ओडिशाः चिट फ़ंड घोटाले से जुड़े 5 सवाल

तत्काल पैसा वापस की मांग पर विधानसभा के सामने प्रदर्शन करते हुए चिट फंड कंपनियों द्वारा ठगे गए निवेशक. इमेज कॉपीरइट VISHWARANJAN MISHRA
Image caption तत्काल पैसा वापस की मांग पर विधानसभा के सामने प्रदर्शन करते हुए चिट फंड कंपनियों द्वारा ठगे गए निवेशक.

ओडिशा में हज़ारों करोड़ के चिट फ़ंड घोटाले को लेकर नवीन पटनायक सरकार से दर्ज़नों सवाल पूछे जा रहे हैं.

बीबीसी हिंदी ने इन दर्ज़नों सवालों में से पांच खास सवालों की पड़ताल की है.

ये सवाल घोटाले के शिकार हुए लाखों लोगों के लिए शायद सबसे अधिक महत्व रखते हैं.

क्या कर रही थी सरकार?

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अब यह स्पष्ट हो चुका है कि सालों से राज्य में धड़ल्ले से चले रहे चिट फ़ंड कारोबार के बारे में नवीन सरकार पूरी तरह से वाकिफ़ थी.

फ़रवरी, 2011 में केंद्रीय वित्त मंत्रालय के इकॉनॉमिक इंटेलिजेंस ब्यूरो ने राज्य सरकार को 'सीशोर' चिट फ़ंड कंपनी की ग़ैर क़ानूनी कारोबार पर रोक लगाने की हिदायत दी थी.

लेकिन नवीन सरकार ने न केवल इस हिदायत को अनदेखा किया बल्कि इसके डेढ़ महीने बाद 'सीशोर' द्वारा शुरू किए गए टेलीविज़न चैनल के उद्घाटन उत्सव में खुद मुख्यमंत्री नवीन पटनायक शरीक हुए.

नतीजा यह हुआ कि 'सीशोर' ने लोगों से करीब 1500 करोड़ रुपये ऐंठ लिए.

'सीशोर' से समझौता क्यों?

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Image caption चार घंटे पूछताछ के बाद सीबीआई दफ्तर से बाहर निकलते हुए बीजद के वरिष्ठ नेता और बांकी के विधायक प्रभात त्रिपाठी.

केंद्र सरकार की चेतावनी के बावजूद 'सीशोर' के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने के बजाय नवीन पटनायक सरकार ने इस कंपनी के साथ कई समझौते किये.

प्रमुख पर्यटन स्थलों में स्थित सरकारी अतिथि भवनों को 'सीशोर' के हवाले किया, सात सरकारी अस्पतालों का प्रबंधन इस कंपनी को सौंप दिया और मक्का प्रस्संकरण और सौर ऊर्जा प्लांट लगाने के लिए समझौता किया.

और ये सारे समझौते केंद्र की चेतावनी के बाद किए गए.

सीबीआई जांच का विरोध क्यों?

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Image caption सीबीआई द्वारा पूछताछ के बाद मीडिया का सामना करते हुए बीजद के पूर्व 'मार्गदर्शक' प्यारीमोहन महापात्र.

जब सामाजिक कार्यकर्ता आलोक जेना ने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर की, तो सरकार ने सीबीआई जांच रोकने के लिए एड़ी चोटी एक कर दी.

इसके लिए गोपाल सुब्रमण्यम जैसा महंगा वकील नियुक्त किया और सरकारी खाते से एक करोड़ रुपये से अधिक खर्च कर डाला. आख़िर क्यों?

नेताओं से पूछताछ क्यों नहीं हुई?

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Image caption सीबीआई द्वारा गिरफ्तारी के बाद मयूरभंज के बीजद सांसद रामचन्द्र हांसदा

सुप्रीम कोर्ट में राज्य सरकार की दलील यह थी कि इस मामले में सीबीआई जांच की कोई ज़रुरत नहीं है क्योंकि राज्य पुलिस की क्राइम ब्रांच इसकी पूरी ईमानदारी से छानबीन कर रही है.

अगर यह दावा सही था तो क्राइम ब्रांच ने अपने डेढ़ साल की तहक़ीक़ात में सत्तारूढ़ बीजू जनता दाल (बीजद) के किसी एक भी नेता को गिरफ़्तार करना तो दूर, पूछताछ करना भी ज़रूरी क्यों नहीं समझा.

जबकि सीबीआई ने जांच शुरू करने के चंद महीनों के अंदर ही बीजद के एक सांसद, एक वरिष्ठ विधायक और एक पूर्व विधायक को गिरफ़्तार कर लिया?

निवेशकों को पैसा अभी तक क्यों लौटाया नहीं गया?

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Image caption चिट फंड घोटाले पर चर्चा की मांग पर विधानसभा के अंदर विरोधी दलों द्वारा प्रदर्शन.

घोटाले के सामने आने के बाद सरकार ने विधेयक पारित किया जिसके तहत चिट फ़ंड कंपनियों की संपत्तियां जब्त और नीलाम की जा सकती हैं.

साथ ही सरकार ने 300 करोड़ रुपयों के एक 'कोर्पस फ़ंड' की भी घोषणा भी की. लेकिन डेढ़ साल बाद अभी तक एक भी निवेशक को पैसा वापस नहीं मिला.

लगता है कि सरकार के पास इनमें से एक भी सवाल का संतोषजनक जवाब नहीं है.

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