छत्तीसगढ़: दवा के नाम पर ज़हर खा रहे थे लोग?

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छत्तीसगढ़ में नसबंदी ऑपरेशनों के बाद मौत का आंकड़ा 15 तक पहुंच गया है.

इन मौतों की वजह सिप्रोसिन-500 दवा को बताया जा रहा है. और अब सवाल उठ रहा है कि सालों से बिक रही इस सिप्रोसीन-500 दवा को खाकर कितने लोग मरे होंगे.

शायद उनकी मौत के लिए कभी इस दवा को ज़िम्मेदार माना ही नहीं गया.

दवाओं की जांच न होती, तो यह राज़ भी कभी न खुलता.

पढ़ें, आलोक पुतुल की पूरी रिपोर्ट

छत्तीसगढ़ के स्वास्थ्य सचिव डॉक्टर आलोक शुक्ला कहते हैं कि पेंडारी और गौरेला पेंड्रा के नसबंदी शिविरों में महिलाओं को मेसर्स महावर फ़ार्मा प्राइवेट लिमिटेड की सिप्रोसीन-500 टैबलेट (सिप्रोफ़्लॉक्सेसिन) खाने के बाद उल्टियां शुरू हुई, जो जानलेवा साबित हुई.

राज्य सरकार ने आनन-फानन में सिप्रोसीन 500 समेत दर्जन भर दवाओं और चिकित्सा सामग्रियों के उपयोग पर प्रतिबंध लगा दिया. सिप्रोसीन बनाने वाली कंपनी के ख़िलाफ़ केस दर्ज कर उसके मालिक गिरफ़्तार किए गए.

'चूहामार दवा'

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स्वास्थ्य सचिव ने स्थानीय लैब में परीक्षण के बाद मीडिया के सामने दावा किया कि सिप्रोसीन-500 में ज़हरीला ज़िंक फ़ॉस्फ़ाइट मिला है, जिसका इस्तेमाल चूहामार दवा में होता है. हालांकि उनका कहना है कि केंद्र सरकार की लैब में इसके परीक्षण के बाद ही अंतिम निष्कर्ष पर पहुंचा जा सकता है.

अभी तक छत्तीसगढ़ की दवा दुकानों से सिप्रोसीन-500 की 43 लाख गोलियां ज़ब्त की गई हैं. सरकारी अभियान जारी है, मुनादी हो रही है कि कोई ये दवा न खाए.

अगर सरकारी दावा सही है तो लोग असल में ज़हर खा रहे थे.

पिछले दो दिनों में अंजोरी सूर्यवंशी, मदनलाल सूर्यवंशी और हरकुंवर बाई निषाद की भी बिलासपुर में मौत हुई और इन्हें डॉक्टरों ने खांसी-बुखार के इलाज के लिए एंटीबायोटिक के बतौर सिप्रोसीन-500 ही दी थी.

घुटकू के मदनलाल सूर्यवंशी की मौत के बाद उनके रिश्तेदार सदमे में हैं. एक परिजन ने कहा, ''भला खांसी-बुखार से भी कोई मरता है?''

सिप्रोसिन के मरीज़

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सिप्रोसीन खाने वाले कम से कम छह लोग छत्तीसगढ़ आयुर्विज्ञान संस्थान में भर्ती कराए गए हैं, जिनका नसबंदी से कोई लेना-देना नहीं. दूसरे अस्पतालों में भी दर्जन भर लोग भर्ती हैं.

बिलासपुर के एक दवा विक्रेता के मुताबिक़, ''यह बहुत सामान्य दवा है और हम लोग इसे बेचते रहे हैं, लेकिन हमने कभी यह देखा ही नहीं कि इसके खाने वाले का क्या हुआ. अगर पता होता तो कभी न बेचते.''

इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के डॉक्टर एलसी मढ़रिया के मुताबिक़ यह काम डॉक्टर का नहीं है कि वह दवाओं की जांच करे, यह तो सरकार की ज़िम्मेवारी है और डॉक्टरों को फंसाया जा रहा है.

पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय के रसायन विभाग के डॉक्टर शम्स परवेज़ का कहना है कि सिप्रोफ़्लॉक्सेसिन दवा पांच चरणों में तैयार होती है और इसमें कहीं भी ज़िंक फ़ॉस्फ़ाइट का इस्तेमाल नहीं होता.

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