'हिंदू बिजली, मुसलमान टमाटर..नहीं चाहिए'

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दक्षिण एशिया में जिस तरह एक दूसरे से दिल तंग हो रहे हैं उनके होते सार्क शिखर सम्मेलन में ऊर्जा का क्षेत्रीय नेटवर्क बनाने का फ़ैसला एक महत्वपूर्ण क़दम है.

वैसे सार्क ने अब तक हर सम्मेलन में क़दम तो बहुत ही महत्वपूर्ण उठाए हैं पर नतीजा क्या निकला, एक और महत्वपूर्ण क़दम...बस.

पिछले तीस वर्ष से सार्क की गति देखें तो कछुआ भी हिरण लगे है. अगर सार्क इसी स्पीड से चलता रहा तो आशा है अगले 100 साल में वहाँ तक ज़रूर पहुँच जाएगा जहाँ दक्षिण-पूर्व एशिया का आशियान 47 वर्ष में पहुँच चुका है.

और अगर सार्क को यूरोपीय संघ के स्तर तक पहुँचना है तो भइया, आज की स्पीड से उसे कम से कम 150 साल और चाहिए.

निराशा नहीं दुखी

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आप कह सकते हैं कि मैं इतना निराश क्यों हूँ? मैं निराश नहीं, दुखी हूँ क्योंकि आठ देशों के सार्क को भारत और पाकिस्तान ने बंदी बना रखा है.

दोनों देश पूरे संसार को फलता-फूलता देखना चाहते हैं सिवाय अपने मोहल्ले के.

संयुक्त राष्ट्र हो या शंघाई कोऑपरेशन ऑर्गेनाइजेशन या एशियाई और यूरोपीय देशों की इकोनॉमी कोऑपरेशन ऑर्गेनाइजेशन, इंडिया और पाकिस्तान इन संस्थानों की शिखर बैठकों में बड़ी शराफत दिखाते हैं लेकिन अपने ही मोहल्ले की पंचायत में भावबली बन जाते हैं और नाक गजभर की कर लेते हैं.

और फिर बांग्लादेश, नेपाल, भूटान, श्रीलंका, मालदीव और अफ़ग़ानिस्तान दोनों की नाक लपेटने के काम में जुटकर, जो करने के काम हैं भूल जाते हैं.

दावे पर दावे

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उस पर दावे ऐसे कि बस लपेटते जाओ...यूरोपीय संघ बन जाएंगे, कॉमन करेंसी इस्तेमाल करेंगे, वीज़ा ख़त्म हो जाएगा, कॉमन इकोनॉमी ज़ोन बन जाएगा, कोलंबो से काबुल तक सार्क सड़क चमकेगी, ढाका से कराची तक सार्क रेल बनेगी. ये तीर मार लेंगे, वो भाला चला लेंगे.

और हालत ये है कि एक ही कमरे में होते एक दूसरे से कन्नी काट लेंगे, रास्ता बदल लेंगे, मैगज़ीन मुँह के सामने रख लेंगे, कहीं आँखें न चार हो जाए, कहीं हाथ मिलाना न पड़ जाए.

अपनी बुलेटप्रूफ़ गाड़ी लेकर जाएंगे कहीं दूसरे की बुलेटप्रूफ़ में न बैठना पड़ जाए.

दोनों तरफ़ का रवैया

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लेकिन दोनों तरफ़ जिस तरह का बचपना दिन-ब-दिन बढ़ता चला जा रहा है उसके होते मुझे तो बिल्कुल आश्चर्य न होगा कि अगर पाकिस्तान में कोई पागल ये उठकर नारा लगा दे कि सीमापार से हिंदू बिजली नहीं चाहिए, भारतीय शक्कर मुर्दाबाद.

और भारत में कोई दीवाना जुलूस निकाल दे कि मुसलमान टमाटर नामंजूर... चरमपंथी प्याज हाय-हाय...घुसपैठी बांग्लादेशी मछली नहीं चलेगी-नहीं चलेगी, वगैरह-वगैरह.

हर सार्क सम्मेलन में सबसे बड़ी ख़बर यही क्यूँ होती है कि भारत और पाकिस्तान के नेताओं ने एक दूसरे से हाथ मिलाया या नहीं मिलाया.

क्यूँ इतना ख़र्चा करते हो चोटी की कांफ्रेसें करने में, क्यूँ थकते हो मुस्कराने के लिए जबरदस्ती बांछे खोलने में?

पहले दिलों की बैठक तो बुला लो....सार्क भी ख़ुद ब ख़ुद सीधा हो जाएगा...

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