गुरदासपुर: आँखों से निकल रहा था मवाद

नेत्र शिविर में ऑपरेशन करवाने वालों की आॉखों से निकला पस

''उनकी आंखें मवाद से भरी थीं, कॉर्निया गल चुका था, पस का बाहर आना शुरू हो गया था. उनकी आंखों के बचने की कोई गुंजाइश नहीं थी.''

आंखों का ऑपरेशन करने वाले मशहूर डॉक्टर दलजीत सिंह की इन बातों ने मेरे बदन में हल्की सिहरन पैदा कर दी.

पद्मश्री दलजीत सिंह ने मुझसे चंद दिनों पहले आए दो मरीज़ों का हाल कुछ इन्हीं शब्दों में बयां किया.

दोनों ने दलजीत सिंह से कहा था कि उनका ऑपरेशन भी गुरदासपुर के उसी कैंप में हुआ था, जहां मोतियाबिंद के ऑपरेशन के बाद 19 लोगों की आंखों की रोशनी चली गई.

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उन्होंने कहा कि ज़्यादा दिक़्क़त होने पर सर्जरी करके पस निकालना पड़ सकता है. लेकिन उन्हें नहीं लगता कि इन दोनों मामलों में ऐसा करना पड़ेगा.

'जटिल तकनीक'

दलजीत सिंह कहते हैं कि मोतियाबिंद के ऑपरेशन का नया तरीक़ा, इंट्रा ओकुलर सर्जरी, जिसमें आंख में लेंस डालते हैं, वह पुरानी तकनीकी के मुक़ाबले जटिल है.

इस तरीके में झिल्ली की बहुत हिफ़ाज़त करनी पड़ती है. ये झिल्ली 5 माइक्रोन पतली होती है. यानि एक मिलीमीटर के 200वें हिस्से जितना पतला लेंस इसमें डाला जाता है.

शायद यही वजह है कि नए तरह के ऑपरेशन में ख़ास उपकरणों से सुसज्जित ख़ास किस्म के ऑपरेशन थिएटर की ज़रूरत होती है.

डॉक्टर दलजीत सिंह इंट्रा ओकुलर सर्जरी की भारत में शुरूआत करने वाले सर्जनों में से एक हैं और उन्होंने पूर्व राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह की आंखों का भी ऑपरेशन किया था.

स्पेशल थिएटर नहीं

गुरदासपुर के ऑपरेशन के बारे में कुछ जगहों पर कहा गया है कि ऑपरेशन विशेष थिएटर में नहीं हुआ, हालांकि इस पर प्रशासन का कोई बयान नहीं आया है.

दलजीत सिंह कहते हैं कि नए तरह की सर्जरी बेहद जटिल और नाज़ुक है, इसलिए सर्जन पर बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी होती है.

पुरानी पद्धति में लेंस नहीं लगता था, सिर्फ़ चीरा लगाकर मोतिया निकाल देते थे. फिर टांके लगते थे मगर इसमें मोटे चश्मे की ज़रूरत होती थी.

डॉक्टर दलजीत बताते हैं कि 1980 से पहले तक भारत में सर्जन इसी तरह ऑपरेशन करते थे. जिसमें सर्जरी के सामानों को बार-बार स्टरलाइज़ करके इस्तेमाल किया जाता था.

मगर ऑपरेशन के दौरान आंखो में किसी तरह की दवाई या किसी भी क़िस्म के द्रव्य का इस्तेमाल नहीं होता था.

अब सर्जरी के दौरान भी आंखों में दवाई पड़ती रहती है. अगर किसी वजह से दवा की क्वालिटी में हल्की सी भी ख़ामी होगी तो वो इंफेक्शन पैदा कर सकती है.

यह ख़तरा पहले से इंफेक्शन होने पर भी हो सकता है. वह इंफेक्शन द्रव्य के साथ भीतर चला जाता है.

'देखभाल'

पोस्ट ऑपरेशनल केयर यानि ऑपरेशन के बाद की देखभाल एक दूसरा मसला है. कई बार कैंप लगाने वाली संस्थाएं इसका पूरा इंतज़ाम नहीं करतीं.

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अक्सर देखा गया है कि बहुत पिछड़े इलाक़े और ख़ास क़िस्म के आर्थिक तबक़े से आए मरीज़ ऑपरेशन के बाद की देखभाल की तरफ़ ध्यान नहीं दे पाते. जैसे कि मिट्टी धूल, धुंए से आंखों को बचाना, गंदे हाथों से न छूना, साफ़ पानी का ही इस्तेमाल वग़ैरह.

डॉक्टर दलजीत सिंह के अनुसार भारत में हर साल मोतियाबिंद के 40 लाख ऑपरेशन होते हैं.

वह कहते हैं कि हालांकि स्वंयसेवी संस्थाएं ऑपरेशन का इंतज़ाम तो करवाती हैं लेकिन ये कहना मुश्किल है कि अगर सर्जरी के दौरान कोई परेशानी खड़ी हो जाती है तो उससे निबटने का पूरा इंतज़ाम उनके पास होता है या नहीं.

राज्य सरकार ने सभी बातों की जांच के लिए एक समिति गठित की है उसकी रिपोर्ट एक या दो दिनों में आ जाने की उम्मीद है लेकिन यह नहीं मालूम कि सच कभी सामने आएगा भी या इस जांच समिति की रिपोर्ट का भी अंजाम पहले जैसी समितियों जैसा होगा.

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