लेस्बियन शृंखलाः 'मैंने देश क्यों छोड़ा?'

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भारत में लेस्बियन, गे, बाइसेक्सुअल, ट्रांसजेंडर, क्वीयर होने के क्या मायने हैं? क्या हमारा समाज लैंगिक झुकाव की आज़ादी देता है?

इन्हीं सवालों की पड़ताल कर रही है बीबीसी की विशेष शृंखला.

पहली कड़ी में अमरीका के न्यूयॉर्क में बस चुकी आफ़िहा कुमार बता रही हैं दोनों देशों के रवैए के बीच के फ़र्क को. जबकि उनका व्यक्तिव, उनकी पसंद और लैंगिक प्राथमिकताएँ वही की वही हैं.

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बहुत से लोगों को लगता है कि मेरा अमरीका आने का फ़ैसला 'अमरीकी सपने' को पाने के इरादे से किया गया था.

लेकिन सच तो यह है कि भारत में मेरे लिए ऐसी जगह मिलनी मुश्किल थी जहाँ मैं जो हूँ वही बने रहकर बिना किसी ग्लानि के सुरक्षित रूप से रह सकूँ. इसलिए मुझे भारत छोड़ना ही पड़ा.

मैं ऐसी जगह जीना चाहती थी जहाँ मैं इस बात की चिंता किए बग़ैर शांति से जी सकूँ कि मुझे मेरे एक्टिविज़्म के कारण नौकरी पर रखा या निकाल दिया जाएगा. जहाँ मेरे चरित्र पर फ़ैसला सुनाए जाने और जिसे मैं बहुत पसंद करती हूँ उसके द्वारा नकारे जाने के भय के बिना किसी के साथ डेटिंग कर सकूँ.

समान अधिकार

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एक ऐसी जगह जहाँ मेरे किसी एलजीबीटी(लेस्बियन,गे, बाइसेक्सुअल, ट्रांसजेंडर) दिखने वाले और खुले तौर पर वैसे ही रहने वाले शख़्स को पसंद करने की बात मेरे जोड़ीदार को नागवार न गुज़रे. मैं अपना देश स्थायित्व और सुरक्षा की चाहत की वजह से छोड़ा.

आज मैं पीछे मुड़कर देखती हूँ तो सोचती हूँ कि मेरे समाज और संस्कृति ने मुझे पूरी तरह स्वीकार न करके मुझे कितना पीछे कर दिया.

मुझे अपनी जगह तलाशने, बसने और धीरे-धीरे अपने रहने लायक वातावरण तैयार करने में क़रीब एक साल लगा. आख़िरकार मैं ऐसी जगह हूँ जहाँ मैं सुरक्षित महसूस करती हूँ.

अमरीका की रूढ़ियाँ

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इन सबके बावजूद, मैं यह बताना चाहूँगी कि अमरीका में बाइसेक्सुअल भारतीय महिला को लेकर कुछ अलग ही तरह की रूढ़ियाँ और समस्याएँ हैं.

मेरे संग एक और चिप्पी जुड़ी हुई थी कि मेरा रंग 'गोरा' नहीं है. यहाँ इसे बढ़िया माना जाता है. मैं ऐसे समाज में पली-बढ़ी हूँ जहाँ माना जाता है कि 'गोरा ही सुंदर' है.

अब मैं अपने सांवलेपन की सुंदरता को महसूस करके ख़ुश हूँ और इससे मुझे काफ़ी ताक़त मिलती है.

यहाँ बिल्कुल ही अलग संस्कृति में हर रंग और जेंडर के एलजीबीटीक्यू कार्यकर्ता और आप्रवासी अपनी पहचान को अपने माता-पिता की तुलना में ज़्यादा सहजता से स्वीकार करते हैं. ऐसे लोग सफलता पाने के लिए कड़ी मेहनत करते हैं.

मुद्दों पर बातचीत

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समाज में अदृश्य होकर रहने, संवेदनशील बनने, दूसरों को संवेदनशील बनाने, काम पर जाने, परिवार का सहयोग या अभाव, भेदभाव जैसे मुद्दों पर क्वीयर समुदाय के अंदर बहुत सावधानी के साथ चुनिंदा स्थानों पर चर्चा होती है.

कुल मिलाकर मैं अपने मु्द्दों के लिए खड़ा होना सीख रही हूँ. हमारे निजी मतभेदों और अहंकारों के बावजूद एक समुदाय के रूप में साथ आने के लिए माफ़ करने की ताक़त को महसूस कर रही हूँ.

मेरे दफ़्तर में थोड़ा बदलाव दिखता है. यहाँ एक महिला के तौर पर आपको कम भेदभाव का सामना करना पड़ता है. यहाँ के पुरुषों में श्रेष्ठता ग्रंथि और लिंगभेद कम है.

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जब मैं दिन की शुरुआत करते हुए कार में तेज़ रफ़्तार में अपने प्यारे दफ़्तर जाते वक़्त एक अंधेरी सुरंग से गुज़रती हूँ तो मुझे याद आता है कि भले हमारा आर्थिक स्तर, सामाजिक स्तर, लैंगिक प्राथमिकताएँ, सांस्कृतिक पहचान अलग-अलग हो, हम सब एक बेहतर और सुरक्षित जीवन की चाहत रखते हैं, जहाँ हम सहजता से जी सकें और अपनी क्षमताओं का पूरा उपयोग कर सकें.

और यह वो चीज़ है जिसके लिए मैं संघर्ष करती हूँ. यही मेरे जीवन का उद्देश्य है. यही...मेरा सपना है.

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