खाली होते पहाड़ों में उद्योग लगाने की कवायद

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उत्तराखंड की कांग्रेस सरकार ने पहाड़ों में औद्योगिक विकास के लिए नई नीति को मंज़ूरी दी है.

इस नीति के तहत सूक्ष्म, छोटे और लघु उद्योगों को पहाड़ी क्षेत्र में उद्योग लगाने के लिए आकर्षक रियायतें दी गई हैं.

सरकार का दावा है कि इससे पहाड़ों से पलायन रोकने में मदद मिलेगी. औद्योगिक विकास होगा तो पहाड़ी युवाओं में आत्मनिर्भरता आएगी.

पहाड़ों में रोज़गार के संसाधन बढ़ेंगे और अन्य बुनियादी सुविधाओं का स्तर बढ़ेगा और दूरस्थ इलाक़ों में शिक्षकों और डॉक्टरों की कमी को पूरा किया जा सकेगा.

देहरादून से शिव जोशी की रिपोर्ट

हिमालय उद्योग नीति के नाम से जारी इस नई पहल के तहत दूरस्थ और पर्वतीय क्षेत्रों को 'ए' और 'बी' दो श्रेणियों में बांटा गया है.

'ए' श्रेणी में पिथौरागढ़, उत्तरकाशी, चमोली, चंपावत, रूद्रप्रयाग और बागेश्वर ज़िले हैं.

'बी' श्रेणी में पौड़ी, टिहरी और अल्मोड़ा ज़िलों के अलावा देहरादून और नैनीताल के 650 मीटर से ज़्यादा ऊंचाई वाले क्षेत्र शामिल हैं.

'ए' श्रेणी के क्षेत्रों में उद्योग लगाने पर सरकार 40 फ़ीसदी जबकि 'बी' श्रेणी के लिए 30 फीसदी सब्सिडी देगी.

मुफ़्त बिजली

उद्यमियों को सब्सिडी के अलावा बिजली मुफ़्त देने का प्रावधान किया गया है.

सरकार 70 औद्योगिक क्षेत्रों को विकसित भी करेगी, इसके लिए लैंड बैंक चयनित करने की बात कही जा रही है.

उद्योगों को बिजली बिलों, वैट, स्टाम्प शुल्क और यातायात शुल्क पर भी सब्सिडी दी जाएगी.

बीजेपी सांसद और उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री बीसी खंडूरी कहते हैं, "पहाड़ के लिए नीति तो पहले ही बनी हुई है, विधानसभा से पास है, बीजेपी ने बनाई हुई है, उसी को आगे बढ़ाते लेकिन. ये सरकार असल में हीन ग्रंथि की शिकार है, इसीलिए बीजेपी के अच्छे कामों को नज़रअंदाज़ कर रही है."

पहाड़ की तस्वीर

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खंडूरी का कहना है, "उधर पहाड़ में पलायन हो रहा है. गांव के गांव खाली हो रहे हैं. इनकी नीति में इस बारे में क्या है."

छह साल पहले तत्कालीन बीजेपी सरकार ने विशेष औद्योगिक पर्वतीय नीति लागू की थी, तीन साल पहले तत्कालीन मुख्यमंत्री भुवन चंद्र खंडूरी ने इसमें कुछ संशोधन भी किए थे.

उस समय भी यही दावा किया गया था कि उद्यमी पहाड़ों में आएंगें, पहाड़ की तस्वीर में बदलाव आएगा.

ऐसा कुछ हुआ नहीं बल्कि छूट की आड़ में कुछ प्रतिष्ठानों पर सरकारी खजाने को नुक़सान पहुंचाने के आरोप लगे.

दूसरी बात राज्य में तेज़ी से मैदानी इलाक़ों की तरफ़ पहाड़ी क्षेत्रों से लोगों का पलायन हुआ है.

नीति में सुधार

Image caption पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा के साथ उत्तराखंड के मुख्यमंत्री हरीश रावत.

आख़िर ये उद्योग धंधे खुल भी जाएं तो इनके ग्राहक कहां और कितने होंगे. सड़क किनारों की रिहाइशों के आधार पर क्या उद्यमी ये जोखिम लेंगे, ये एक बड़ा सवाल है.

मुख्यमंत्री हरीश रावत नई नीति को लेकर उठ रहे सवालों को दरकिनार करते हुए कहते हैं, "विरोधियों को तो स्वागत करना चाहिए था. वैसे उनकी नीति के अनुसार एक भी उद्योग कहीं नहीं आया. हमने उस नीति में सुधार किया है."

उन्होंने बताया, "पहले की अपेक्षा सुविधाएं दोगुनी कर दी हैं. रूट बनाए हैं. उनमें उम्मीद है कि छोटे उद्यमी आगे आएंगे. और उसी में हमने अपनी जलविद्युत उत्पादन नीति को भी जोड़ा है."

बुनियादी कमियां

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पहाड़ को लेकर नीति बनाने या बदलने में बीजेपी और कांग्रेस सरकारों ने तो तत्परता दिखाई लेकिन अमल में ये कितना आ पाई, राज्य गठन के 14 साल इसके गवाह हैं.

आज राज्य की पूरी डेमोग्राफ़ी ही एक तरह से बदल गई है. मैदानी इलाक़ों पर जनसंख्या का दबाव है और पहाड़ों में वीरानी बढ़ती जा रही है.

सरकारों में दूरदर्शिता का अभाव रहा है. हिमाचल म़ॉडल को लागू करने में संकोच और नाकामी देखी गई है.

केवल छूट और सुविधाएं देने से पहाड़ पर उद्योग धंधों की स्थापना की मुहिम को आगे बढ़ाना मुश्किल लगने लगा है.

सरकारी छूट

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Image caption खंडूरी कहते हैं कि नई औद्योगिक नीति में पलायन के मुद्दे को नहीं उठाया गया है.

बुनियादी सुविधाओं की भारी कमी है.

बिजली में सब्सिडी की बात तो नीति में है लेकिन राज्य के पास क्या औद्योगिक जमात की बिजली की मांग पूरा करने लायक बिजली है.

कनेक्टिविटी भी एक समस्या है. और सबसे बड़ी आशंका इस बात को लेकर है कि कहीं सरकारी छूट के नाम पर बंदरबांट न होने लग जाए.

ये सुनिश्चित किए बिना पहाड़ की चिंता के सारे पैमाने और प्लान हवाई ही नज़र आएंगे.

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