इंसान को क्या सिर्फ़ दवा चाहिए?

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सर्जन और लेखक अतुल गवांडे का मानना है कि चिकित्सा विज्ञान को अब स्वास्थ्य और ज़िंदा रखने की जद्दोजहद से हटकर अपना ध्यान इंसान के सुख और कल्याण (वेल बीइंग) पर देना चाहिए.

उनका कहना है, ''मुझे लगता है कि हमने इंसान के अस्तित्व की देखभाल का सिस्टम बनाए रखना ही अपना काम समझ लिया है, मगर यह काम इससे कहीं बड़ा है. यह इंसान के सुख से जुड़ा है. यह सुख उन कारणों को बरक़रार रखना है जिनकी वजह से इंसान ज़िंदा रहना चाहता है.''

बीबीसी की रीथ लैक्चर्स श्रंखला 'द फ़्यूचर ऑफ़ मेडिसिन' की चौथी कड़ी में दिल्ली आए अतुल गवांडे ने यह बात कही. उनके इस भाषण का विषय था 'द आयडिया ऑफ़ वेल बीइंग'.

अतुल गवांडे इससे पहले बोस्टन, लंदन और एडिनबरा में तीन भाषण दे चुके हैं - 'व्हाय डू डॉक्टर्स फ़ेल?', 'द सेंचुरी ऑफ़ द सिस्टम' और 'द प्रॉब्लम ऑफ़ हब्रिस'.

यह भाषण श्रंखला चिकित्सा विज्ञान में कामयाबी और नाकामी की पड़ताल करती है.

सिस्टम

अतुल गवांडे का कहना था, ''हर जगह मैं देखता हूं कि लोगों की एक दिन और जीने के अलावा भी दूसरी प्राथमिकताएं हैं. बेहद गंभीर बीमारी में भी वो दूसरे लोगों से जुड़े रहना चाहते हैं, उनका साथ चाहते हैं.''

उन्होंने कहा, ''इंसान के अस्तित्व की ज़रूरतों के मुताबिक़ सिस्टम खड़ा करना एक बड़ा काम है और यह कोई जादू की तरह नहीं हो सकता. मगर मुझे लगता है कि इसके लिए हमारे सामने एक रास्ता तैयार है. यह रास्ता है सिस्टम की कामयाबी और नाकामी का पता लगाने में अपनी ताक़त ख़र्च करना, उसी तरह जैसे हमने हमारे शरीर के ढांचे का विज्ञान समझने के लिए मेहनत की है.''

अतुल गवांडे को टाइम मैग्ज़ीन ने 2010 में दुनिया के कुछ सबसे प्रभावशाली चिंतकों में शुमार किया था.

सिर्फ़ लंबी उम्र नहीं

अतुल कहते हैं, "जितना मुमकिन हो डॉक्टरों की कोशिश ये होनी चाहिए कि वो लोगों की क्षमता को बचा सकें ताकि वो ज़िंदगी में सबसे अहम कामों को अंजाम दे सकें."

उन्होंने अपने पिता के जीवन के आखिरी क्षणों की कहानी के ज़रिए उन प्राथमिकताओं की बात कही. अतुल के मुताबिक़ ये प्राथमिकताएं महज़ लंबी उम्र तक जीने से ज़्यादा जटिल होती हैं.

डॉक्टर अतुल गवांडे ने सरकारी और ग़ैरसरकारी सेक्टर में स्वास्थ्य व्यवस्था, भारतीय अस्पतालों में सफ़ाई और दूसरी समस्याओं का भी विस्तार से ज़िक्र किया.

उन्होंने बताया कि पहले बुज़ुर्गों की देखभाल न करना और उनकी अनदेखी अमरीका में बड़ी समस्या थी पर अब भारत और दूसरे एशियाई देशों में भी बुज़ुर्गों की हालत दयनीय हो चुकी है.

उन्होंने दिल्ली के एक वृद्धाश्रम के दौरे के बारे में बताया जहां उनकी मुलाक़ात दिल की मरीज़ 82 साल की बुज़ुर्ग महिला से हुई.

अतुल गवांडे ने बताया कि महिला वृद्धाश्रम को अब अपना घर कहती हैं, जिसने उन्हें जीने का मक़सद दिया है और यह वह उदाहरण है जिसे वह 'वेल बीइंग' कहते हैं.

बीबीसी रीथ लैक्चर्स श्रंखला की शुरुआत 1948 में हुई थी. पहला रीथ लैक्चर दार्शनिक बर्टैंड रसेल ने दिया था. रीथ लैक्चर्स की अध्यक्षता स्यू लॉले ने की.

डॉक्टर अतुल गवांडे का ताज़ा लेक्चर बीबीसी रेडियो 4 पर यहां सुना जा सकेगा.

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