अर्जुन मुंडा पर समस्याओं के तीर

  • 29 नवंबर 2014
मतदाताओं के बीच अर्जुन मुंडा

शुक्रवार दोपहर के तीन बजे हैं और हम पूछते हुए सरायकेला-खरसावां ज़िले के सुदूर बोंदोलोर गांव पहुंचे हैं.

कच्ची टूटी-फूटी सड़क पर धूल उड़ाती हुई हमारी गाड़ी को बोंदोलोर पहुंचने में ख़ासी मुश्किलें आई.

झारखंड में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के कद्दावर नेता और पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा के प्रचार का यह पहला दिन है. वह तीन बार इस विधानसभा सीट का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं.

पढ़ें सलमान रावी की रिपोर्ट

गांव में दिनभर के प्रचार के बाद भोजन और विश्राम के दौरान वह पुराने परिचितों से भी मिल रहे हैं. एक-एक कर लोगों को नाम से पुकारते हैं. जनसंपर्क के लिए काफ़िला तैयार है.

प्रचार की गाड़ियों ने गांव की ऊबड़-खाबड़ सड़क का सफ़र शुरू कर दिया. एक बार भी नहीं लगा कि यह मुख्यमंत्री रहे किसी नेता का चुनावी क्षेत्र है.

मुझसे रहा नहीं गया और मैंने पूछ डाला, "मुंडा जी, सड़क का तो बुरा हाल है." वह फट से बोले कि यह 'काली मिट्टी' पर बनी सड़क है, इसीलिए कमज़ोर है.

मुंडा ने कहा, "आप जब रांची से आए तो आपने आदित्यपुर से यहां तक की सड़क देखी? चार लेन की सड़क है. उसमें काफ़ी लागत लगी है. ये गांव की सड़कें हैं. उतनी लागत से नहीं बनी हैं. हालांकि इतना हुआ है कि अब गांव के लोगों को शहर आने के लिए सड़क तो मिल गई है."

अगला पड़ाव चकरी गांव है, जहां आदिवासी ग्रामीणों का समूह अपनी समस्याएं लेकर खड़ा है. एक के बाद एक. किसी को वृद्धावस्था पेंशन न मिलने की शिकायत है, तो किसी को सिंचाई में परेशानी.

स्थानीयता

आदिवासी युवकों के समूह में से एक ने बताया कि स्थानीयता की नीति निर्धारित न होने से सरकारी पद खाली पड़े हैं.

बतौर मुख्यमंत्री तीन कार्यकाल बिताने वाले अर्जुन मुंडा ने भरोसा दिलाया कि जल्द ही स्थानीयता नीति तय की जाएगी.

फिर पलटकर मुझसे बोले, "मुझे ख़ुशी है कि अब आदिवासी नौजवान बोलने लगे हैं. अपने हक़ की बात करते हैं. पहले ये ऐसे नहीं थे. इनमें काफ़ी बदलाव आया है."

कुछ किलोमीटर दूर दूसरे गांव के लिए फिर कच्ची सड़क से सफ़र शुरू हुआ.

अपनी विधानसभा भी नहीं

इसी बीच, मैंने पूछ डाला कि झारखंड को बने 14 साल हो गए, पर राज्य की अपनी विधानसभा इमारत नहीं है और सचिवालय भी रांची के एचईसी की प्रोजेक्ट बिल्डिंग से चलता है.

मुंडा ने माना कि कमज़ोर सरकारें होने से नीतिगत फ़ैसले लेने में परेशानी ज़रूर होती है, लेकिन नई विधानसभा का नक्शा तैयार है. अमलीजामा पहनाना बाक़ी है.

विरोधी दलों का अर्जुन मुंडा पर आरोप रहा है कि वो विधानसभा क्षेत्र में समय नहीं बिताते. पर उन्होंने इन आरोपों को ग़लत बताया और कहा कि उनके क्षेत्र के लोगों को अहसास है कि उन पर संगठन की भी ज़िम्मेदारी है.

झारखंड में पिछले 14 साल में तीन बार राष्ट्रपति शासन लगा है. अब अर्जुन मुंडा के चुनावी एजेंडे पर पूर्ण बहुमत की सरकार है. इसलिए वह लोगों के बीच यही बताने की कोशिश कर रहे हैं.

सिंहभूम के इलाक़े में दो दिसंबर को मतदान होना है. देखना यह है कि क्या इस बार भी खिचड़ी सरकार ही झारखंड के नसीब में है.

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