कश्मीरः जांच आयोगों के बीच दम तोड़ता इंसाफ़

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चार साल पहले एक कथित फ़र्ज़ी मुठभेड़ में तीन कश्मीरी नौजवानों की मौत के मामले में सेना ने पिछले दिनों अपने पांच जवानों को उम्रक़ैद की सज़ा सुनाई है. हालांकि इस पर अमल कोर कमांडर की संस्तुति के बाद ही होगा.

लेकिन भारत प्रशासित कश्मीर में ऐसे कई मामले भी हुए हैं जहाँ कोर्ट मार्शल से इनकार कर दिया गया है और जहाँ कोर्ट मार्शल हुए भी, वो मामले हाईकोर्ट में जाकर ख़ारिज हो गए.

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ऐसे कई और मामले हैं जिनमें जांच आयोग बने और जांच चलती रही, लेकिन अभी तक किसी भी अभियु्क्त को सज़ा नहीं हुई.

मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के मुताबिक़, साल 2002 से अभी तक 177 जांच आयोग बनाए जा चुके हैं, लेकिन कोई भी मामला अपने अंजाम तक नहीं पहुंचा.

पढ़ें, माज़िद जहांगीर की रिपोर्ट

कश्मीर घाटी में पिछले 27 वर्षों के दौरान भारतीय सेना, पुलिस और सुरक्षा बलों पर आम नागरिकों की हत्या या बलात्कार के आरोप लगते आए हैं.

ऐसे ही कुछ मामले पिछले वर्षों में सामने आ चुके हैं जिनकी जांच या तो अभी तक पूरी नहीं हुई या फिर फ़ाइलें बंद हो चुकी हैं.

पथरीबल

वर्ष 2000 में अनंतनाग ज़िले के पथरीबल में भारतीय सेना ने एक झड़प में पांच पाकिस्तानी आतंकवादियों को मारने का दावा किया था, लेकिन साल 2006 में सीबीआई ने अपनी जांच में सेना की थ्योरी को रद्द कर इसे फ़र्ज़ी मुठभेड़ करार दिया और अपनी रिपोर्ट में सेना के दो अधिकारियों समेत पांच जवानों को दोषी ठहराया.

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साल 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में आदेश जारी किया कि या तो अभियुक्तों के ख़िलाफ़ सिविल कोर्ट में मामला चलाया जाए या फिर उनका कोर्ट मार्शल हो.

सेना कोर्ट मार्शल पर तैयार हुई, लेकिन फ़रवरी 2014 में सेना ने यह कह कर कोर्ट मार्शल से इनकार कर दिया कि अभियुक्तों के ख़िलाफ़ कोई सबूत नहीं हैं. न्यायिक जज के सामने जब पीड़ितों ने सारा रिकॉर्ड पेश करने की मांग की तो इसे ख़ारिज कर दिया गया.

मेजर रहमान मामला

छह नवंबर 2004 को सेना की एक टुकड़ी ने ज़िला हंदवाड़ा के बदरपाईं में रात में एक घर पर छापा मारा. इस दौरान मेजर रहमान पर कथित तौर पर बलात्कार का आरोप लगा.

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पुलिस ने इस मामले में मामला दर्ज किया और ज़िला प्रशासन ने न्यायिक जांच के आदेश दिए.

मेजर रहमान पर कोर्ट मार्शल के तहत केस चला, जिसमें पाया गया कि मेजर ने 10 वर्षीय लड़की की इज्ज़त पर हमला किया था. मेजर को बर्खास्त कर दिया गया.

बाद में मेजर रहमान ने इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ हाईकोर्ट में अपील की और उन्हें नौकरी पर बहाल कर दिया गया.

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मानवाधिकार कार्यकर्ता परवेज़ ख़ुर्रम कहते हैं, "कोर्ट मार्शल की सबसे बड़ी मुश्किल ये है कि जब किसी के ख़िलाफ़ कार्रवाई शुरू होती है वहां किसी को बुलाया नहीं जाता. अंदर क्या चल रहा है, किसी को भी जानकारी नहीं होती. ऐसा ही कुछ मेजर रहमान के मामले में भी हुआ."

कोर्ट मार्शल के फ़ैसले में सामने आया कि मेजर ने मां और बेटी के साथ छेड़छाड़ की थी. जम्मू-कश्मीर की सरकार और सेना ने मेजर के ख़िलाफ़ मुकदमा दर्ज नहीं किया.

वामिक़ फारूक हत्या

बारह वर्ष के वामिक फ़ारूक़ की मौत 31 जनवरी 2010 को उस समय हुई जब पुलिस की ओर चलाया गया आंसू गैस का गोला वामिक के सिर में लगा. वह गंभीर रूप से ज़ख्मी हुए और अस्पताल में उनकी मौत हो गई.

पुलिस ने मामले का कोई भी नोटिस लेने से इनकार कर दिया, जिसके बाद वामिक के पिता ने अदालत में मामला दर्ज़ कराया.

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पुलिस महानिरीक्षक ने कोर्ट को बताया कि इस मामले में मुकदमा दर्ज किया जा चुका है और तफ्तीश जारी है.

मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने 11 मई 2010 को आदेश दिए कि इस मामले की न्यायिक जांच की जाए. न्यायिक मजिस्ट्रेट ने 26 नवंबर 2010 को अपनी रिपोर्ट सौंपी.

पांच फरवरी 2011 को मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने विशेष जांच टीम बनाए जाने के आदेश दिए, जिसे पुलिस ने सेशन कोर्ट और हाई कोर्ट में चुनौती दी. हालांकि यह आदेश अदालतों ने बरक़रार रखा. अंत में 24 अप्रैल 2013 को विशेष जांच टीम ने अपनी रिपोर्ट सौंपी.

इस दौरान अदालत ने पुलिस के एक सब इंस्पेक्टर और एक पुलिसकर्मी के ख़िलाफ़ ग़ैर जमानती वारंट जारी किए, जिसे हाईकोर्ट में चुनौती दी गई.

बोमिए सोपोर मामला

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21 मई 2009 को कश्मीर के बोमिए में तीन युवकों की फ़ायरिंग में मौत हो गई. पुलिस ने इस मामले में सेना के ख़िलाफ़ हत्या का मामला दर्ज किया और साथ ही मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्लाह ने न्यायिक जांच के आदेश दिए.

सेना ने युवाओं की मौत को क्रॉस फ़ायरिंग का नतीजा बताया. रक्षा मंत्रालय ने 10 जनवरी 2012 को एक आरटीआई में जवाब दिया कि मामले की जांच चल रही है.

कूलर मामला

18 अप्रैल 2002 को सीमा सुरक्षा बल के जवानों पर कश्मीर के कूलर (पहलगाम) में एक 17 वर्षीय लड़की के साथ बलात्कार का आरोप लगा. लड़की ने जवानों पर सामूहिक बलात्कार का आरोप लगाया.

मेडिकल रिपोर्ट में भी बलात्कार की पुष्टि हुई और बीएसएफ़ ने भी इससे इनकार नहीं किया.

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लड़की ने तीन जवानों की शिनाख़्त भी की, जिसके बाद पहलगाम पुलिस स्टेशन में अभियुक्त जवानों के ख़िलाफ़ मामला दर्ज किया गया. पुलिस के मुताबिक इस मामले में आरोप पत्र भी दाखिल हुआ है, लेकिन आज तक कुछ नहीं हुआ.

कश्मीर में काम करने वाले कई मानवाधिकार कार्यकर्ता इन जांच आयोगों को मामलों को टालने का ज़रिया मानते हैं न कि इंसाफ़ दिलाने वाला कोई क़दम.

मानवाधिकार कार्यकर्ता खुर्रम परवेज़ का कहना है कि बड़गाम में दो युवकों की सेना की फ़ायरिंग मौत हो गई और इस घटना के जांच के आदेश भी दे दिए गए, लेकिन सेना के अधिकारियों ने पहले ही फ़ैसला सुना दिया कि युवकों की मौत ग़लती से गोली चलने से हुई थी.

एक नागरिक इमरान वाणी कहते हैं, "हम तो 27 साल से देख रहे हैं कि घटनाओं के बाद जांच के आदेश तो सुने जाते हैं, लेकिन किसी को सज़ा मिली हो, ऐसा कभी नहीं सुना."

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