मोदी के छह महीनों में छह अवतार

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कहा जाता है कि किसी राजनेता के कई चेहरे होते हैं.

चुनाव से पहले और चुनाव के बाद. शायद इसलिए कि सत्ता में आने से पहले और सत्ता में आने के बाद की परिस्थितियां अलग-अलग होती हैं.

नेता चुनाव जीतने के बाद विधायक या सांसद बनते हैं, फिर सीएम या पीएम बनते हैं और फिर अचानक सीईओ बन जाते हैं.

वरिष्ठ पत्रकार मधुकर उपाध्याय छवि गढ़ने की इसी राजनीति के ताने बाने को इस आलेख में समझा रहे हैं.

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जो लोग अवतार लेते हैं, कुछ अलग क़िस्म के होते हैं. बड़े-बड़े नजूमी और ज्योतिषी घबराते हैं, भविष्यवाणी करने में.

क्योंकि अवतार अपनी सुविधा से बिना सूचना, बिना घोषणा कब दूसरा अवतार धर ले, हाड़-मांस का ज्योतिषी कैसे जाने.

अवतार लेने वालों को समझने में एक समस्या यह भी रहती है कि वे ग्रह-नक्षत्रों से ऊपर होते हैं. पैदा होते तो स्थान और समय का महत्व होता. उसकी गणना हो पाती. पता चलता कि कौन ग्रह कुंडली में कहां बैठा है, किसे देख रहा है. कौन अस्त है, कौन अपने विरोधी के घर में है.

'भक्तों की सुध'

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साढ़ेसाती और शनि की ढैय्या मामूली लोगों पर आती है. जिसका जन्म ही न हुआ हो, उसके लिए क्या साढ़ेसाती, क्या सवासाती.

उसके मार्गी या वक्री होने का क्या मतलब जो स्वयं ग्रह हो, किसी पर भी ग्रहण की तरह लगने में सक्षम.

मिथक गवाह हैं कि अवतारी लोग अपने भक्तों की सुध लेते हैं. बाक़ी पर उनके आते ही ग्रहण लग जाता है. खग्रास.

तब भक्तों में भी श्रेणियां बनने लगती हैं. कुछ भक्तियां संदेह के घेरे में आ जाती हैं और आपसी बंटवारा शुरू हो जाता है. भक्त के मूल अर्थ के शायद सबसे निकट-भक्त यानी कि बंटा हुआ.

भक्त अपने आराध्य अवतार को कभी पूरा नहीं समझ पाते.

कई अवतार!

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उनकी संपूर्णता देख नहीं पाते. जहां तक उनकी दृष्टि पहुंचती है, उसी को 'पूर्णावतार' मान लेते हैं. आलोचकों का हाल इससे भिन्न नहीं होता.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी संभवतः अपने भक्तों, प्रशंसकों और आलोचकों के बीच इसी तरह देखे जाते हैं.

दिल्ली में बतौर प्रधानमंत्री अवतार लिए हुए उन्हें छह महीना हुआ है और इस दौरान उन्हें कई अवतारों में देखा गया.

बिना किसी स्पष्टता के कि असल नरेंद्र मोदी कौन हैं.

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तमाम छिटपुट अवतारों को दरकिनार कर दें तो सत्तासीन होने के बाद, हर महीने एक अवतार के औसत से, उनके छह अवतार प्रमुख रूप सामने आए.

अनंत यात्री अवतार

एक सौ अस्सी दिन में 32 दिन विदेश यात्रा. अमेरिका से ऑस्ट्रेलिया और नेपाल से फिजी तक. सूवा से डाल्टनगंज ऐसे आए जैसे बग़ल का ज़िला हो. घरेलू यात्राएं इसके अलावा.

इतनी यात्रा कि घर में छह महीने पूरे हुए और वे स्वयं विदेश में. विपक्षी दल अभी से उन्हें 'एनआरआई प्रधानमंत्री' कहने लगे हैं.

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सीईओ अवतार

राजनीतिज्ञ कम, किसी बड़ी कंपनी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी की तरह वे लक्ष्य निर्धारित करते हैं और पूरा अमला उसे तय समय सीमा में हासिल करने में लग जाता है.

पहले, लोकसभा चुनाव में 272+ का लक्ष्य था. ताज़ा लक्ष्य 44+ का है, जम्मू कश्मीर को लेकर.

अब तक की सफलता ने समाज को 'हांकने' की प्रवृत्ति को बल देते हुए सीईओ का क़द बढ़ा दिया है.

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व्यापारी अवतार

ख़ुद को 'गुजराती व्यापारी' कहने वाले अवतार के 'मेक इन इंडिया' में अभी भले कुछ न हुआ हो, लेकिन उनके जुमलों ने भक्तों के लिए उन्हें आर्थिक सुधारों का नया मसीहा बना दिया है.

हालांकि 'लुक ईस्ट' को 'ऐक्ट ईस्ट' कहने भर से निवेश नहीं बढ़ने वाला, पर यह अवतार बड़े देशों के साथ छोटे देशों की ओर भी देख रहा है.

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गुरु-ज्ञानी अवतार

भाव-भंगिमा हमेशा वही गुरु वाली रहती है. अगर दाढ़ी कुछ लंबी होती तो अब तक पदनाम मिल गया होता.

लड़कियों की सुरक्षा, भ्रूणहत्या विरोध, सफ़ाई, हर घर- हर स्कूल में शौचालय. इतना ज़ोर कि लालक़िले से भी यही ज्ञान दिया. झाड़ू ख़ुद उठा ली.

शिक्षक दिवस पर बच्चों से मुख़ातिब. गुजरात में एक प्रकाशन ने उन्हें 'महात्मा' कहना शुरू कर दिया है.

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Image caption कैनबरा में ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री टॉनी एबॉट के साथ नरेंद्र मोदी

भ्रमित-चकित अवतार

पता नहीं चल पाता कि उनका असल स्वरूप कौन सा है- कड़क या नरम. एक ओर इतने कड़क कि देर से आने वालों की शामत.

ख़बरें यह भी हैं कि एक मंत्री के कपड़े हवाई अड्डे से बुलाकर बदलवा दिए. लेकिन हिंदूवादी भड़काऊ बयानों पर नरम. आलोचना तो दूर, कड़ा बयान तक नहीं.

कूट-राज नीति अवतार

यह भी साफ़ नहीं हो पाया है कि वे बड़े कूटनीतिज्ञ हैं या बड़े राजनीतिज्ञ. सब अपने ढंग से अटकलें लगा रहे हैं.

सौ दिन में कालाधन नहीं आया, ओबामा आ रहे हैं. इस अवतार का एक पक्ष 'कांग्रेस मुक्त भारत' है तो दूसरा विश्व में 'भारत का डंका' बजाना.

थोड़ी कामयाबी दोनों ओर मिली है.

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