रोजी की 'ख़ुदकुशी' के लिए कॉरपोरेट भारत ज़िम्मेदार?

  • 23 नवंबर 2014
फेसबुक पेज 'जस्टिस फॉर रोजी रॉय' इमेज कॉपीरइट Other

केरल में जब नर्सिंग की एक छात्रा ने ख़ुदकुशी कर ली तो सोशल मीडिया पर उनके नाम से एक अभियान शुरू हो गया.

इस अभियान का वास्तविक निशाना कॉरपोरेट भारत और 'सत्तारूढ़ तबक़ा' है.

इंटरनेट पर इस बहस में शामिल लोगों के लिए यह समझना आसान है कि आखिर क्यों रोजी रॉय आम आदमी और खास आदमी के बीच के फ़ासले का प्रतीक बन गई हैं.

रोजी जवान थीं, गरीब परिवार से आती थीं और वे एक ऐसे प्राइवेट हॉस्पीटल से पढ़ाई कर रही थीं जो खुद को एक 'बेहतरीन और उम्दा स्वास्थ्य संस्थान' के तौर पर पेश करता है.

रोजी का समर्थन

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मगर हॉस्पीटल प्रबंधन से झगड़े के बाद रोजी ने खुदकुशी कर ली.

रोजी की मौत छह नवंबर को तिरुअनंतपुरम के केरल इंस्टीट्यूट ऑफ़ मेडिकल साइंसेज़ (केआईएमएस) की 10वीं मंज़िल से कथित तौर पर गिरने से हुई थी.

उनके ख़िलाफ़ फ़र्स्ट ईयर के दो छात्रों से रैंगिंग करने की शिकायत दर्ज कराई गई थी. रोजी की मौत के ठीक पहले अस्पताल ने उनके ख़िलाफ़ रैगिंग की जांच शुरू की थी और रोजी ने इन आरोपों से इनकार किया था.

रोजी की मौत के बाद फ़ेसबुक पर हज़ारों लोगों ने इस नर्सिंग छात्रा के समर्थन में तस्वीरों, वीडियो और स्टेटस के ज़रिए विरोध दर्ज कराया.

इन लोगों की बातों में एक चीज़ कॉमन थी कि वे केरल के 'सत्तारूढ़ तबक़े' के ख़िलाफ़ नाराज़गी जता रहे थे.

फ़ेसबुक पेज

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लोगों को लगता था कि रोजी की सामाजिक पृष्ठभूमि की वजह से पुलिस की जांच और मीडिया कवरेज में ज़्यादा तवज्जो नहीं दी गई.

फ़ेसबुक पेज 'जस्टिस फ़ॉर रोजी रॉय' को अब तक 40 हज़ार से ज़्यादा लोगों ने लाइक किया है. पेज पर रोज़ सैकड़ों तस्वीरें साझी की गई हैं.

सोशल मीडिया पर केरल के लोगों ने इस पेज को खूब शेयर किया है. अभियान के संयोजकों का कहना है कि उनके आंदोलन को मध्यपूर्व, ब्रिटेन, दक्षिण अफ्रीका और अमरीका में रह रहे भारतीयों ने भी समर्थन दिया है.

फ़ेसबुक पेज 'जस्टिस फ़ॉर रोजी रॉय' के एडमिन जहांगीर रज़ाक पलेरी कहते हैं, "हमने फ़ेसबुक पर यह पन्ना इसलिए शुरू किया था क्योंकि हमें लगा कि इस मुद्दे पर मीडिया खामोश है."

सोशल सरगर्मी

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उनका कहना है, "ख़बरों में केवल उन कंपनियों से जुड़ी चीज़ों को जगह मिलती हैं जो उन्हें विज्ञापन देते हैं. वे हमारे समाज के गरीब तबक़े को नज़रअंदाज़ करते हैं. न पुलिस ने और न सरकारी अधिकारियों ने किसी तरह की जांच की और इसी वजह से केरल के लोग नाराज़ हैं."

सोशल मीडिया की सरगर्मी के बाद सरकार ने मामले की जांच की घोषणा कर दी है. हालांकि अस्पताल प्रशासन और पुलिस ने इन आरोपों से इनकार किया है और कहा कि उन्होंने नियमों के मुताबिक़ कार्रवाई की है.

तिरुअनंतपुरम के पुलिस कमिश्नर एच वैंकटेश ने बीबीसी ट्रेंडिंग से कहा, "मामले की जांच जारी है और हम अभी तक किसी नतीजे पर नहीं पहुंचे हैं."

रैगिंग के आरोप

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अस्पताल के कार्यकारी निदेशक ईएम नजीब ने बीबीसी से कहा, "लोगों ने सोशल मीडिया पर अस्पताल के बारे में कहानी बनानी शुरू कर दी है. हमारी ग़लती यह है कि हमने जो किया वह क़ानूनी तौर पर ज़रूरी था."

भारत में रैगिंग के मामलों की जांच क़ानूनी तौर पर ज़रूरी है. नजीब कहते हैं कि अस्पताल को अपनी बात रखने का मौक़ा नहीं दिया गया, "हमने उनके फ़ेसबुक पेज पर जब भी अपनी बात रखी, उन्होंने उसे तुरंत हटा दिया."

जहांगीर रज़ाक कहते हैं कि उन्हें अनजान लोगों ने धमकाया है लेकिन वे इसके बावजूद अभियान से जुड़े हुए हैं.

'सत्तारूढ़ तबक़े'

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'जस्टिस फ़ॉर रोजी रॉय' पर एक पोस्ट में लिखा है कि यह अभियान अस्पातल के ख़िलाफ़ नहीं बल्कि केरल के 'सत्तारूढ़ तबक़े' से उनका विरोध है.

केरल वाम राजनीति का गढ़ रहा है और जिस तरह इस मामले की रिपोर्टिंग की गई है, उससे लोगों में निराशा है.

एक और जहां भारत में पेड न्यूज़ की ख़बरें आती रहती हैं, वहीं कुछ लोगों में डर है कि मीडिया उन ख़बरों को छोड़ देता है, जिन्हें बड़े विज्ञापनदाता नहीं चाहते.

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