भोपाल में भी थी हिटलर वाली गैस

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यूनियन कार्बाइड के भोपाल स्थित संयंत्र के संभावित ख़तरे को लेकर आयी शुरुआती ख़बरों को नेताओं और अफ़सरों ने नज़रअंदाज किया.

मुख्यधारा के मीडिया ने भी कमोबेश यूनियन कार्बाइड संयत्र के संभावित ख़तरों के प्रति आँखें मूँद रखीं.

लेखक राज कुमार केसवानी वो पत्रकार हैं जिन्होंने दुनिया को सबसे चेतवानी दी थी कि कार्बाइड किसी बड़े हादसे को जन्म दे सकती है.

वो लगतार इस ख़बर को करते रहे और आखिरकार उनकी बात सच निकली. केसवानी गैस पीड़ित होने के अलावा उन लोगों में से हैं जिन्होंने सबसे पहले यूनियन कार्बाइड पर मुकदमा किया.

(पढ़िए- 25000 मौतें, सज़ा 35 मिनट प्रति मिनट)

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Image caption भोपाल गैस त्रासदी के पीड़ितों का प्रदर्शन

1981 के क्रिसमस के समय की बात है. मेरा दोस्त मोहम्मद अशरफ़ यूनियन कार्बाइड कारखाने में प्लांट ऑपरेटर था और रात की पाली में काम कर रहा था.

फ़ॉस्जीन उत्पादन करने वाली मशीन से संबंधित दो पाइपों को जोड़ने वाले ख़राब फ्लैंज को बदलना था. जैसे ही उसने फ्लैंज को हटाया, जानलेवा फ़ॉस्जीन गैस की चपेट में आ गया.

उसे तुरंत अस्पताल ले जाया गया पर अगली सुबह अशरफ़ ने दम तोड़ दिया.

अशरफ़ की मौत मेरे लिए एक चेतावनी थी. जिस वजह से मेरे एक दोस्त की मौत हो गई, उसे मैंने पहले ही गंभीरता से क्यों नहीं लिया? मैं अपराधबोध से भर गया.

1978 के नवंबर में हुई आगजनी के कुछ ही दिनों बाद मेरे एक अन्य दोस्त ने भी मुझे कारखाने से होने वाले ख़तरे के प्रति आगाह किया था. वह भी यूनियन कार्बाइड का कर्मचारी था.

जाग जाने की घंटी

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उस समय कारखाने में जिन रसायनों का उपयोग शुरू किया गया था, उनको लेकर अशरफ़ आशंकित और परेशान था. यहां तक कि वह वहां की नौकरी छोड़ने के बारे में भी सोचने लगा था.

फ़ॉस्जीन और ‘मिक’ (मिथाइल आइसोसायनेट) जैसे घातक रसायनों के प्रयोग के कारण अपने कुछ सहकर्मियों को वह बीमारियों की गिरफ़्त में पड़ते देख चुका था.

लेकिन उस समय मैंने उसकी चिंताओं को तवज्जो नहीं दी थी.

उस समय मैं पत्रकारिता में नया था. कुछ छोटी-मोटी नौकरियाँ की थीं. बाद में 1977 से अपना एक साप्ताहिक हिंदी अख़बार ‘रपट’ निकालने लगा था.

यह आठ पन्नों का एक टैब्लॉयड था. महज 2000 के सर्कुलेशन वाले इस अख़बार को विज्ञापन से न के बराबर आमदनी होती थी. इसके लिए एकमात्र सहारा था मेरा छापाखाना ‘भूमिका प्रिंटर्स’, जिसे बैंक से कर्ज़ लेकर शुरू किया था.

इस अख़बार की वजह से मुझे अपनी पसंद की ख़बरें बिना किसी रोक-टोक के छापने की आज़ादी हासिल थी.

कंपनी का इतिहास

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बहरहाल, आगे बढ़ने से पहले यूनियन कार्बाइड के बारे में कुछ जानकारियां पेश करना चाहूंगा. इसका नाम यूनियन कार्बाइड इंडिया लिमिटेड (यूसीआइएल) था.

यह अमेरिकी यूनियन कार्बाइड कॉरपोरेशन की सहायक कंपनी थी.

इसके भोपाल कारखाने ने 1969 से केवल एक फ़ॉर्मुलेशन प्लांट के तौर पर काम शुरू किया था. फ़ॉर्मुलेशन एक सरल क्रिया है, जिसके तहत इंपोर्टेड कीटनाशक को फ़ीका किया जाता है.

1977 में इसने अमेरिका से इस्पाती ड्रमों में भरकर लाए गए मिक से बने कीटनाशक का उत्पादन शुरू कर दिया. फ़ॉस्जीन और मिथाइलैमाइन गैसों के मेल से तैयार किया जाना वाला यह मारक मिश्रण था.

अगले चरण के तहत 1980 में मिक संयंत्र स्थापित किया गया. वही कारखाना, जिसने 1984 में भोपाल को 'सिटी ऑफ़ डेथ' (मुर्दों का शहर) का तमग़ा चस्पा करवा दिया.

जानकारी का अभाव

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जब मैंने इस स्टोरी पर काम शुरू किया था तब मेरे पास ये जानकारियां भी नहीं थीं. दरअसल, कार्बाइड के बारे में तुरंत कोई सूचना उपलब्ध नहीं थी सिवाय इसके कि यह ‘सेविन’ और ‘टेमिक’ नामक कीटनाशकों का उत्पादन करने वाला कारखाना था.

मैं शहर की तमाम लाइब्रेरियों, ख़ासकर ब्रिटिश लाइब्रेरी और स्थानीय साइंस कॉलेज से कैमेस्ट्री का ज्ञान हासिल करने में जुट गया.

पता चला कि दूसरे विश्वयुद्ध में इसका इस्तेमाल किया गया था. हिटलर के गैस चैम्बरों में भी इसका इस्तेमाल हुआ था.

इस जानकारी ने मुझे चौंका दिया. फिर भी मिक को लेकर मैं जैसे अंधेरे में भटक रहा था. इसमें फ़ॉस्जीन की मात्रा कहीं ज़्यादा थी और यह मिश्रण ज़्यादा घातक हो सकता था.

यहां की किसी भी लाइब्रेरी में उपलब्ध कोई भी जानकारी मेरी पहुंच से दूर नहीं रह गई थी. इस बीच मैंने इसके यूनियन कार्बाइड पर ही अपनी नजर गड़ा दी.

दो नए दोस्त

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अशरफ़ की मौत के बाद इस कारखाने में मेरी जान-पहचान का शायद ही कोई था. लेकिन इसके चलते मैं ज़्यादा दिनों तक अटका नहीं रहा.

जल्दी ही मुझे वहां दो अजीज दोस्त मिल गए- बशीरुल्लाह और शंकर मालवीय. ये दोनों तेज़ तर्रार मजदूर नेता थे, जिन्हें कार्बाइड मैनेजमेंट ने बर्ख़ास्त कर दिया था क्योंकि उन्होंने मैनेजमेंट के मजदूर विरोधी रवैए के कारण एक अफ़सर की कथित रूप से पिटाई कर दी थी.

उन्होंने अशरफ़ की मौत के लिए मैनेजमेंट को ज़िम्मेदार बताया था और वे उसकी विधवा के लिए सही मुआवजे की मांग कर रहे थे.

दोनों की नौकरी चली गई थी लेकिन उन्हें कर्मचारियों का भारी समर्थन हासिल था.

मीडिया से निराश

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वे स्थानीय मीडिया से निराश हो चुके थे क्योंकि वह कार्बाइड की मेहरबानियों के बोझ तले दबा था और उसकी तरफ़दारी करता था.

इस रिश्ते को मज़बूत बनाने के लिए यूनियन कार्बाइड इलेवन और ख़ास तौर से गठित जर्नलिस्ट्स इलेवन के बीच दोस्ताना क्रिकेट मैच भी आयोजित किए जाते थे.

जीत या हार का जश्न जम के मनाया जाता था और बियर और शराब खुल कर बहायी जाती थी.

मैनेजमेंट की कामगार विरोधी नीतियों या सुरक्षा के उपायों के प्रति घोर लापरवाही के ख़िलाफ़ यूनियन के हर बयान को मालिक के ख़िलाफ़ कर्मचारियों की आम नारेबाजी मान कर ख़ारिज कर दिया जाता था.

तस्करी का सहारा

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नौकरी से बर्ख़ास्तगी ने बशीर और मालवीय को भारी आर्थिक संकट में डाल दिया था. रोजाना के खर्चे जुटाने के लिए उन्होंने शहर में सवारी टेंपो चलाना शुरू कर दिया था.

अगले कुछ हफ्तों तक मैं इन दोनों का शागिर्द बना रहा. मैं यूनियन कार्बाइड के रसायनों, उसकी मशीनों, उसके मैनेजमेंट और कामगारों के बारे में जानकारियां लेता रहा.

लेकिन मेरे पास कुछ ऐसे सवाल थे, जो उनके ज्ञान से बाहर के थे. सो, हमने इन सवालों के जवाब हासिल करने के लिए दोहरी तस्करी का रास्ता अपनाया.

कई बार वे मुझे तस्करी से कारखाने में पहुंचा देते, तो कई बार मेरे सवालों के जवाब देने वाले कागज़ात को तस्करी से बाहर ले आते थे.

तफ़्तीश के बाद पहली ख़बर

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हर चीज की कई-कई बार तफ़्तीश करने के बाद जाकर वह मकाम आया जब मैं पूरी पुख़्तगी के साथ कुछ कह सकता था.

पूरे नौ महीने की इस मशक़्क़त के बाद ख़बर की, ‘बचाइए हुजूर! इस शहर को बचाइए’, यह शीर्षक था 17 सितंबर 1982 को प्रकाशित मेरी पहली रिपोर्ट का.

इस रपट में यूनियन कार्बाइड में हुए गैस रिसावों का क्रमवार ब्योरा था और इनके कारण आसपास के इलाकों में लोगों, खेतीबाड़ी, मवेशियों को हुए नुकसानों का जिक्र किया गया था.

रपट में यह भी बताया गया था कि कारखाने के अपने आपरेशन मैनुअल में सुरक्षा के जो मानक तय किए गए थे, उनकी किस तरह पूरी अनदेखी की जा रही थी.

विज्ञान महाविद्यालय में केमिस्ट्री के प्रोफेसर की असहमति के बावजूद मैंने इस रपट को प्रकाशित किया. इन रसायनों के बारे में अपने अल्पज्ञान के कारण ही अपने फ़ैसले पर टिका रहा.

विशेषज्ञों की राय

मैंने यह जाना कि फ़ॉस्जीन और मिथाइल आइसोसायनेट गैसें हवा की तुलना में दो-ढाई गुना ज़्यादा भारी होती हैं.

इस जानकारी ने मुझे इस बात पर अड़े रहने की ताकत दी कि अगर इन गैसों का भारी रिसाव हुआ तो ये पूरे शहर पर छा जाएंगी.

और क्योंकि ये हवा से भारी हैं लिहाज़ा ज़मीन पर आकर जम जाएंगी, तब क्या लोगों की मौत नहीं होगी?

'वर्ल्ड वार' में तो फ़ॉस्जीन का इस्तेमाल ही इसलिए हुआ था कि वह ज़मीन पर एक अदृश्य बादल की तरह मौजूद रहकर हर गुज़रने वाले को अपनी ज़द में ले लेती थी.

मुझे यकीन हो चला था कि गैस लीक होने पर लोग ज़रूर मरेंगे. मेरे सवालों का कोई तसलीबक्श जवाब किसी के पास नहीं था, लिहाज़ा मेरे पास अपनी बात पर अड़े रहने के अलावा कोई चारा न था.

आख़िर मेरे शहर के और मेरे अपने लोगों की ज़िंदगी का सवाल था.

( यहाँ पढ़ें राजकुमार केसवानी की इन कोशिशों का क्या नतीज़ा हुआ.)

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