, "यह तरीक़ा अच्छा है और जब भी हमें नियंत्रण रेखा के नज़दीक जाना होता है तो सेना को मालूम होता है. जिससे वे हमारी सुरक्षा का प्रबंध कर देते हैं."

नियंत्रण रेखा पर गोलीबारी शुरू होने की सूरत में सेना को सायरन बजाने को कहा गया है जिससे सब अपने बचाव के लिए सतर्क हो सकें.

एजाज़ अहमद जान का मानना है, "इस चुनाव में सेना की ओर से किए गए इंतज़ाम की वजह से हमें बहुत हौसला मिल रहा है."

नियंत्रण रेखा के पास रह रहे लोगों को चुनाव में अपना वोट डालने के लिए प्रशासन रेडियो के ज़रिए भी शिक्षित कर रहा है. छोटे-छोटे संदेशों द्वारा लोगों से वोट डालने की अपील की जा रही है.

वैकल्पिक मतदान केंद्र

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Image caption पुंछ के उपायुक्त मोहम्मद हुसैन मलिक.

उपायुक्त मोहम्मद हुसैन मलिक के मुताबिक़ ज़िले में प्रचार और चुनाव दोनों के लिए सुरक्षा के प्रबंध और बाक़ी तैयारियां पूरी कर ली गई हैं.

मलिक कहते हैं, "अगर चुनाव के दिन गोलीबारी होती है तो वैकल्पिक मतदान केंद्र तैयार है."

उनके मुताबिक़ नियंत्रण रेखा के नज़दीक 38 मतदान केंद्र हैं और इन सबको अति संवेदनशील श्रेणी में रखा गया है. पुंछ ज़िले की तीन विधानसभा क्षेत्रों में कुल 389 मतदान केंद्र हैं.

उपायुक्त ने भरोसा जताया, "मुझे पुंछ ज़िले में 80 प्रतिशत से ऊपर मतदान की उम्मीद है."

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