कांग्रेसी 'योजना' बनाम भाजपाई 'आयोग'

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Image caption भारत संघ के राज्यों के मुख्यमंत्री प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ.

रविवार को दिल्ली में हुई मुख्यमंत्रियों की बैठक में योजना आयोग को लेकर मचे घमासान और राजनीति का पटाक्षेप नहीं हुआ.

बल्कि लगता है कि इसे लेकर राजनीति का नया दौर शुरू होगा.

यह संस्था जवाहरलाल नेहरू ने शुरू ज़रूर की थी लेकिन इसके रूपांतरण की बुनियाद साल 1991 में बनी कांग्रेस सरकार ने ही डाली थी.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व्यक्ति और विचारक के रूप में नेहरूवादी विरोधी के रूप में उभरे हैं.

कांग्रेस का मोह

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उन्होंने इस साल लाल किले की प्राचीर से स्वतंत्रता दिवस के अपने पहले संदेश में योजना आयोग को समाप्त करने की घोषणा करके व्यवस्था-परिवर्तन के साथ-साथ प्रतीक रूप में अपने नेहरू विरोध को भी रेखांकित किया था.

लगता यह भी है कि कांग्रेस को इसके नाम से मोह है.

वह शायद चाहती है कि इसका काम बदल जाए, पर नाम न बदले. दूसरी ओर सारी कवायद नाम की लगती है. काम घूम-फिरकर फिर वैसा ही रहेगा.

प्रासंगिकता पर प्रश्न

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मोदी ने कहा था कि योजना आयोग अपनी प्रासंगिकता खो चुका है. उसकी जगह नई संस्था की ज़रूरत है.

यह सिर्फ संयोग नहीं था कि रविवार को बुलाई गई मुख्यमंत्रियों की बैठक में उन्होंने मनमोहन सिंह को खास तौर से उद्धृत किया.

आर्थिक उदारीकरण का श्रेय मनमोहन सिंह को जाता है, जिसे नेहरूवादी रास्ते से हटने की शुरुआत कहा जाता है.

नई संस्था

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लेकिन सरकार राज्यों के साथ विचार-विमर्श की प्रक्रिया को भी पूरा करना चाहती है.

पहले कहा जा रहा था कि नई संस्था का नाम 'व्यय आयोग' होगा. अब पता लगा है कि इसका नाम 'नीति आयोग' होगा.

पीएम मोदी की अध्यक्षता में आयोजित समूह के सामने योजना आयोग की ओर से भावी संस्था का ढांचा पेश किया गया है.

इसकी कार्यकारिणी में राज्यों के प्रतिनिधियों की संख्या बढ़ाने का सुझाव है.

राजनीतिक निहितार्थ

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मोदी सरकार के इस फैसले और उसके विरोध के राजनीतिक निहितार्थ हैं.

कांग्रेस का कहना है कि आयोग को ख़त्म करने की घोषणा करने के बाद सरकार अब मुख्यमंत्रियों के साथ विचार-विमर्श कर रही है.

कांग्रेस के आनंद शर्मा ने कहा, "विडंबना है कि पीएम ने योजना आयोग को भंग करने की घोषणा के चार महीने बाद संस्था के भविष्य पर चर्चा करने के लिए मुख्यमंत्रियों की बैठक बुलाई है."

बजट से संकेत

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अरुण जेटली के बजट का साफ संकेत था कि आयोग के पर कतरे जाएंगे.

योजनागत और गैर-योजनागत व्यय में अंतर यूपीए सरकार के वित्तमंत्री पी चिदंबरम ने अपने अंतरिम बजट में ही कर दिया था.

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उस बजट में तमाम केंद्र प्रायोजित योजनाओं को राज्य सरकारों को हस्तांतरित कर दिया गया था. राज्यों को धनराशि के आवंटन में योजना आयोग की भूमिका पहले से ही कम हो गई.

लेकिन आयोग के रूपांतरण की अवधारणा मोदी सरकार का आविष्कार नहीं है.

मनमोहन की सलाह

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योजनागत और गैर-योजनागत व्यय में अंतर को खत्म करने की सिफारिश रंगराजन समिति ने की थी.

इसका मतलब था योजना आयोग की भूमिका को बदलना. पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह बरसों से इसकी बात करते रहे थे.

उन्होंने अपने विदाई भाषण में भी लगातार खुल रही अर्थव्यवस्था में योजना आयोग की भूमिका की समीक्षा करने की सलाह दी थी.

भाजपा के चुनाव घोषणापत्र में भी आयोग के पुनर्गठन की बात थी.

प्लानिंग की भूमिका

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देश के सामने सबसे बड़ी चुनौती है संघीय ढाँचे में रहते हुए देश का आर्थिक रूपांतरण.

कई राज्य सरकारों और केंद्रीय मंत्रालयों का मानना है कि योजना आयोग की उपस्थिति उन्हें परेशान करती है.

आयोग खुद में संविधान से निर्मित संस्था नहीं है. साल 1950 में इसकी स्थापना कार्यकारिणी की फैसले से हुई थी.

योजना आयोग के न रहने का मतलब यह नहीं है कि नियोजन या प्लानिंग की भूमिका खत्म हो जाएगी.

संविधान सम्मत

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हमारे यहाँ संविधान सम्मत वित्त आयोग की व्यवस्था है.

वित्त आयोग संवैधानिक संस्था है लेकिन लंबे अरसे से योजना आयोग उसके मुकाबले ज्यादा प्रभावशाली संस्था रही है.

इस दोहराव का निपटारा भी होना चाहिए. इस महीने के अंत तक चौदहवें वित्त आयोग की रिपोर्ट भी आएगी.

वित्त आयोग के सुझाव एक अप्रैल 2015 से लागू होंगे और जो 31 मार्च 2020 तक लागू रहेंगे.

आयोग से नाखुश राज्य

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व्यावहारिक सच यह है कि देश के अनेक राज्य केंद्र से बेहतर काम करते रहे हैं. राजकोषीय घाटे को कम करने में उनका प्रदर्शन बेहतर रहा है.

बावजूद इसके नीति-निर्धारण और साधनों के आवंटन में वे मार खा जाते हैं. कुशल और अकुशल राज्य अक्सर एक ही पलड़े में तोल दिए जाते हैं.

राज्य सरकारें योजना आयोग से नाखुश रहती हैं. वे योजना आयोग को अपने काम में हस्तक्षेप का उपकरण मानती हैं.

इस व्यवस्था के हमेशा राजनीतिक निहितार्थ रहे. इससे जुड़े फैसले शुद्ध आर्थिक आधार पर नहीं होते, बल्कि राजनीतिक आधार पर होते रहे हैं.

कहना मुश्किल है कि अब जो व्यवस्था बनेगी वह राजनीति से मुक्त होगी या नहीं.

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