धर्म का विमान सिर्फ़ हिंदुत्ववादी नहीं उड़ाते!

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गणेश के सिर पर हाथी का सिर लगाने के रूप में पहली मेडिकल सर्जरी भारत में हुई थी.

दुनिया की पहली विमान यात्रा राम ने की थी.

भौतिकी का अनिश्चितता का सिद्धांत दुनिया में सबसे पहले भारतीय ऋषियों ने दिया था...ऐसी बातें कई हिंदुत्ववादी कहते रहे हैं.

लेकिन इस तरह की पुनरुत्थानवादी बातें केवल हिंदुत्ववादी ही नहीं करते. दुनिया के सभी धर्मों में ऐसे लोग मिलते हैं.

ऐसे लोग धर्म की प्रामाणिकता कुछ 'चिह्नों' के माध्यम से स्थापित करना चाहता हैं.

जबकि आधुनिक युग में 'विज्ञान' ही सबसे बड़ा 'चिह्न' प्रतीत होता है.

पढ़ें ताबिश खैर का लेख

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कुछ महीने पहले हिंदुत्व के उद्घोषक दीनानाथ बत्रा ने कॉस्मोपोलिटन ट्विटरबाज़ों को जानकारी दी कि भगवान राम पहले व्यक्ति थे जिन्होंने हवाई जहाज़ की यात्रा की थी.

उसके बाद से दूसरे कई हिंदुत्ववादियों ने इस बात को पूरे आत्मविश्वास (ऐसे लोगों आत्मविश्वास से हमेशा लबालब होते हैं) के साथ दोहराया कि हाइज़नबर्ग के अनिश्चितता का सिद्धांत समेत आधुनिक विज्ञान की कई अन्य उपलब्धियाँ प्राचीन भारत में, संभवतः उद्यमी अडानी और अंबानी के पूर्वजों ने सबसे पहले हासिल की थीं.

इन बयानों से कॉस्मोपॉलिटन ट्विटरबाज़ों में खलबली मच गयी. वो मेरी तरह किसी क़स्बे में तो पले-बढ़े नहीं हैं, जहाँ ऐसे बयान आँखों देखे सच की तरह पेश किए जाते हैं.

राम जहाज़ में उड़े थे ये बात मैंने पहली बार 10 साल की उम्र में सुनी थी यानी क़रीब 40 साल पहले.

दावे के दावेदार

दरअसल ऐसे दावे इससे भी पहले से किए जाते रहे हैं. ऐसे दावे सभी धर्मों के लोग कहते हैं. ऐसी बातों की शुरुआत ईसाइयों ने 18वीं सदी में की थी.

आज भी बत्रा के ईसाई संस्करणों की कमी नहीं है. ऐसे ईसाइयों की संख्या कम है लेकिन अभी वो विलुप्त नहीं हुए हैं.

इन लोगों को यकीन है सभी आधुनिक वैज्ञानिक खोजों का मूल बाइबिल है. जैसे, साम 102:25-26 में एंट्रॉपी के बारे में जानकारी दी गयी है.

इसमें लिखा है, "प्रारंभ में तुमने रखी धरती की आधारशिला, स्वर्ग तुम्हारे हाथों की रचना हैं. वो नष्ट हो जाएंगे लेकिन तुम रहोगे, वो कपड़ों की तरह झड़ जाएंगे. कपड़ों की तरह तुम उन्हें बदलोगे और वो हो जाएंगे नष्ट."

बाइबिल में लिखी ऐसी बातों की सूची काफ़ी लंबी है. 19वीं सदी के अंत तक मुस्लिम और हिंदू भी इस होड़ में शामिल हो गए जिससे पहले सी लंबी यह सूची और लंबी हो गई.

बहुत से मुस्लिम मानते हैं कि बिग बैंग और जैविक जीवन का आधार जल होने के बारे में सूरा अल-अनबिया की 30वीं आयत में बताया गया है.

क़ुरान के सूरा अध-धरियात की 47वीं आयत में ब्रह्माण्ड के प्रसार के बारे में बताया गया है.

नकलची कौन?

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आख़िर, हिंदू और मुस्लिम धार्मिक पुनरुत्थानवादी ईसाई पुनरुत्थानवादियों से पीछे कैसे रह सकते हैं?

ये देखना काफ़ी मज़ेदार है कि ये पुनरुत्थानवादी किस हद तक एक-दूसरे की नकल करते हैं जबकि वो बाकियों को ईसाइयों का नकलची कहते हैं क्योंकि वो लोग नए साल पर न्यू ईयर कार्ड भेजते हैं!

यह सचमुच एक गंभीर समस्या है. दिक़्क़त है कि धार्मिक लोगों को अदृश्य शक्ति में बहुत कम विश्वास है. उन्हें विश्वास करने के लिए 'चिह्नों' की ज़रूरत होती है. हालांकि वो दावा करते हैं कि वो अदृश्य 'सत्य' में यकीन रखते हैं.

वो इस बात पर ज़ोर देते हैं कि 'सत्य' को चिह्नों के माध्यम से प्रकट किया जा रहा है. चिह्न बदल सकते हैं, वो जादुई हो सकते हैं, जैसे किसी मूर्ति की आँखों से टपकता दूध या ख़ून.

हो सकता है कि ये चिह्न किसी मृत व्यक्ति का फिर से जी उठना हो, ये भविष्य की गौरवशाली सटीक भविष्यवाणी हो सकता है, या फिर बीते हुए कल की कोई आह्लादित कर देने वाली उपलब्धि.

या इसे कम से कम, सभी सवालों से ऊपर एक ऐसी किताब होना चाहिए जो सीधी भगवान के पास से आयी हो!

जो लोग दावा करते हैं कि वो बिना किसी सबूत के भरोसा करते हैं, हैरान कर देने वाली बात है कि वही धार्मिक लोग सबूतों पर किस कदर आश्रित हैं. चिह्नों को सबूत ही माना जाता है.

विज्ञान का यकीन

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लेकिन विज्ञान चिह्नों पर यकीन नहीं करता, वो पद्धति में यकीन करता है. विज्ञान जानता है कि चिह्न सुसंगत नहीं होते.

लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि विज्ञान शून्य से पैदा हुआ है. इसका जन्म मनुष्य की कल्पना और अनुभव से हुआ है.

अगर भारत के बत्रा जैसे लोग थोड़ा अध्ययन करें तो उन्हें पता चल जाएगा कि दुनियाभर की सभी पुरानी सभ्यताओं में 'हवाई जहाज़ों' की कहानियाँ मिल जाएंगी, जिनमें उड़ने वाले घोड़ों, झाडु़ओं, रथों, चटाइयों, महलों का ज़िक्र मिलता है.

यह सूची भी काफ़ी लंबी है. और इसमें कोई हैरानी वाली बात नहीं है.

मनुष्य चिड़ियों को उड़ते हुए और बादलों को आकाश में तैरते हुए देखता रहा है और इस अनुभव का प्रयोग वो हर युग में विभिन्न तरह की उड़ने वाली चीज़ों की कल्पना करने के लिए करता रहा है.

मनुष्य के होने के नाते वो और क्या करता? लेकिन असली हवाई जहाज़ के प्रारंभिक स्वरूप का डिज़ाइन राइट बंधुओं ने किया था.

इसे बनाने के लिए इसके सुसंगत विकास और बहुत से सिद्धांतों और तकनीकियों की ज़रूरत हुई. इन सबका भौतिक प्रमाण मौजूद है और इन्हें वैज्ञानिक अगली पीढ़ी को हस्तांतरित करते रहे हैं ताकि वो इसे आगे बढ़ा सकें.

विसंगति के बीच सुसंगति

Image caption दीनानाथ बत्रा अपने बयानों को लेकर चर्चा में रहे हैं.

इसी तरह एंट्रॉपी की अवधारणा मानवीय अनुभवों पर आधारित धार्मिक और दार्शनिक प्रेक्षणों की तरह नहीं है.

मनुष्य दुनिया की विसंगतियों के बीच सुसंगति बिठाने की कोशिश करता है, या विसंगतियों और व्यवस्थाओं के बीच जीता है.

इन निर्णयों पर पहुँचने के लिए आपको जीना और विचार करना होता है, लेकिन ये निर्णय आपको वैज्ञानिक दृष्टि या अवधारणा नहीं प्रदान करते.

इसके लिए आपको एक सामूहिक प्रयास की ज़रूरत है, इसे व्यवस्थित तरीके से प्रमाणिक और ठोस रूप में दर्ज करने की ज़रूरत होती है.

आप भी जानते हैं कि विज्ञान में रेडिमेड 'जादुई हवाई जहाज़' वाले राम नहीं होते. यह आइंस्टीन के लिए भी संभव नहीं था.

लेकिन धार्मिक लोगों को 'चिह्नों' की ज़रूरत होती है और आज के समय में विज्ञान से ताक़तवर 'चिह्न' क्या होगा?

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