भोपाल: कब तक चलेगी मुआवज़े की लड़ाई?

लक्ष्मी ठाकुर

मध्य प्रदेश के भोपाल स्थित यूनियन कार्बाइड के कारखाने में दो दिसंबर 1984 की रात ज़हरीली गैस मिथाइल आइसोसायनेट (एमआईसी) का रिसाव हुआ था.

उस रात लक्ष्मी ठाकुर अपने बच्चे को सुला रही थीं. अचानक उनकी आंखों में जलन शुरू हो गई. पहले तो उन्हें लगा कि किसी पड़ोसी ने मिर्च का तड़का लगाया है. लेकिन जब वो बाहर गईं तो देखा कि लोग बेतहाशा भाग रहे हैं.

उन्हें किसी ने बताया कि यूनियन कार्बाइड इंडिया के कारखाने में हादसा हो गया है. यह कारखाना उनके घर के पीछे ही है. आंखों में जलन कारखाने से निकली ज़हरीली गैस की वजह से हो रही थी.

लक्ष्मी अपने परिवार को लेकर कारखाने के बस स्टैंड की ओर भागीं. लेकिन रास्ते में उनके एक बेटे को उल्टियां होने लगीं और दूसरे को डायरिया हो गया. उनकी 20 साल की बेटी अगली सुबह देखने के लिए ज़िंदा नहीं रही.

हादसे की रात

मिथाइल आइसोसायनेट के रिसाव से क़रीब पांच लाख लोग प्रभावित हुए. इनमें से कुछ हज़ार की मौत हो गई.

इमेज कॉपीरइट Raajkumar Keswani

आज 30 साल बाद भी लक्ष्मी को कई तरह की गंभीर बीमारियों का सामना करना पड़ रहा है.

अधिक मुआवज़े की मांग को लेकर लक्ष्मी ने सैकड़ों अन्य पीडितों के साथ नवंबर में दिल्ली में धरना दिया.

धरना देने वालों की मांग थी कि सरकार हादसे में मारे गए और घायल हुए लोगों के आंकड़ों की समीक्षा करे.

इमेज कॉपीरइट AFP
Image caption इस मामले के मुख्य आरोपी बारेन एंडरसन की इस साल सितंबर में निधन हो गया.

प्रदर्शनकारी घटना के समय यूनियन कार्बाइड इंडिया लिमिटेड (यूसीआईएल) की मालिक अमरीकी कंपनी यूनियन कार्बाइड कारपोरेशन (यूसीसी) और 2001 में यूसीसी का अधिग्रहण करने वाली डाउ केमिकल्स से मुआवज़े की मांग कर रहे थे.

मुआवजे का मामला

केंद्रीय रसायन और उर्वरक मंत्री अनंत कुमार ने 14 नवंबर को आंकड़ों की समीक्षा का वादा किया. उन्होंने कहा कि जिन पीड़ितों को मुआवज़ा नहीं मिला है, उन्हें मुआवज़ा मिलेगा.

इमेज कॉपीरइट EPA

अब तक मुआवज़ा न मिलने का एक प्रमुख कारण मृतकों और प्रभावित लोगों का सही आंकड़े का न होना है.

दूसरा सवाल यह है कि डाउ और यूनियन कार्बाइड से अधिक मुआवज़े की मांग क्या टिक पाएगी?

मुआवज़े की मांग और पर्यावरण प्रदूषण को दूर करने की मांग को लेकर भारत और अमरीका में शुरू हुए कई मामलों में सफलता नहीं मिली.

डाउ का कहना है कि वह हादसे में शामिल नहीं है. उसने घटना के 17 साल बाद यूसीसी का अधिग्रहण किया.

डाउ केमिकल्स की ज़िम्मेदारी

बार्विक विश्वविद्यालय में क़ानून के प्रोफ़ेसर डॉक्टर उपेंद्र बक्शी कहते हैं, ''क़ानून की भाषा में कहें तो इस मामले को उस देश की सर्वोच्च अदालत में सुलझाया गया. ऐसे में यूनियन कार्बाइड या उसके उत्तराधिकारियों पर कोई जवाबदेही नहीं बनती है.''

इमेज कॉपीरइट VAIBHAV DEWAN

यूसीसी के तत्कालीन मुख्यकार्यकारी अधिकारी वारेन एंडरसन की इस साल सितंबर में 92 साल की आयु में मौत हो गई. वो भारत में घोषित भगोड़े थे. उन्होंने भारत में कभी मुक़दमे का सामना नहीं किया.

कृष्णा बाई के बेटों के आंखों की रोशनी गैस की वजह से चली गई और बाद में उनकी मौत हो गई. उन्हें मुआवज़े के रूप में केवल 35 हजार रुपए मिले. वो कहती हैं,'' तीस साल बाद भी मैं सिरदर्द से परेशान हूं. न मैं ठीक से देख पाती हूं और न चल पाती हूं. मुआवज़े में मिला पैसा बहुत पहले ही ख़र्च हो गया. हम अंत तक लड़ेंगे.''

मुआवजे की रफ़्तार

1-भोपाल स्थित यूनियन कार्बाइड के कारखाने से दो दिसंबर 1984 की रात करीब 40 टन मिथाइल आइसोसायनेट का रिसाव हुआ. क़रीब पांच लाख लोग इसके संपर्क में आए. तीन दिन में आठ हजार लोग मारे गए. बाद के महीनों में भी हज़ारों और लोगों की मौत हुई.

इमेज कॉपीरइट Raajkumar Keswani

2-यूनियन कार्बाइड कारपोरेशन (यूसीसी) और यूनियन कार्बाइड इंडिया लिमिटेड (यूसीआईएल) सुप्रीम कोर्ट में 1989 में 47 करोड़ डॉलर के मुआवज़े पर सहमत हो गए थे. जबकि पीड़ितों के वकील और सरकार ने 3.3 अरब डॉलर की मांग की थी.

3-इसके ख़िलाफ़ पीड़ितों ने अपील की लेकिन अदालत ने 1991 में इस समझौते को बरक़रार रखा. अदालत ने यूसीसी और यूसीआईएल को पीड़ितों के लिए अस्पताल को एक करोड़ 70 लाख डॉलर देने को कहा.

4-मुआवज़े का वितरण करने वाले भोपाल वेलफेयर कमीशन ने कहा था कि 2006 तक 5295 मृतकों और पांच लाख 27 हज़ार घायलों को मुआवज़ा दिया जा चुका है.

5-इस हादसे के जुर्म में यूसीआईएल के पूर्व कार्यकारी अधिकारी को दो साल की जेल और मामूली जुर्माना लगाया गया. लोगों ने इसका विरोध किया. इसके बाद सरकार ने जून 2010 में मुआवज़े की समीक्षा की.

इमेज कॉपीरइट Raajkumar Singh

6-भारत के महान्यायवादी ने 2010 में सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर कर मुआवज़े को बढ़ाकर एक अरब दस करोड़ डॉलर करने की मांग की. उन्होंने कहा कि दिया गया मुआवज़ा ग़लत आंकड़ों पर आधारित था, उसमें पर्यावरण प्रदूषण ठीक करने पर आया खर्च शामिल नहीं था. इस याचिका में 5295 मौतों, स्थायी विकलांगता के 4902 और गंभीर रूप से घायल 42 लोगों का आंकड़ा दिया गया था.

7-सरकार ने 2012 से गंभीर रूप से पीड़ितों को अतिरिक्त मुआवज़ा देना शुरू किया. ऐसे क़रीब 33 हज़ार लोगों को एक लाख रुपए प्रति व्यक्ति की दर से मुआवज़ा मिला.

8-भोपाल के पीड़ितों की लड़ाई लड़ रहे लोगों का कहना है कि सरकार की याचिका में पीड़ितों की संख्या कम बताई गई है और बहुत से जरूरतमंदों को मुआवज़ा नहीं मिला है.

9-सरकार ने मौतों और घायलों के आंकड़ों की समीक्षा का वादा किया है.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार