लिट फेस्ट का साहित्य से कितना नाता है?

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'टाइम्स ऑफ़ इंडिया' अख़बार की तरफ़ से आयोजित लिट फ़ेस्ट में 'तहलका' पत्रिका के पूर्व संपादक तरुण तेजपाल को बुलाए जाने के बाद विवाद हो गया.

साहित्य और पत्रकारिता जगत से जुड़े कई लोगों ने उन्हें बुलाए जाने का विरोध किया क्योंकि तेजपाल अपने साथी जूनियर पत्रकार के कथित यौन शोषण के मामले में अदालती कार्रवाई का सामना कर रहे हैं.

लिट फ़ेस्ट को लेकर पहले भी कई तरह के विवाद होते रहे हैं.

कई बार इन विवादों का साहित्य से कोई नाता नहीं होता और इस लिट फ़ेस्ट से शायद ही किसी वास्तविक साहित्यिक उद्देश्य की पूर्ति होती है.

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टाइम्स ऑफ़ इंडिया लिट फ़ेस्ट को टैबलॉयड टाइप 'स्टार' विवाद से पर्याप्त प्रचार मिल चुकी है.

ऐसा लगता है कि बड़े लिट फ़ेस्ट (साहित्यिक समारोह) के लिए ऐसे विवाद ज़रूरी हो चुके हैं. इसके बावजूद, एक बार फिर यह सवाल उठता है कि ऐसे लिट फ़ेस्ट की आख़िर ज़रूरत ही क्या है?

एक ज़माना था जब साहित्यिक कृति पर बनने वाली फ़िल्म का काफ़ी नाम होता था.

आजकल तो कहा जा रहा है कि फ़िल्मी सितारों से लदी-फदी फ़िल्मों की बकवास स्क्रिप्ट पर आधारित 'बेस्ट-सेलिंग' उपन्यास लिखे जा रहे हैं.

लिट फ़ेस्ट का फ़ैशन भी इसी का परिणाम है.

लेखक अब लिखने वाले व्यक्ति के बजाय एक परफॉर्म करने वाला व्यक्ति बन गया है, एक ऐसा कलाबाज़ जो मीडिया के मंच पर करतब दिखाता है.

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ज़ाहिर है कि कुछ लेखकों ने हमेशा ही परफॉर्म किया है. हर कवि जानता है कि बोले गए शब्द, लिखित शब्दों का ही एक पक्ष हैं जिनका रचनात्मक प्रयोग किया जाता है.

लेकिन ऐसे लेखकों ने अपने लेखन का प्रदर्शन किया है जबकि आजकल अकसर उम्मीद की जाती है कि लेखक अपने व्यक्तित्व का प्रदर्शन करें, जैसे कि कोई 'अभिनेता' या 'रियलिटी प्रोग्राम का स्टार' करता है.

पहला अनुभव

इन बातों को सबसे पहले मैंने जयपुर लिटररी फ़ेस्टिवल के दौरान महसूस किया. उस समय तक मैं जितने भी लिट फ़ेस्ट में शामिल हुआ था उनमें यह सबसे बड़ा था और यह भारत में मेरा पहला बड़ा फ़ेस्टिवल था.

जयपुर से पहले भी यूरोप के कुछ फ़ेस्टिवल में मैं रचना पाठ कर चुका था. मुझे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मुख्य रूप से एक साहित्यिक लेखक के रूप में जाना जाता था. इस पहचान में एक अलग ही गूँज थी.

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बहुत संभव था कि ऐसे ही किसी फ़ेस्टिवल में एस्टोनिया या इटली के किसी व्यक्ति से मिलना हो जाए और बस इसलिए कि उसने मेरी लिखी कोई किताब पढ़ी है.

ऐसी मुलाक़ातें किसी लेखक के लिए ऑक्सीजन की तरह होती हैं क्योंकि एक लेखक आमतौर पर एकांत और अलगाव की स्थिति में लिखता है. लेकिन ऐसी मुलाक़ातें अकेले में ही होती हैं.

जयपुर का अनुभव अलग था. मुझे दर्ज़नों ऐसे लोग मिले जो मेरे साथ फ़ोटो खिंचाना चाहते थे या मेरा ऑटोग्रॉफ़ लेना चाहते थे जैसे कि मैं कोई फ़ुटबॉल स्टार हूं, लेकिन उनमें से किसी के पास मेरी किसी किताब की प्रति नहीं थी.

क्या ऐसा इसलिए था कि मैं भारत में ज़्यादा जाना जाता हूँ? या फिर इसलिए कि जयपुर जैसा बड़ा लिट फ़ेस्ट ब़ड़े आकर्षक 'सितारों' को आकर्षित करता है और उनके दम पर ही फलता-फूलता है.

यानी इसमें आने वाले भी वास्तविक पाठकों के बजाय 'सितारों को चाहने वाले' होते हैं? जो लोग मेरा ऑटोग्राफ़ ले रहे थे उनमें से कई के लिए मुझे अफ़सोस हुआ. मुझे पूरा यकीन था कि वो मुझे कोई और ही समझ रहे हैं!

सितारों की चाह

उसके बाद से एशिया और यूरोप के कई दूसरे बड़े फ़ेस्टिवल में मैंने ऐसे या इससे मिलते-जुलते दृश्य देखे हैं. इन भड़कीले फ़ेस्टिवल में आने वाले ज़्यादातर लोग 'सितारों को चाहने वाले' लोग होते हैं.

इनमें कोई पाठक हो तो भी वो ऐसा पाठक होता है जो आँखों में चमक के साथ किसी लोकप्रिय लेखक को देखने की चाह लिए आया होता है.

एक ऐसा लेखक जिसकी किताब हर पान की दुकान में मिल रही हो और उसके विचार दर्जनों टैबलॉयड अख़बारों से बाहर झांक रहे हों.

एक कौतूहल होता है कि क्या ये लोग ऐसे लेखक को देखने-सुनने आते हैं जो वही बात सैकड़ों बार पहले भी कह चुका होता है?

बड़े लिट फ़ेस्ट के आयोजक भी ऐसे चलन को बढ़ावा देते हैं क्योंकि ऐसे आयोजन या तो बाज़ारू भीड़ को या फिर बनावटी उच्च वर्ग को ध्यान में रख कर किए जाते हैं.

उन्हें 'सितारों' की ज़रूरत होती है क्योंकि इससे भीड़ बढ़ती है या फिर इससे उन्हें ऐसे क़िस्से-कहानियाँ मिलती हैं जिन्हें अगली कॉकटेल पार्टी में सुनाया जा सके. बहुत संभावना है कि दोनों बातें एक ही साथ सच हो जाएँ.

साहित्यिक हित

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इस तरह लिट फ़ेस्ट से शायद ही कोई साहित्यिक हित पूरा होता हो.

आशावादी तरीक़े से सोचा जाए तो किसी लिट फ़ेस्ट का उपयोग पाठकों को ऐसे लेखकों से मिलाने के लिए किया जा सकता जो अन्यायपूर्ण ढंग से उपेक्षित किए गए हों, या समर्पित लेखकों और समर्पित पाठकों को आपस में मिलाने के लिए.

जो लिट फ़ेस्ट जितना बड़ा होता है उसके किसी गंभीर प्रभाव डालने की संभावना भी उतनी ही कम होती है.

इनका असर दुखद रूप से केवल उन लेखकों के करियर पर पड़ता है जो मानते हैं कि सामाजिक आभा से साहित्यिक प्रयासों की भरपाई की जा सकती है, शक्तिशाली सामाजिक नेटवर्क के सहारे अपनी किताब की कमियों को ढका जा सकता है.

और आख़िरकार ऐसे समारोहों में लेखकीय जीवन से जुड़े दूसरे अन्य लोग जैसे प्रकाशक, एजेंट, पत्रकार, साहित्यिक संरक्षक इत्यादि हावी हो जाते हैं.

अच्छी यादें

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मेरे पास साहित्यिक समारोहों से जुड़ी कई अच्छी यादें भी हैं, लेकिन वे सब छोटे या ग़ैर-परंपरागत समारोहों से जुड़ी हैं.

इनका छोटा होना ही शायद अच्छी यादों का सबब बना क्योंकि ऐसा समारोह सितारों और संभ्रांत लोगों की चूहा दौड़ में शामिल नहीं होते. लेकिन क्या केवल किसी फ़ेस्टिवल के आयोजकों को दोष देना उचित है?

ऐसा लगता है कि कई बड़े लेखक भी चाहते हैं कि उनके संग लेखक नहीं बल्कि सितारों जैसा बरताव किया जाए. जैसे, हाल ही में ख़बर आई थी कि नोबेल पुरस्कार विजेता लेखक वीएस नायपॉल बाली में होने वाले प्यारे और छोटे से उबुद लिटररी फ़ेस्टिवल में हिस्सा नहीं लेंगे.

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कहा जा रहा है कि ऐन 'आख़िरी वक़्त में' नायपॉल ने आयोजकों से फ़ेस्टिवल में आने के लिए 20 हज़ार डॉलर (क़रीब 12,37,500 रुपये) की फ़ीस माँगी थी. जैसा कि आयोजकों ने बताया है कि इसमें उनके कुल लागत का बीस फ़ीसदी हिस्सा ख़र्च हो जाता.

बड़ा क़दम

ऐसा बहुत कम होता है कि कोई आयोजक ऐसा बड़ा क़दम उठाए. बड़े फ़ेस्टिवल मुख्य तौर पर 'सितारा' लेखकों, अच्छे या बुरे, पर निर्भर होते हैं, जिनका उपयोग अच्छे लेकिन कम दिखने वाले लेखकों को मौक़ा देने के लिए किया जाता है.

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Image caption वीएस नायपॉल नोबेल पुरस्कार लेते हुए

तो क्या इसका ये मतलब है कि लिट फ़ेस्ट, ख़ासकर बड़े बाज़ार के अनुकूल होने या सामाजिक दिखावा बनने के लिए अभिशप्त हैं, जिनमें संपन्न तबके के लोग आपस में जाम टकराते हैं, महत्वाकांक्षी लोगों के पास दुम हो तो वे अपनी दुम हिलाते हैं और श्रोता सितारों की अदाओं और प्रलापों की चाशनी में नहाते हैं.

ऐसे माहौल में असल साहित्यिक उद्देश्य या पाठक और लेखक के बीच के गहरे संबंध सबसे दूर की कौड़ी बन जाते हैं.

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