समलैंगिक हूं.. आईने से भी कहते डरती हूं

  • 12 दिसंबर 2014
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माया शंकर समलैंगिक महिलाओं के लिए काम करने वाले एक सपोर्ट ग्रुप 'संगिनी' के लिए काम करती हैं.

साल 2000 में जब वो भारत आईं तो उन्हें इस बात का अहसास हुआ कि यहां एक समलैंगिक के तौर पर ज़िंदगी जीना कितना अकेला और डरावना अनुभव हो सकता है.

पढ़िए, माया के अनुभव उन्हीं की ज़ुबानी

मैं भारतीय मूल की हूं, लेकिन मेरा जन्म ऑस्ट्रिया में हुआ. होश संभालने पर मुझे अहसास हुआ कि मैं स्त्रियों की तरफ़ आकर्षित हूं और दूसरी लड़कियों की तरह पुरुषों का साथ मुझे कोई अलग अहसास नहीं देता.

लेकिन समलैंगिक होने की मेरी इस पहचान के मायने कैसे बदल सकते हैं, इसका अहसास मुझे तब हुआ जब मैं कॉलेज की पढ़ाई पूरी कर अपनी जड़ों की खोज में ऑस्ट्रिया से भारत आई.

ज़िंदगी डरावनी

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भारत में समलैंगिकों के लिए ज़िंदगी कितनी अकेली और डरावनी हो सकती है, ये बात मुझे शुरू के कुछ दिनों में ही पता लगने लगी.

अपनी जैसी दूसरी महिलाओँ से मिलने की कोशिश मुझे 'संगिनी' तक खींच लाई, जो समलैंगिक महिलाओं के लिए बनाया गया एक सपोर्ट ग्रुप है.

1990 के दशक में समलैंगिकता को लेकर कैसा माहौल था, इसे एक उदाहरण से समझिए.

संगिनी के एक आयोजन में एक महिला मुझसे मिली और संगिनी का नंबर लिया.

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आकर्षण और झिझक

सात साल बाद फ़ोन कर एक महिला ने मुझे बताया कि वह महिलाओं के प्रति आकर्षण महसूस करती हैं. यह वही महिला थी जिसने सात साल पहले हमसे नंबर लिया था.

आप अंदाज़ा लगा सकते हैं कि इस तरह की स्वीकारोक्ति कितनी मुश्किल होती है और इसमें कितना लंबा वक़्त लग सकता है.

लोगों के लिए यह ख़ुद स्वीकार करना काफ़ी डरावना होता है. यहां तक कि अकेले में आईने के सामने कहना भी बहुत मुश्किल होता है, क्योंकि आप एक ऐसी बात ज़ाहिर करने जा रहे हैं, जो आपने आज तक किसी से नहीं कही है.

आप नहीं जानते कि लोग कैसी प्रतिक्रिया देंगे, सामने वाला समलैंगिकता के बारे में क्या राय रखता है.

हो सकता है कि वह नाराज़ होकर चला जाए. या इसके उलट आपको गले लगाकर कहे कि अरे, कोई बात नहीं है.

धारा 377

भारत में समलैंगिक महिलाओं के ख़िलाफ़ होने वाली हिंसा किसी भी सीमा तक जा सकती है.

यह हिंसा दो तरह की है. एक तो महिलाएं ख़ुद अपने साथ करती हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि वह गलत हैं. वह तकलीफ़ें झेलती हैं, तनाव से गुज़रती हैं और कई बार तो स्कूल की पढ़ाई तक छोड़नी पड़ती है.

दूसरी, वह हिंसा जो घरवाले या समाज उनके साथ करते हैं.

परिवार के लोगों की जानकारी में आने के बाद कई बार उन्हें घरों में बंद कर दिया जाता है, उनकी नौकरी छुड़वा दी जाती है या दबाव डालकर उनकी पढ़ाई बंद करवा दी जाती है.

जान-बूझकर

ऐसा जान-बूझकर किया जाता है ताकि वे बाहर न जा सकें. परिवारवाले मानते हैं कि एक बार महिला की शादी हो जाए तो सब ठीक हो जाएगा.

मुझे याद है एक बार एक समलैंगिक जोड़ा घर से भाग गया. इनमें से एक महिला आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर थी, दूसरी पढ़ाई पूरी कर रही थी. आर्थिक तौर पर उनकी स्थिति उतनी बेहतर नहीं थी.

पहली महिला के माता-पिता ने गुमशुदगी का मामला दर्ज कराया.

यह साबित होने पर कि लड़कियां स्वेच्छा से गई थीं, पुलिस ने कहा कि परिवार की शिकायत पर उन्हें यह देखना होगा कि यहां धारा 377 वाला मामला लागू होता है या नहीं.

यह जोड़ा कई महीनों तक अपनी पहचान छिपाकर रहा. उस मामले में धारा 377 लागू नहीं हो रही थी. लेकिन अगर किसी एक ने आत्मसमर्पण कर दिया होता तो दूसरी को जेल जाना पड़ता और पहली को नारी निकेतन भेज दिया गया होता.

क़ानूनी मदद महत्वपूर्ण

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ऐसे भी कई मामले हमारे सामने आए हैं, जिसमें परिवार के लोग जबरन महिला को अस्पताल ले गए और उसे वहां हार्मोन ट्रीटमेंट के लिए बाध्य किया गया.

हमें माता-पिता का मनोविज्ञान समझने की भी ज़रूरत है. वह अपने बच्चों को अच्छा देखना चाहते हैं, लेकिन उन्हें लगता है कि शादी करके वह लंबे समय तक सुरक्षित रहेंगी.

भारत में आमतौर पर धारणा यह है कि महिलाएं अपने लिए सही फ़ैसला नहीं ले सकती हैं. माता-पिता के लिए यह मामला संपत्ति विवाद की तरह होता है.

परिवार के लोगों को लगता है कि बेटी तो हमारी संपत्ति है, जिसके बारे में हम ही फ़ैसला कर सकते हैं.

हम ऐसे मामले में महिलाओं की मदद के लिए वकीलों की मदद लेते हैं. सबसे पहले अदालत से शपथ पत्र लेना होता है कि आपने स्वेच्छा से घर छोड़ा है.

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इसके लिए कोर्ट जाना पड़ता है, लेकिन अगर पुलिस गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज करती है तो आपके ख़िलाफ़ कार्रवाई नहीं हो सकती.

समलैंगिकता के मुद्दे पर क़ानूनी मदद बेहद महत्वपूर्ण है. इन मामलों में होने वाली हिंसा को रोकने में क़ानून सबसे बड़ी भूमिका अदा कर सकता है.

साथ ही अगर कानून की नज़र में समलैंगिक होना अपराध नहीं होगा तो समलैंगिक व्यक्ति सबसे पहले अपनी नज़र में खुद को बेगुनाह समझेगा.

(बीबीसी संवाददाता पारुल अग्रवाल से बातचीत पर आधारित)

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