'मुंबई हमलों से सरकार ने कुछ नहीं सीखा'

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मुंबई उच्च न्यायालय ने महाराष्ट्र सरकार को फटकार लगाई है कि उसने छह साल पहले मुंबई पर हुए हमले से कोई सीख नहीं ली है.

मुंबई उच्च न्यायालय में पुणे निवासी अश्विनी राणे की दायर जनहित यचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने कहा है कि पुलिस बल में किसी प्रकार का सुधार लाने की कोशिशें नज़र नहीं आई हैं.

याचिका इस मुद्दे पर दायर की गई है कि मुंबई हमलों के बाद सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सरकार ने जो घोषणाएँ की थीं वो वहाँ तक पूरी हुई हैं.

अदालत ने महाराष्ट्र सरकार को आदेश दिया है कि मुंबई पुलिस के हथियारों का हर तीन साल में ऑडिट किया जाए और डाआईजी स्तर के अधिकारी के नेतृत्व में इस मकसद के लिए एक कमेटी गठित की जाए.

फ़िलहाल ये 2010 से नहीं हुआ है.

'उपयुक्त हथियार न थे'

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सुनवाई के दौरान न्यायाधीश विद्यासागर कानडे और न्यायाधीश अनुजा प्रभुदेसाई ने यह भी कहा कि 2008 के हमले में मुंबई पुलिस के आला अफसरों की मौत इसलिए हुई क्योंकि उनके पास उपयुक्त हथियार नहीं थे.

नवंबर 2008 में तीन दिन तक चले हमले में 160 से अधिक लोग मारे गए और अनेक घायल हुए थे.

कोर्ट ने आतंकवाद विरोधी दस्ते में तैनात पुलिसकर्मियों, अधिकारियों की ज़रूरतों का विशेष रूप से ध्यान रखने को भी कहा गया.

याचिकाकर्ता के वकील अनिल अंतुरकर ने न्यायालय को बताया कि महाराष्ट्र सरकार के नीतिगत फैसले के अनुसार पुलिस कर्मियों को हर महीने महज़ 250 रुपये महंगाई भत्ता दिया जाता है.

उनका कहना था कि यह 8 रुपए प्रतिदिन बनता है और इतने पैसों में तो पुलिसकर्मी एक वड़ा पाव भी नहीं खा सकते हैं.

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इस पर न्यायालय ने कहा कि सरकार पुलिसकर्मियों को दिए जाने वाले आर्थिक भत्तों का उचित ध्यान रखे नहीं तो उनसे अच्छे काम की उम्मीद करना गलत होगा.

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