'मर जाते तो अच्छा था...वोट तो न देंगे'

  • 21 नवंबर 2014

भारत प्रशासित जम्मू-कश्मीर में इन दिनों चुनावी फिज़ा है, लेकिन घाटी में बहुत से लोग अब भी बाढ़ की मार से नहीं उबर पाए हैं.

उनका कहना है कि मुसीबत के समय प्रशासन की ग़ैर मौजूदगी ने उन्हें निराश किया है.

हमने बारामूला में बाढ़ पीड़ित महिलाओं की आपबीती सुनी और पूछा कि आख़िर क्यों सरकार से उनका विश्वास उठ गया है?

बारामूला से शालू यादव की रिपोर्ट

बारामूला ज़िले के दिवर गांव में नसीमा अपने परिवार के साथ टारपोलीन शीट से बने टैंट में बैठी हैं.

उनका ख़ुद का घर बगल में ही है लेकिन वो इस कदर तहस-नहस है कि अंदर पांव रखने की भी जगह नही है.

घर की छत गिर चुकी है और पंखा ज़मीन पर धूल खा रहा है. खिड़की-दरवाज़े मिट्टी से लदे हैं और उनमें से निकली नुकीली कीलें बाढ़ का कहर बयान करती हैं.

अपने घर में पड़े मलबे को हटाते हुए नसीमा के पैर में कील गड़ जाती है और खून बहने लगता है, लेकिन वो आह तक नहीं करती.

मामूली दर्द

खून को अपने मट-मैले हाथों से साफ़ करते हुए वे कहती हैं, "जो सितंबर की बाढ़ के दौरान हमने झेला, उसके मुकाबले तो ये मामूली सा दर्द है."

नसीमा के परिवार ने बाढ़ के दौरान घर से कुछ 300 मीटर दूर पहाड़ी पर खुले आसमान के नीचे दस दिन गुज़ारे.

उस भयावह अनुभव को याद करते हुए नसीमा कहती हैं, "पहाड़ी से अपनी आंखों से अपने आशियाना जब डूबता हुआ दिखता था तो मन बहुत आहत होता था. उन दस दिनों में हमारी दो पल के लिए भी आंख नहीं लगी."

वो बताती हैं "परिवार के बच्चों को ठंड से बचाने के लिए हम महिलाएं उन्हें 24 घंटे सीने से लगाए रखती थीं, लेकिन फिर भी मेरी बहन के एक साल के बच्चे ने दम तोड़ दिया. उसे दफ़नाने के लिए रहमो-ख़ुदा से जंगल में थोड़ी सी सूखी ज़मीन नसीब हो गई."

जिस दिन बाढ़ आई नसीमा और उनका परिवार उनकी मां को अस्पताल से लेकर लौट रहा था. कुछ दिनों पहले ही उनकी मां के पैर में ऐसी चोट लगी कि वे विकलांग हो गईं.

उन्हें व्हीलचेयर पर रख जैसे-तैसे नसीमा और उनके परिवार ने उन्हें पहाड़ी पर चढ़ाया. आने वाले दिन उनके लिए जहन्नुम से कम नहीं थे, ख़ासतौर से परिवार की महिलाओं के लिए.

'अच्छा होता, मर जाते'

नसीमा ने बताया, "उन दिनों हमारे पास वैसे ही ठंड से बचने के लिए पूरे कपड़े नहीं थे, लेकिन महावारी के आने से महिलाओं को अपने तन से कपड़े कम कर उन्हें पैड की तरह इस्तेमाल करना पड़ा."

निराश नसीमा कहती हैं, "अच्छा होता अगर हम सभी उस सैलाब में मर जाते. ऐसी ज़िंदगी से तो मौत ही बेहतर है. आख़िरकार कुछ समाज-सेवी संस्थाओं ने हम महिलाओं को हाईजीन किट मुहैया करवाई."

अपनी नम आँखों को पोंछते हुए वो ग़ुस्से में कहती हैं, "क्या सरकार को हमारी परेशानी दिखाई नहीं देती? इतनी निराशा के बाद अब मेरा सरकार पर से विश्वास से उठ गया है. हम वोट डालने नहीं जाएंगे - न मैं और न ही मेरा परिवार."

'कोई ठिकाना नहीं'

नसीमा प्रकृति के प्रकोप से इतनी नाराज़ नहीं, जितनी की सरकार के रवैये से. चुनाव से ज़्यादा उन्हें अपने ग़ुज़र-बिसर की चिंता है.

थोड़े ही दिनों में कश्मीर में बर्फ़बारी होने वाली है और सिर ढकने के लिए एक टैंट के अलावा नसीमा और उनके परिवार का कोई ठिकाना नहीं है.

रात को पूरा परिवार कंबल के चीथड़ों में एक-दूसरे से चिपट कर सोता है. लेकिन बर्फ़बारी के आगे ये चीथड़े बेहद कम पड़ जाएंगे.

इस कड़ी के अगले अंक में पढ़िए तसलीमा की कहानी जो कश्मीर की उन महिलाओं में से एक हैं जिन्हें ‘आधी-विधवा’ कहा जाता है.

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