'एक दुनिया अब्दुल्लाह हॉल की, दूसरी बाहर'

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अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (एएमयू) पिछले दिनों विवादों में घिरा रहा है. मुद्दा था वाइस चांसलर की ओर से अब्दुल्लाह हॉल में रह रही अंडरग्रैड छात्राओं को एएमयू के मौलाना आज़ाद लाइब्रेरी में प्रवेश की मांग को एक बार फिर ख़ारिज कर देना और इसी मामले में वाइस चांसलर के ज़रिए दिया गया एक विवादास्पद बयान.

तो देश के विश्वविद्यालयों में पढ़ रही छात्राओं की नज़र में लड़कियों के लिए कैसा होता है कैम्पस का और ख़ासकर हॉस्टल का माहौल. इसी को लेकर बीबीसी ने छात्रा हॉस्टलों पर सिरीज़ शुरू की है. पढ़ें सिरीज़ की पहली क़िस्त.

पढ़े विस्तार से पूरा लेख

अब्दुल्लाह हॉल की एक छात्रा ने कभी कहा था, "दुनिया दो हिस्सों में बंटी है- अब्दुल्लाह की दुनिया और बाहरी दुनिया."

अंडरग्रेजुएट कोर्स में दाख़िला लेने वाली लड़कियों के लिए यूनिवर्सिटी एक ऐसे कारोबारी की तरह पेश आती है जो लड़कियों को एएमयू का शानदार कैंपस दिखाकर आकर्षित करती हैं पर उनके हिस्से आता है कैंपस से दूर अलग-थलग अब्दुल्लाह हॉल.

पहली बार जो लड़की इसे देखती है उसे इससे नफ़रत ही महसूस होती है. पर जब इससे जुड़ाव हो जाता है तो यह हर लड़की के लिए कभी न भूलने होने वाली प्रेम कहानी बन जाती है.

यह ख़ुद में एक छोटा सा क़स्बा है, जिसकी अपनी कैंटीन है, लाइब्रेरी, खेल का मैदान, जिम और दुकानें हैं.

अब्दुल्लाह हॉल के सात हॉस्टलों में यहां हज़ारों लड़कियां रहती हैं. ख़ूबसूरत गुलमोहर लगे कॉलेज का बाग़ भला कौन भूल सकता है. प्लेग्राउंड, ऑडिटोरियम और लाइब्रेरी, जहां लड़कियां शायद ही कभी जातीं हैं.

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मेरे वक़्त में रविवार अकेला दिन था जब यहां की लड़कियों को बाहरी दुनिया की झलक मिलती थी. बाहरी दुनिया की कहानी अब और रोचक हो गई है, जिसके लिए शायद अलग से किताब लिखनी पड़े. तो चलिए अंदर की दुनिया की बात करते हैं.

कुछ चीज़ों पर तो यहां की छात्राएं एक्सपर्ट बन जाती हैं, जैसे एप्लीकेशन लिखने में. कहावत है कि लड़कियां यहां यह एप्लीकेशन भी लिख सकती है, "निवेदन है कि मुझे कृपया मरने की आज्ञा प्रदान करें."

'अच्छी लड़की'

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खाना ऐसा कि आप उसे गले से नीचे उतारने के लिए महारत हासिल कर लेते हैं. दूसरे, यहां एक 'अच्छी लड़की' बनना सीखना होता है.

हालाँकि ‘अच्छी’ का मतलब विस्तार से बताना पड़ेगा, यानी वो लड़की जो शर्मीली है और कभी शिकायत नहीं करती. अगर शिकायत करती है तो वह बदतहज़ीब, घर बिगाड़ने वाली या फिर महिलावादी होती है.

यहां पुरुषों के इलाक़े में क़दम न रखना सीखना होता है. यूनिवर्सिटी ऑडिटोरियम, राइडिंग क्लब, कैंटीन जैसी जगहें पुरुषों की हैं. आप वहां जा सकती हैं पर एकाध तंज़ सुनने को तैयार रहें.

पुरुषों को लड़कियों की जगहों पर जाने का पूरा हक़ है. वो लड़कियों के बाज़ार में जा सकते हैं और सिर्फ़ महिलाओं का सामान भी बेच सकते हैं.

चाहे जो कहें, फिर भी अब्दुल्लाह हॉल की लड़कियां लड़कों के मुक़ाबले ज़्यादा ज़हीन हैं और अक्सर टॉपर्स की सूची में जगह पाती हैं, वो प्रतिभा जिसका इस्तेमाल नहीं होता.

विरासत से दूर

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उन्हें उस विरासत के अहसास का मौक़ा भी नहीं मिलता, जिसका वो हिस्सा हैं. जो लड़कियां ग्रेजुएशन के बाद कॉलेज छोड़ती हैं वो जान ही नहीं पातीं कि एक महान ऐतिहासिक संस्था का हिस्सा होने का क्या मतलब है.

जो पोस्टग्रेजुएशन तक पहुंचती हैं, वो एक-दो सेमेस्टर तक एक नई दुनिया से ही परिचित हो जाती हैं. तब उन्हें पुरुषों की दुनिया में जीना सीखने, झुंड में चलने और भीड़ में सुरक्षा का अहसास जैसा लगने लगता है.

शिकायत नहीं

फिर भी ये लड़कियां उसकी शिकायत नहीं करतीं, जो उनके पास नहीं है (याद रहे कि वो अच्छी लड़कियां हैं). वो इस बात को कभी नहीं समझ पातीं, जब तक कि वो इस दुनिया से परे दूसरी ज़्यादा ख़ुशगवार दुनिया से नहीं जुड़तीं.

मैं वह लड़की हूं, जिसने अब्दुल्लाह हॉल की दुनिया देखी है और बाहरी दुनिया में यक़ीन के साथ चलना सीखा है. मैं अपने अल्मा माटर (मातृ संस्था) के लिए बेइंतहा प्यार और दुख दोनों महसूस करती हूं.

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यूनिवर्सिटी के इतने सालों में जो मैंने समझा वह यह है कि मेरी यूनिवर्सिटी मेरे देश की मानिंद है. दोनों के पास गर्व करने लायक़ विरासत है.

मगर एक संस्था की तरह उनकी अपनी कमज़ोरियां भी हैं क्योंकि उनमें इंसान रहते हैं जो आदर्श नहीं हैं. यह हम पर है कि हम अपने पूर्वाग्रहों से ऊपर उठें और इसे एक बेहतर जगह बनाएं जिस पर हमें और भी गर्व महसूस हो.

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