'मेरी बेटी घर में ही रहे तो बेहतर'

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उसके पिता दो मई 2005 की वो रात कभी नहीं भूलेंगे जब उनकी 13 साल की बेटी खून से लथपथ, अधमरी हालत में एक अजनबी के साथ घर आई थी.

रोज़ की तरह उस दिन भी वह अपने छोटे भाई के साथ काम करके घर लौट रही थी, लेकिन उस दिन जो हुआ उसकी यादें न वो अपने ज़ेहन से मिटा पाई है न ही उसका परिवार.

'आशियाना रेप केस' के नाम से चर्चित इस मामले में पुलिस ने कुल छह लड़कों को गिरफ़्तार किया. कोर्ट ने दो लड़कों को 10 साल की सज़ा सुनाई, दो लड़के एक दुर्घटना में मारे जा चुके हैं और दो अन्य जो उस वक्त 18 साल से कम थे, नाबालिग होने की दलील पर ज़मानत पर रिहा हो चुके हैं.

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गुमसुम सी रहने वाली वो लड़की आज 23 साल की हो गई है और एक सामान्य जीवन जीने की चाह रखती है, लेकिन तमाम कोशिशों के बावजूद वह अपने साथ हुए इस हादसे को भूल नहीं पा रही है.

उसकी और उसके पिता की लड़ाई अब इन दो अभियुक्तों को सज़ा दिलाने की है.

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उसके पिता कहते हैं, "किसी तरह से मेरी बेटी ज़िंदा घर तो पहुंच गई, लेकिन उस दिन से लेकर आज तक हमारी ज़िंदगी पुलिस स्टेशन और कोर्ट तक सिमटकर रह गई है."

मार्च 2014 से लेकर अभी तक कोर्ट की तारीख़ 31 बार निकल चुकी है, और हर बार ज़ाहिरा के बूढ़े पिता शहर के एक छोर से दूसरे छोर तक सिर्फ़ दूसरी तारीख़ लेने आते हैं.

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वह कहते हैं, "एक बार आने-जाने में लगभग 200 रुपये लग जाते हैं, और महीने में दो बार तो तारीख पड़ ही जाती है, सवेरे करीब 11 बजे आकर बैठ जाता हूं और शाम को चला जाता हूं.''

लड़ाई का हौसला

लेकिन उसके पिता कहते हैं कि इस लड़ाई को जारी रखने के हौसले के लिए अभियुक्तों की तरफ एक नज़र ही काफी है.

"रिहा हुए अभियुक्त में से एक की शादी हो गई है. वह खुशहाल है, उसे एक बच्चा भी है और यहाँ हमारा घर बर्बाद हो गया. मेरी बेटी को लोग 'आशियाना वाली लड़की' के नाम से जानते हैं. चाहे जितने दिन लग जाएं, मैं कोर्ट के चक्कर लगाता रहूंगा."

उसके पिता पिछले कई साल से अपने घर असम भी नहीं गए हैं, जहां से करीब 25 साल पहले वह काम की तलाश में लखनऊ आए थे.

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वह कहते हैं, "कोर्ट की तारीख़ हर 15 दिन में पड़ती है, ऐसे में कैसे जाऊं? और जाकर क्या कहूं, लोग जानना चाहते हैं कि मैं अपनी बेटी की शादी क्यों नहीं कर रहा है. अब मैं उन्हें क्या बताऊँ कि मेरा परिवार इस पराई धरती पर क्या झेल रहा है."

बार-बार सवाल

उसके पिता ने शुरुआती दिनों में कूड़ा उठाने का काम किया और फिर धीरे-धीरे अपना छोटा सा रद्दी का कारोबार शुरू कर दिया.

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छह भाई-बहनों में वो दूसरी हैं और एक ग़ैर सरकारी संगठन की मदद से ओपन स्कूल से दसवीं की परीक्षा दे रही हैं. वह बार-बार यह सवाल पूछती हैं कि दिल्ली गैंग रेप पीड़िता की तरह उसे भी जल्दी इंसाफ़ क्यों नहीं मिला.

शायद यही वजह है कि वह पढ़-लिखकर जज बनने की इच्छा रखती है, लेकिन उनके पिता चाहते हैं कि वह कम से कम घर से बाहर निकले तथा अभियुक्तों को सजा होने के बाद उसकी शादी हो जाए.

लेकिन उनके मन में बैठे खौफ़ को शायद यह सजा भी न मिटा पाए, शायद यही वजह है कि वह अपनी दूसरी बेटी को नहीं पढ़ाना चाहते हैं न ही कोई काम करवाना चाहते हैं.

वह कहते हैं, "मैंने एक लड़की को घर से बाहर काम करवा के देख लिया. अब मैं चाहता हूँ मेरी दूसरी बेटी शादी होने तक घर में ही रहे."

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