'विकास मॉडलों' के बीच ओडिशा से सबक

  • 17 नवंबर 2014
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भारत में विभिन्न राज्यों के विकास मॉडलों की चर्चा होती रही है. गुजरात मॉडल, मध्यप्रदेश मॉडल, केरल मॉडल की अक्सर बात होती है.

लेकिन भारत का कोई भी राज्य विकास के मामले में इतना आगे नहीं है कि उसे एक 'मॉडल' कहा जा सके.

दूसरी तरफ़ हर राज्य में कुछ न कुछ सकारात्मक बदलाव हो रहे हैं. यानी हर राज्य से बाक़ी राज्य कुछ न कुछ सीख सकते हैं. ओडिशा इसकी एक मिसाल हैं जहाँ मिड डे भोजन और वितरण प्रणाली में सफल प्रयोग हुए हैं.

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आजकल 'मॉडलों' की माँग बहुत बढ़ गई है. कुछ लोगों को केरल मॉडल पसंद है, कुछ को गुजरात का, तो कुछ की पसंद राजस्थान मॉडल है. लेकिन सच तो ये है कि ये एक बेकार की खोज है क्योंकि भारत के किसी भी राज्य ने विभिन्न क्षेत्रों में ऐसा प्रदर्शन नहीं किया है कि उसे 'मॉडल' कहा जा सके.

केरल ने कई क्षेत्रों में काफ़ी अच्छा काम किया है लेकिन राज्य में बेरोज़गारी, शराबखोरी और आत्महत्या की दर काफ़ी अधिक है.

गुजरात मॉडल में भी कई खामियाँ हैं. राज्य में लिंगानुपात और महिलाओं की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है.

ऐसी स्थिति में बेहतर होगा कि मॉडलों की तलाश करने के बजाय हम विभिन्न राज्यों की अलग-अलग क्षेत्रों में हासिल की गई सकारात्मक उपलब्धियों से सबक लें.

भारत के किसी भी राज्य की हालात इतनी ख़राब नहीं है कि उससे कुछ सीखा न जा सके.

ओडिशा का सबक

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उदाहरण के तौर पर ओडिशा को ही लें. 'ओडिशा मॉडल' जैसी कोई चीज़ नहीं है.

राज्य में बहुत ज़्यादा ग़रीबी है, सामाजिक सूचकांकों की हालात दयनीय है और सामुदायिक सेवाओं की भी हालात खस्ता है. राज्य में भ्रष्टाचार भी काफ़ी ज़्यादा है.

इन सबके बावजूद ओडिशा राज्य में उम्मीद की कुछ किरणें नज़र आती हैं जिनसे बाक़ी राज्य सबक ले सकते हैं.

पिछले कुछ सालों में हमने ओडिशा और अन्य राज्यों के विभिन्न सामाजिक कार्यक्रमों के बारे में कई अनाधिकारिक सर्वेक्षण किए हैं जिसमें छात्रों ने हमारा सहयोग किया.

इस सर्वेक्षण में मिले कुछ नतीजों की पुष्टि के लिए हम इस महीने के प्रारंभ में ओडिशा के कालाहांडी ज़िले में गए.

हमारा ध्यान ख़ास तौर पर दोपहर का भोजन (मिड डे मील), जनवितरण प्रणाली(पब्लिक डिस्ट्रिब्यूशन सिस्टम), समेकित बाल विकास सेवा(आईसीडीएस) और सामाजिक सुरक्षा पेंशन पर था.

दस साल पहले तक इनमें से ज़्यादातर योजनाएँ शायद ही सक्रिय थीं. आज लोगों को इनसे काफ़ी उम्मीद रहती है. चार विशेष बदलाव ऐसे हैं जिनपर ध्यान देना ज़रूरी है.

आहार में अंडों की बारिश

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पहला, ओडिया बच्चों के बीच इस वक़्त अंडों की बरसात हो रही है. 'मिड डे मील' योजना के तहत हर बच्चे को हफ़्ते में दो बार एक अंडा खाने को मिलता है.

आईसीडीएस योजना के तहत तीन से छह साल की उम्र (जिन्हें आंगनवाड़ी के प्री-स्कूल के बच्चे कहते हैं) के बच्चों को हफ़्ते में तीन बार एक अंडा मिलता है और छोटे बच्चों को दो बार.

गर्भवती और दुग्धपान कराने वाली महिलाओं को भी 'घरे जाने वाले राशन' के साथ अंडे मिलते हैं.

यह एक बहुत बड़ी उपलब्धि है क्योंकि अंडा काफ़ी पोषक आहार है और बच्चों को यह पसंद भी आता है.

वितरण प्रणाली की सफलता

दूसरा, इस क्षेत्र में जनवितरण प्रणाली अब काफ़ी नियमित तरीके से काम करने लगी है.

कालाहांडी के तीन ब्लॉकों में ग़रीबी रेखा से नीचे के जिन परिवारों से हम मिले उन सबको हर महीने 25 किलो चावल मिल रहा था. इन परिवारों को यह चावल एक रुपए प्रति किलो के प्रतीकात्मक मूल्य पर मिलता है.

मुश्किल से जीविका चला पाने वाले परिवारों के लिए यह बहुत बड़ी राहत की बात है.

जूनागढ़ की एक भूमिहीन महिला ने गर्व के साथ अपना राशन कार्ड दिखाते हुए हमसे कहा, "यही मेरी ज़मीन है."

हर महीने पेंशन

तीसरा, ओडिशा भारत का शायद एकमात्र राज्य है जहाँ वृद्धों, विधवाओं और विकलांगों को दी जाने वाली सामाजिक सुरक्षा पेंशन हर महीने समय से दी जाती है.

यह पेंशन हर महीने की 15 तारीख को गाँव के पंचायत घर में नगद दी जाती है. पेंशन पानेवालों के पास व्यवस्थित पासबुक होती है.

मासिक पेंशन काफ़ी कम, 300 रुपए है और इसकी पहुँच भी सीमित है. लेकिन इसे पाने वालों को इस बात का भरोसा रहता है कि उन्हें बग़ैर किसी झिकझिक के समय पर पैसे मिल जाएँगे. वहीं दूसरे राज्यों में आम लोगों के अनुभव इसे काफ़ी अलग होते हैं.

अगर पेंशन राशि बढ़ा दी जाए और योजना का विस्तार किया जाए तो राज्य के सबसे ग़रीब तबके का इससे काफ़ी भला हो जाएगा.

मातृत्व लाभ का सिद्धांत

आख़िरी लेकिन महत्वपूर्ण है, ओडिशा सरकार की तरफ़ से गर्भवती महिलाओं के लिए शुरू की गई मातृत्व लाभ योजना.

इस योजना के तहत हर गर्भवती महिला को कुछ शर्तों के साथ पाँच हज़ार रुपए किश्तों में दिए जाते हैं.

यह योजना अभी अपनी प्रांरभिक अवस्था में है. इसकी पहुँची भी सीमित है और ग़रीब और कम शिक्षित महिलाओं को इसका लाभ उठाने में दिक्कत पेश आती है.

इसके बावजूद यह एक महत्वपूर्ण शुरुआत है क्योंकि इससे मातृत्व लाभ के सिद्धांत की सार्वभौमिकता स्थापित होती है.

उम्मीद है कि समय के साथ योजना में सुधार होगा. इस योजना के जिन लाभार्थियों से हम मिले उन्होंने किसी तरह की गड़बड़ी की शिकायत नहीं की.

काफ़ी काम बाक़ी है

ये उदाहरण इसलिए नहीं दिए गए हैं कि ओडिशा सामाजिक कार्यक्रमों में बेहतर प्रदर्शन कर रहा है.

अभी राज्य में सभी लोगों को बुनियादी सामाजिक सेवाएँ और सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने की दिशा में काफ़ी काम किए जाने की ज़रूरत है.

भ्रष्टाचार भी ख़त्म नहीं हुआ है. यहां तक कि बच्चों को दिए जाने वाले अंडे भी कई बार स्कूल टीचरों या आँगनवाड़ी कर्मियों के पेट में चले जाते हैं.

फिर भी यह ज़रूर है कि राज्य ने यह दिखा दिया है कि हालात बदल सकते हैं, जिसके बारे में दस-पंद्रह साल पहले शायद ही किसी ने सोचा हो.

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पहले ओडिशा के केबीके(कालाहांडी-बोलानगीर-कोरापुट) क्षेत्र को राज्य से बाहर भूखमरी से हुई मौतों के लिए जाना जाता था.

आज, यहाँ के ग़रीबों के लिए घर में चावल होना, अपने बच्चों को स्कूल भेजना और बुढ़ापे में भूखे रहने से बच पाना कोई सपना भर नहीं है.

भले ही यह एक छोटी सी शुरुआत हो लेकिन लंबे से लंबे सफ़र में भी पहला क़दम ही सबसे महत्वपूर्ण होता है.

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