'हम दल साथ-साथ हैं', लेकिन कब तक?

नीतीश-शिवपाल

समाजवादी विचारधारा से जुड़े दलों के विलय की गाड़ी शायद अभी तीसरे गियर में भी नहीं पहुंची कि सवाल शुरू हो गए हैं कि वो कितनी दूर तक चल पाएगी?

सवालों का ये दौर बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की प्रेस कांफ्रेस में ही शुरू हो गया था.

नीतीश कुमार ने ये जानकारी दी कि छह राजनीतक दलों की बैठक में फैसला हुआ है कि मुलायम सिंह यादव सभी से बातचीत कर पार्टियों के साथ आने की प्रक्रिया की रूपरेखा तैयार करेंगे.

नीतीश से पूछा गया कि क्या समाजवादी विचारधारा के ये दल भारतीय जनता पार्टी या नरेंद्र मोदी के डर से साथ आ रहे हैं? पार्टी का नेता कौन होगा? नाम क्या होगा नए दल का?

‘बीजेपी के लिए चुनौती हो सकती है’

ये दल पहले भी कई दफ़ा साथ आ चुके हैं लेकिन असहमतियां इतनी अधिक रहीं कि ज़्यादा दूर साथ चल नहीं पाए.

राजनीतिक विश्लेषक नीरजा चौधरी कहती हैं कि सैद्धांतिक रूप से इन दलों का साथ आना विपक्ष को मज़बूत करेगा क्योंकि बीजेपी को लोकसभा चुनावों में मात्र 31 प्रतिशत वोट मिले थे यानी बाक़ी के 69 फ़ीसदी मत उसके विरोध में थे.

इन दलों के अलग-अलग होने की वजह से बीजेपी को बड़ी तादाद में सीटें हासिल हुईं.

नीतीश कुमार ने संकेत दिए कि जो छह दल बैठक में शामिल हुए उनके अलावा दूसरे क्षेत्रीय दल भी इस फ्रंट का हिस्सा हो सकते हैं.

इमेज कॉपीरइट PTI

हालांकि वो ये साफ नहीं कर पाए कि वो नए दल का हिस्सा होंगे या फिर सब मिलकर किसी तरह का कोई फ्रंट तैयार करेंगे.

जो दल बैठक में शामिल हुए उनमें समाजवादी पार्टी, जनता दल यूनाइटेड के अलावा इंडियन नेशनल लोकदल, राष्ट्रीय जनता दल, जनता दल सेक्यूलर और समाजवादी जनता पार्टी के नेता शामिल थे.

झारखंड चुनाव में अलग अलग क्यों?

कुछ लोग ये भी सवाल कर रहे हैं कि अगर दूसरे दल भी समाजवादियों के इस गठजोड़ में साथ आना चाहते हैं तो फिर झारखंड के चुनाव में ये दल साथ मिलकर क्यों नहीं लड़ रहे?

बिहार में लोकसभा चुनावों के बाद हुए उपचुनावों में लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार साथ आए थे जिसका नुक़सान बीजेपी को उठाना पड़ा.

यहीं पर सवाल ये भी उठता है कि क्या कभी उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव और बहुजन समाज पार्टी की मायावती साथ-साथ आ सकते हैं?

Image caption बिहार उपचुनावों में नीतीश और लालू का गठजोड़ बीजेपी को नुक़्सान पहुँचा चुका है.

राजनीतिक विश्लेषक उर्मिलेश कहते हैं कि इस सच को सभी मान चुके हैं कि सिर्फ़ कोई चमत्कार ही यूपी में मुलायम और माया को साथ ला सकता है!

जो दल साथ आने की कोशिश में हैं उनमें से कई के पास तो संसद में कोई सीट ही नहीं लेकिन सभी की सीटें मिला दी जाएं तो ये लोकसभा में 15 के आंकड़े को पहुंचती है.

आम चुनावों में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बेजपी ने इन सभी दलों को उनके गढ़ कहे जाने वाले इलाक़ों में बुरी तरह पछाड़ा था.

मोदी के ख़िलाफ़ कौन?

नीरजा चौधरी कहती हैं कि 2014 में बीजेपी की जीत को भ्रष्टाचार के ख़िलाफ लोगों के ग़ुस्से के साथ-साथ नरेंद्र मोदी के शक्तिशाली नेतृत्व की जीत भी थी.

लेकिन इस नए दल में मोदी के ख़िलाफ़ वो किस नेता को पेश करेंगे?

कांग्रेस नेतृत्व वाली मनमोहन सिंह सरकार के दौर में रुके फ़ैसलों और भ्रष्टाचार के सवाल को मनमोहन सिंह गठबंधन की राजनीति की मजबूरी कहते रहे.

लोग क्या उस बात को इतनी जल्दी भूल जाएंगे?

एक सवाल ये भी है कि बदले भारत में नए दल के पास वोटर को ऑफर करने के लिए कौन सी योजना होगी जिससे वो मोदी की बीजेपी के विकल्प के तौर पर पेश करेंगे.

इमेज कॉपीरइट EPA

इन सबसे परे सवाल और भी हैं जैसे मुलायम पिछले दिनों अपनी राजनीतिक ज़मीन बिहार में पसारना चाहते हैं क्या लालू-नीतीश उसे पसंद करेंगे?

एक फर्क़ है इस बार

सपा में जिस तरह का परिवारवाद है उसका क्या होगा? साथ ही इस प्रस्तावित फ़्रंट के अहम नेता लालू प्रसाद यादव भ्रष्टाचार के मुद्दे पर जेल जा चुके हैं और कई के ख़िलाफ़ इस तरह के मामले चल रहे हैं.

तो क्या ये सब जनता को मान्य होंगे या फिर ये लोग अगर बीजेपी पर आरोप लगते हैं तो उन्हें किस तरह उठा पाएंगे?

समाजवादी विचारधारा के दलों के हालांकि इस बार साथ आने में एक बात भिन्न है.

पहले जब आपातकाल के बाद तैयार हुई थी तो उस समय जनसंघ पार्टी (जो बाद में बीजेपी बनी) इसका हिस्सा थी.

साल 1987 में भी वीपी सिंह के नेतृत्व में बनी सरकार को बीजेपी का समर्थन हासिल था.

तब ये गठबंधन कांग्रेस के ख़िलाफ़ तैयार हुए थे. अब बीजेपी उनकी मुख्य राजनीतिक प्रतिद्वंदी है.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार