भारत के सिर से निकलेगा 'पाकिस्तानी भूत'!

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भारत को अगर अंतरराष्ट्रीय प्लेयर बनना है तो उसे पाकिस्तान से आगे देखना होगा. इसके भूत को सिर से निकालना होगा.

दस साल पहले जब मैंने यह बात मुंबई के एक उद्योगपति से सुनी थी तो यह सोचकर नज़रअंदाज़ कर दिया था कि उन्हें दौलत का नशा है और विदेश नीति के बारे में कुछ मालूम नहीं है.

लेकिन दस साल बाद आज भी ये भूत भारत के सिर पर सवार नज़र आता है. चीन के विकास को देखकर लगता है कि उस उद्योगपति को 10 साल पहले भारत का विदेश मंत्री होना चाहिए था.

भारत की आबादी हो या इसका साइज़ या फिर इसके साधन- और अब इसका क़द- सब इस तरफ़ इशारा करते हैं कि पाकिस्तान से मुक़ाबला छोड़ो और चीन का पीछा करो, जिससे उस उद्योगपति के अनुसार भारत 20 साल पीछे है.

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मगर आज भी भारतीय मीडिया या विदेश मंत्रालय के नीति निर्माता, पाकिस्तान उनके दिमाग़ पर सवार है.

हां, यह सही है कि भारत की कोख से पाकिस्तान ने जन्म लिया है इसलिए दोनों का इतिहास साझा है.

ये भी सही है कि पाकिस्तान भारत का अहम पड़ोसी है जो परमाणु हथियारों से लैस है, इसलिए उसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता.

पाकिस्तान की तरफ़ से सुरक्षा का मुद्दा भी भारत की बड़ी चिंता है.

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भारत-पाकिस्तान रिश्ते पिछले 68 साल में मज़बूत नहीं हो सके हैं और कश्मीर मुद्दे के कारण भविष्य में भी इसकी उम्मीद कम है. ऐसे में भारत का फ़ोकस पाकिस्तान के पार होना चाहिए.

शुरुआत हुई है, लेकिन अब तक इसकी रफ़्तार धीमी थी. पिछले कुछ सालों से भारत अहम देशों को रिझाने की कोशिश कर रहा है और उसे दुनियाभर के लोग रिझाने में लगे हैं, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कोशिशों ने इसमें एक नई रफ़्तार ला दी है.

मोदी का लक्ष्य

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मोदी ने पिछले छह महीने में जितनी सरकारी विदेशी यात्राएं की हैं, उससे ज़ाहिर है कि वह पाकिस्तान से आगे सोच रहे हैं.

वह बड़े और विकसित देशों से रिश्ते मज़बूत करने में जुटे दिखाई देते हैं, साथ ही पड़ोसी देशों से भी संबंध सुधारने में लगे हैं. पाकिस्तान को नज़रअंदाज़ नहीं कर रहे, लेकिन उसके साथ उलझे नज़र नहीं आते.

अंतरराष्ट्रीय समुदाय में भारत की छवि बेहतर हुई है. अमरीका के राष्ट्रपति बराक ओबामा हों या रूस के पुतिन, भारत की तरफ़ सभी की रुचि बढ़ी है.

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मोदी के प्रभावशाली नेतृत्व में भारत का अंतरराष्ट्रीय समुदाय के साथ मेल-मिलाप बढ़ा है. उसका एक कारण उनके प्रशासन में पाकिस्तान की अहमियत में कुछ कमी. साथ ही चीन से संबंध में बेहतरी की कोशिशें.

समस्या यह है कि मोदी की रफ़्तार अपने साथियों और विदेश मंत्रालय की नीति बनाने वालों से कहीं ज़्यादा है.

ओबामा को न्योता

बराक ओबामा को गणतंत्र दिवस समारोह पर निमंत्रण भेजने का आइडिया जितना निराला था उतना ही असामान्य. यह विचार मोदी का था.

विदेश मंत्रालय के राजनयिकों के अनुसार वो अब मोदी की रफ़्तार और सोच के आदी होने की कोशिश कर रहे हैं.

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अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ कहते हैं कि अगर भारत को एक 'ग्लोबल प्लेयर' बनना है तो उसे पाकिस्तान से नहीं, चीन से मुक़ाबला करना होगा जो भारत से हर मामले में कहीं आगे है.

चीन पिछले 20 साल से भारत के पड़ोस में बुनियादी ढांचों के प्रोजेक्ट्स बनाने में लगा है. अफ्रीका में भारत से कहीं अधिक उसका निवेश है.

प्रधानमंत्री मोदी चीन के प्रशंसकों में से एक हैं और गुजरात के मुख्यमंत्री की हैसियत से वो चार बार चीन का दौरा कर चुके हैं.

इसीलिए वह भारत को चीन की तरह निर्माण का गढ़ बनाना चाहते हैं. साथ ही चीन के साथ संबंध भी बेहतर करना चाहते हैं.

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