छत्तीसगढ़ नसबंदी मामले में पांच सवाल

छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में आयोजित नसबंदी शिविर के बाद हुई 15 से अधिक लोगों की मौत ने कई सवाल छोड़े हैं.

इनमें से कई सवाल छत्तीसगढ़ और ख़ास तौर पर बिलासपुर में चौक-चौराहों पर आम हैं, जिनके जवाब कम से कम अभी तक सामने नहीं आए हैं. एक नज़र ऐसे ही कुछ सवालों पर.

1. नसबंदी शिविर का आयोजन?

उपलब्ध सरकारी दस्तावेज़ बताते हैं कि इस साल नवंबर महीने में बिलासपुर ज़िले में नसबंदी के लिये 29 शिविर लगने थे.

लेकिन उस सूची में पेंडारी और बंद पड़े निजी अस्पताल का कहीं नाम नहीं है.

यहां तक कि आठ नवंबर को वहां किसी शिविर का भी कोई ज़िक्र सरकारी दस्तावेज़ों में नहीं है.

2. न्यायिक जांच का ज़िम्मा अनीता झा को ही क्यों?

सरकार ने इस पूरे मामले की जांच के लिए जिस सेवानिवृत्त ज़िला एवं सत्र न्यायाधीश अनीता झा का एकल न्यायिक आयोग बनाया है, उन्होंने सेवानिवृत्ति के बाद छत्तीसगढ़ वाणिज्यिक कर अभिकरण में अध्यक्ष बनने के लिए आवेदन किया है.

इस वाणिज्यिक कर विभाग का ज़िम्मा स्वास्थ्य मंत्री अमर अग्रवाल के पास ही है.

इसके अलावा सरगुजा में छह जुलाई 2011 को पुलिस द्वारा माओवादी बताकर आदिवासी लड़की मीना खलखो की कथित हत्या के मामले में रमन सिंह सरकार ने 30 अगस्त 2011 को अनीता झा की अध्यक्षता में न्यायिक जांच आयोग बना कर तीन महीने में रिपोर्ट पेश करने के निर्देश दिए थे.

आज तीन साल से अधिक होने पर भी इस आयोग की जांच पूरी नहीं हुई है.

ऐसी परिस्थिति में सरकार ने फिर से अनीता झा से ही न्यायिक जांच कराने की घोषणा क्यों की?

3. दवा की जांच और जांच रिपोर्ट?

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नसबंदी ऑपरेशन कांड में महिलाओं की मौत के लिए स्थानीय स्तर पर जांच के बाद सरकार ने सिप्रोसीन 500 दवा को ज़िम्मेदार माना है.

महिलाओं को दूसरी दवाइयां भी दी गई थीं. क्या सरकार ने उनकी जांच कराई? अगर हां तो उसकी रिपोर्ट सार्वजनिक क्यों नहीं की गई और अगर नहीं तो दूसरी दवाओं की जांच क्यों नहीं कराई गई?

4. क्या डॉक्टरों पर दबाव था?

राज्य सरकार ने चिकित्सकों को अधिक से अधिक नसबंदी ऑपरेशन करने के लिये लक्ष्य निर्धारित किया है और लक्ष्य की पूर्ति नहीं करने वाले डॉक्टरों के वेतन भी रोके गए हैं?

क्या दबाव में डॉक्टर अधिक से अधिक ऑपरेशन करने के लिए बाध्य हुये ?

5. केवल एक कंपनी के ख़िलाफ़ कार्रवाई क्यों?

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सरकार ने नसबंदी शिविर के बाद हुई मौतों के कारण 12 दवा और अन्य चिकित्सा सामग्री पर प्रतिबंध लगाया है.

लेकिन मामला केवल एक कंपनी महावर फार्मा के ख़िलाफ़ ही दर्ज किया गया है.

महावर फ़ार्मा पर धारा 420 यानी धोखाधड़ी का मामला दर्ज किया गया. दूसरी कंपनियों के ख़िलाफ़ ऐसी कोई कार्रवाई नहीं की गई है.

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