एक शाकाहारी ने मैक्डोनाल्ड्स को ऐसे बनाया देसी

  • 23 नवंबर 2014
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मैक्डोनाल्ड्स की पूरी दुनिया में पहचान उसके 'मैक बीफ़बर्गर' से है जबकि भारत में उसे एक अलग पहचान दिलाने वाले शख्स हैं पक्के शाकाहारी.

शुरुआती दिनों में देश में फ़ास्टफ़ूड का चलन बहुत कम था और मैक्डोनाल्ड्स जैसे अंतरराष्ट्रीय ब्रांड को भारतीय स्वाद में परोसना एक चुनौती थी.

इस चुनौती को लिया अमित जटिया ने. उन्होंने कंपनी के सामने शर्त रखी कि बीफ़ (गोमांस) और पोर्क (सूअर का मांस) नहीं बेचा जाएगा.

कंपनी शर्त मान गई और फिर शुरू हुआ आलू टिक्का बर्गर, पनीर बर्गर और चिकन महाराजा.

तब से लेकर अब तक भारत में 350 रेस्तरां खुल चुके हैं और हर वर्ष वहां क़रीब 32 करोड़ खाने जाते हैं.

विस्तार से पढ़ें, शिल्पा कन्नन की रिपोर्ट

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Image caption वर्ष 2004 में पूरे देश में मैक्डोनाल्ड्स को पहुंचाने वाले अगुआ रहे अमित जाटिया (बाएं) और उनके साझीदार विक्रम बाशी और संजीव गुप्तम.

अमित जाटिया पहली बार जब मैक्डोनाल्ड्स में गए थे तब वह महज 14 वर्ष के थे.

यह रेस्तरां जापान में था और शाकाहारी के नाम पर वह केवल मिल्कशेक ही पा सके जो उन्हें पसंद आया.

ये वही अमित जाटिया हैं जिन्होंने भारत में इस कंपनी की असाधारण प्रगति की अगुआई की है.

जब 1994 में इस अमरीकी फास्टफ़ूड चेन ने उनसे संपर्क किया तो उनके सामने सबसे पहली चुनौती अपने शाकाहारी परिवार को इस व्यवसाय में निवेश के लिए तैयार करने की थी.

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उन्होंने बीबीसी को बताया, "हमें जो सबसे अच्छी बात लगी, वो ये कि मैक्डोनाल्ड्स भारतीय रंग में रंगना चाहता था. उन्होंने वादा किया कि मेन्यू में बीफ़ या पोर्क शामिल नहीं किया जाएगा."

वह बताते हैं, "क़रीब आधे भारतीय शाकाहारी हैं और एक शाकाहारी को यहां अपना रेस्तरां चलाने के लिए चुनना, एक समझदारी भरा क़दम है."

अमित और उनके साझीदारों को एक ऐसा उत्पाद लेकर आना था जो भारत में मैकडोनाल्ड्स की पहचान बन सके. इस तरह चिकन महाराजा मैक का जन्म हुआ.

शुरुआत में अमित दक्षिण और पश्चिमी भारत में मैक्डोनाल्ड्स के स्थानीय साझीदार थे.

देसी स्वाद

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बाद में उन्होंने कंपनी के शेयर ख़रीद लिए, अब वे दक्षिण और पश्चिम भारत में अकेले ही इसके मालिक हैं.

खाने-पीने का आदतों में बदलाव कोई आसान काम नहीं था.

अमित कहते हैं, "एक उपभोक्ता के नज़रिए से देखें तो मुझे इस संदेश के साथ शुरुआत करनी थी कि बर्गर अपने आप में पूरा खाना है."

उन्होंने 20 रुपये में आलू टिक्की बर्गर पेश किया, जिसमें पिसे हुए आलू का कटलेट, मटर और भारतीय मसालों का स्वाद होता है.

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अमित कहते हैं, "यह ऐसी चीज़ है जो आपको सड़कों के किनारे सहजता से मिल जाती है. यह मैक्डोनाल्ड्स का भारतीय संस्करण था. स्वाद और पैसा दोनों में ही यह सफल रहा. इसने भारत में इस उद्योग की तस्वीर बदल डाली."

भारत में घर से बाहर खाना खाने का चलन तेज़ी से बढ़ रहा है जिसका फ़ायदा जटिया को मिल रहा है. भारत में मैक्डोनाल्ड्स रेस्तराँओं में हर साल 32 करोड़ लोग पहुंचते हैं.

भारत, ब्राज़ील और चीन में निवेश करने की इच्छुक मल्टीनेशनल कंपनियों को मशविरा देने वाली कंपनी सन्नाम एसफ़ोर के मुख्य संचालक एडवर्ड डिक्सन कहते हैं, "प्रतिस्पर्द्धी क़ीमत पर स्थानीय व्यंजन परोसना, वाकई काम कर गया. एक तरीक़ा, जो काम कर गया वह था, कम क़ीमत वाली आईसक्रीम, जो हरेक की पहुंच में आ गई."

नया बाज़ार, नए ग्राहक

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अन्य देशों के मुक़ाबले भारत में मैक्डोनाल्ड्स के ग्राहक बिल्कुल अलग हैं.

यहां पारिवारिक लोग अपने बच्चों समेत आते हैं और रात्रि भोजन के लिए 19 से 30 की उम्र के लोगों की तादाद काफ़ी ज्यादा होती है.

अमित कहते हैं कि वह एक बार दिल्ली के लाजपत नगर मार्केट के मैक्डोनाल्ड्स रेस्तरां में दोपहर के भोजन के लिए गए, यह देखने के लिए यहां किस तरह की भीड़ आती है.

वह बताते हैं, "सामने की मेज पर एक आईटी पेशेवर मैकस्पाइसी पनीर खाता हुआ अपने लैपटाप में जुटा हुआ था."

उन्होंने कहा, "मेरी बगल की क़तार में कॉलेज के छात्र भोजन साझा कर रहे थे. मेरे ठीक पीछे दो वृद्ध दंपति गंभीर बातचीत में मशगूल थे. उनके साथ एक शर्मीली लड़की और एक लड़का भी था."

अमित कहते हैं, "मैंने पाया कि यहां पारंपरिक शादी की बात चल रही है, आधुनिक भारतीय तरीक़े से. यह एक ऐसी जगह भी बन गई है जहां शादी से पहले संभावित दूल्हे और दुल्हन को मिलाया जाता है."

कड़ी प्रतिस्पर्द्धा

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-मैक्डोनाल्ड्स का भारत में अपना फ़ास्टफ़ूड बाज़ार नहीं है.

-डोमिनोज़ पिज़्ज़ा के भारत में 500 बिक्री केंद्र हैं.

-केएफ़सी के भारत में 300 रेस्तरां हैं.

-डंकिंग डोनट्स के भारत में 30 बिक्री केंद्र हैं.

-बर्गर किंग ने हाल ही में दिल्ली में अपना पहला रेस्तरां खोला है.

मैक्डोनाल्ड्स को भारतीय बाज़ार के अनुरूप ढालना बेहद ख़र्चीला काम था, लेकिन अमित को विश्वास है कि एक लंबे दौर में इसका नतीजा मिलेगा.

किचन

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यहां तक कि आधारभूत संरचनाएं भी अब संयुक्त स्थानीय उद्यम हो गए हैं.

अमित बताते हैं, "वर्ष 2001 में हमने बर्गर बनाने के लिए किचन के सारे उपकरणों को स्थानीय बनाया."

"किचन में रेफ्रिजेशन, चिलर, फ्रीजर और फ़र्नीचर सब कुछ यहीं से लिए गए या बनवाए गए."

हाल के दिनों में मैक्डोनाल्ड्स की ब्रिक्री में दो सौ प्रतिशत का इजाफ़ा हुआ.

हालांकि वह मानते हैं कि अभी इसे और बढ़ाया जा सकता है इसीलिए अगले एक दशक में 1000 नए रेस्तराँ खोलने की योजना है.

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